रूस के साथ सैन्य सहयोग
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद अमेरिका ने भारत की सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने की कोशिश की थी, लेकिन 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान उसने भारत का साथ छोड़ दिया। इस कारण भारत में अमेरिका की सैन्य प्रतिबद्धता को लेकर एक अविश्वास बना हुआ है। दूसरी ओर, रूस एक भरोसेमंद सैन्य सहयोगी रहा है, जिसने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान और अमेरिकी हस्तक्षेप के बावजूद भारत का साथ दिया था।
हालांकि, रूस-यूक्रेन युद्ध और रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों के बाद रूस चीन पर अधिक निर्भर हो गया है, जिससे भारत को चिंता हो रही है कि कहीं रूस पूरी तरह चीन के प्रभाव में न चला जाए। रूस के साथ सैन्य व्यापार बनाए रखने से भारत की रूस पर पकड़ बनी रह सकती है।
रूस एक भरोसेमंद मित्र रहा है और संभवतः आगे भी बना रहेगा। अमेरिका-रूस पुनर्संबंध भारत को उन प्रतिबंधों से बचाने में मदद कर सकते हैं, जिन्हें अमेरिकी CATSCA भारत पर लागू कर सकता है, जैसा कि S-400 मिसाइल सिस्टम के मामले में हुआ था। इसके अलावा, यदि अमेरिका को संतुष्ट करना जरूरी हो, तो भारत अमेरिका से तेल खरीद सकता है ताकि व्यापार घाटे की भरपाई हो सके, क्योंकि इन दिनों यही राष्ट्रपति ट्रंप की प्रमुख चिंता बनी हुई है।
SU-57 की तुलना में SU-30 MKI बेहतर विकल्प?
SU-57 एक अत्याधुनिक 5वीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जिसमें उच्च गतिशीलता, मल्टी-रोल क्षमताएं और जमीनी व हवाई लड़ाई के लिए उन्नत हथियार प्रणाली शामिल हैं। यह पहले से युद्ध में आजमाया हुआ है और रूस इसे प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और भारत में संयुक्त उत्पादन की पेशकश कर रहा है। हालांकि, इसकी कीमत लगभग 100 मिलियन डॉलर प्रति विमान होगी, जो F-35 के बराबर है।
वहीं भारत रूस से SU-57 खरीदता है, तो इससे AMCA प्रोग्राम को झटका लग सकता है। इसलिए, सबसे व्यावहारिक विकल्प यह होगा कि भारत 100 और SU-30 MKI का ऑर्डर दे।
SU-30 MKI क्यों?
SU-30 MKI एक 4.5वीं पीढ़ी का मल्टीरोल एयर सुपीरियरिटी फाइटर है, जिसे भारत दो दशकों से चला रहा है। यह भारत में लाइसेंस के तहत निर्मित हो रहा है और इसका संपूर्ण मेंटेनेंस इकोसिस्टम पहले से मौजूद है। भारतीय वायु सेना के पायलट इसका उपयोग कैसे करना है उसको लेकर अनुभवी हैं और इसके रखरखाव के लिए सभी आवश्यक सुविधाएं पहले से उपलब्ध हैं। इसके अलावा, SU-30 MKI की कीमत लगभग 40-60 मिलियन डॉलर प्रति विमान है, जो F-35 और SU-57 की तुलना में काफी किफायती हैं।
दीर्घकालिक समाधान
- भारत को अपनी स्वदेशी लड़ाकू विमान क्षमताओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए
- AMCA प्रोग्राम को तेज किया जाए
- तेजस Mk1A और Mk2 के उत्पादन में बाधाओं को दूर किया जाए
- स्वदेशीकरण बढ़ाया जाए (वर्तमान 50% से 90% तक)
- कावेरी इंजन को विकसित किया जाए और इसे मानवयुक्त और मानव रहित विमानों में शामिल किया जाए
- 110-120 KN क्षमता वाले एयरो इंजन का लाइसेंस प्राप्त उत्पादन या जॉइंट डेवलपमेंट किया जाए।
भारत के लिए F-35 लड़ाकू विमानों की खरीद का निर्णय महत्वपूर्ण रणनीतिक लाभों को वित्तीय प्रभावों और इसकी रक्षा स्वायत्तता पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों के खिलाफ तौलते हुए लेना चाहिए। इन कारकों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन आवश्यक होगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत द्वारा की जाने वाली कोई भी खरीद उसके दीर्घकालिक सुरक्षा उद्देश्यों के अनुरूप हो और इसकी स्वतंत्र विदेश नीति बनी रहे।
रूसी SU-30 MKI का अधिग्रहण, चाहे घरेलू उत्पादन के माध्यम से हो या प्रत्यक्ष खरीद के माध्यम से, सभी जियो स्ट्रेटेजिक और वित्तीय पहलुओं को पूरा करता है और आने वाले कुछ वर्षों में भारत की हवाई युद्ध क्षमता को अनुकूलित करने में मदद करता है।
हालांकि दोनों देश भारत के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन रूस एक अधिक विश्वसनीय, भरोसेमंद और समय की कसौटी पर खरा उतरने वाला मित्र रहा है, खासकर संकट के समय अपने निरंतर समर्थन और बिना शर्त सैन्य व तकनीकी सहायता देने की तत्परता के कारण। दूसरी ओर, अमेरिका भारत को चीन के खिलाफ संतुलन के रूप में खड़ा करने के लिए उसके साथ बढ़ती भागीदारी कर रहा है ताकि वह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने हितों को आगे बढ़ा सके।
भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए दोनों देशों के साथ स्वतंत्र रूप से और गैर-विशेष रूप से संबंध बनाकर संतुलन बनाए रखना चाहिए। कुशल कूटनीति और अमेरिका-रूस पुनर्संबंध की संभावनाओं को देखते हुए, यह कार्य कठिन नहीं होना चाहिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।