राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह नतीजे अंतिम भले नहीं हों, लेकिन उसका संकेत तो देते ही हैं।
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इन नतीजों से साफ है कि दो सौ से ज्यादा सीटें जीतने का भाजपा का दावा हकीकत से दूर नजर आ रहा है। साथ ही यह भी साफ हो गया है कि धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण और जातिगत कार्ड खेलने की उसकी रणनीति कामयाब नहीं रही है। इसके अलावा ममता बनर्जी और उनके भतीजे के खिलाफ बड़े पैमाने पर लगे आरोपों का भी वोटरों पर खास असर नहीं पड़ा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह नतीजे अंतिम भले नहीं हों, लेकिन उसका संकेत तो देते ही हैं। राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, 'एग्जिट पोल अंतिम सत्य नहीं होता, लेकिन कई बार इससे भावी नतीजों के संकेत मिल जाते हैं।
भले यह आंकड़े सटीक नहीं साबित हों, यह बात तो तय है कि दो सौ के पार जाने का भाजपा का सपना धुंधलाता नजर आ रहा है।' उनका कहना है कि भाजपा ने बंगाल की सत्ता पर कब्जा करने के लिए जो रणनीति तैयार की थी, वह कामयाब नहीं हो सकी है।
बंगाल में चुनाव पर कभी जाति और धर्म की राजनीति हावी नहीं रही है। इस बार भी वोटरों ने इन मुद्दों को नकार दिया है। इनके अलावा आखिरी दो-तीन चरणों में ममता बनर्जी ने जिस तरह प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री की रैलियों से कोरोना संक्रमण बढ़ने का मुद्दा उठाया था, उसका भी वोटरों पर असर नजर आ रहा है।
एक अन्य विश्लेषक पार्थ प्रतिम विश्वास कहते हैं, 'बंगाल की सत्ता किसको मिलेगी, यह तो दो मई को ही पता चलेगा। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों ने राज्य की राजनीति की भावी तस्वीर काफी हद तक साफ तो कर ही दी है।'
दिलचस्प बात यह है कि तृणमूल कांग्रेस और भाजपा, दोनों एग्जिट पोल के नतीजों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका दावा है कि वे दो सौ से ज्यादा सीटें जीत कर सरकार बनाएंगे। इनमें से किसका दावा खरा साबित होता है, इसके लिए दो मई तक का इंतजार करना होगा।
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