इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर और रोवर मंगल पर जीवन की जानकारी जुटाएगा
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हेलीकॉप्टर की खासियत
इस हेलीकॉप्टर के अन्दर सौर्य ऊर्जा से चार्ज होने वाली बैटरी लगी हैं। इसके पंखों के ऊपर सोलर पैनल भी हैं। पैनल जितना गर्म होगा उतनी ताकत बैटरी को मिलेगी। हेलीकॉप्टर के अन्दर भी निश्चित गर्मी बनाए रखने का प्रबंध है, ताकि मंगल के बदलते तापमान से कोई फर्क न पड़े। वहां दिन में 7.22 डिग्री सेल्सियस तापमान रहता है, जो रात में घटकर माइनस 90 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है। इस हेलीकॉप्टर के पंख हर मिनट 2537 चक्कर लगाते हैं। इंजीन्यूटी मार्स हेलीकॉप्टर को हर लैंडिंग के बाद दोबारा चार्ज होने के लिए पर्याप्त समय दिया जाएगा।
इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर और रोवर मंगल पर जीवन की जानकारी जुटाएगा। यही रोवर इस लाल ग्रह की सतह से पत्थर और मिट्टी को धरती पर लाएगा। इनमें कई कैमरे और माइक्रोफोन लगे हैं, जो मंगल ग्रह की तस्वीरें तथा वहां की आवाजों को रिकॉर्ड करेंगे। इसमें लगे सुपर सैनिटाइज्ड सैंपल, रिटर्न ट्यूब्स चट्टानों के नमूने जुटाएंगे जिनके विश्लेषण से मंगल पर प्राचीन काल में भी मानव जीवन होने की संभावनाओं संबंधी सबूतों को ढूंढा जा सकेगा। नासा लगातार मंगल पर जीवन की संभावनाओं को जुटाने में लगा हुआ है।
नासा ही इससे पहले 1997, 2004, 2012 में भी अपने यान भेजे थे। 1997 में मार्स पाथफाइन्डर अंतरिक्ष यान गया जिसमें मंगल की सतह पर हल्के पहियों से चलने वाली रोबोट समान गाड़ी रोवर सोर्जनर थी। इसमें लगे उपकरण वहां के वायुमण्डल, जलवायु, भूगर्भ एवं वहां की मिट्टी व चट्टानों का पता लगाने में सक्षम थे। 2004 में मंगल के पर्यवेक्षण के लिए के लिए स्पिरिट एण्ड अपॉर्च्युनिटी नाम के जुड़वा रोवर प्रक्षेपित किए गए जिनमें स्पिरिट 2010 तक तथा अपॉर्च्युनिटी 2018 अंत तक सक्रिय था। स्पिरिट ने गुसेव नामक ज्वालामुखी पर बनी सूखी झील से पानी का पता लगाने जबकि अपॉर्च्युनिटी ने गहरी खाइयों तथा नम व सूखे युगों के साथ रेडियो संकेतों से यह जानने की कोशिश की मंगल का भीतरी भाग ठोस है अथवा पिघला हुआ। 2012 में क्यूरोसिटी रोवर पहुंचाया गया जिसका उद्देश्य माउण्ट शार्प पहाड़ के पास की भूगर्भी परतों का अध्ययन था।
इसमें कोई दो मत नहीं कि नासा की सफलता का पूरा श्रेय अमेरिका को ही जाएगा
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निश्चित रूप से मार्स पर्सिवरेंस रोवर और इंजीन्यूटी हेलीकॉप्टर मिशन मंगल पर जीवन की खोज के लिए मील का पत्थर साबित होगा। वहीं दूर ग्रहों पर पहुंचना और वहां अपनी मन मर्जी से धरती जैसे उड़ना व लैण्ड करना बड़ी उपलब्धि के साथ दूसरे ग्रहों के रहस्यों को जानने तथा वहां पर अतीत का कथित मानव जीवन, काल्पनिक एलियंस की हकीकत के साथ भविष्य में जीवन की संभावनाओं के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि नासा के इसी महत्वपूर्ण मिशन की गाइडेंस, नैविगेशन व कंट्रोल ऑपरेशंस को लीड करने वाली भी भारतीय मूल की वैज्ञानिक डॉ. स्वाति मोहन हैं। इसमें कोई दो मत नहीं कि नासा की सफलता का पूरा श्रेय अमेरिका को ही जाएगा लेकिन हमें इतना तो समझना ही होगा कि काश भारत से प्रतिभाओं का पलायन न हो पाता? काश प्रतिभाओं को भारत में अनुकूल वातावरण मिल पाता और काश भारत तमाम संभावनाओं के होते हुए भी बहुत जल्द विश्व गुरु बन पाता।
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