बिहार विधान परिषद के चुनाव में दो निर्दलीय उम्मीदवारों ने राजनीतिक समीकरणों को चौंका दिया। तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से बंशीधर ब्रजवासी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की, जबकि सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राहुल राज निर्वाचित हुए। दोनों ने एनडीए के सहयोगी जदयू के उम्मीदवारों को हराया था।
राहुल राज की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी दिलचस्प है। वह पहले भाजपा से जुड़े रहे थे। गठबंधन में सारण शिक्षक सीट जदयू के खाते में जाने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। बंशीधर ब्रजवासी भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी सीट बचाने में सफल रहे।
लेकिन चुनाव जीतने के बाद दोनों की राजनीतिक दिशा बदलती दिखाई दी। भाजपा कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में दोनों पहुंचे। भाजपा का पट्टा पहना और सदस्यता की रसीद हाथ में लेकर तस्वीर खिंचवाई। सवाल है कि जब चुनाव निर्दलीय लड़कर जीता था तो फिर भाजपा की सदस्यता लेने की जरूरत क्यों पड़ी?
तस्वीर ने खोल दी पोल?
इस पूरे विवाद में सबसे अहम है सामने आई तस्वीर। दोनों नेताओं के गले में भाजपा का पट्टा है और हाथों में पार्टी की सदस्यता की रसीद। यह कोई सामान्य मुलाकात या शिष्टाचार भेंट की तस्वीर नहीं है। यह तस्वीर खुद कई सवाल खड़े करती है। मामला तब और गंभीर हो गया जब भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी की ओर से भी दोनों नेताओं के पार्टी में शामिल होने का संदेश सामने आया। बाद में इस संदेश में बदलाव किए जाने की खबरें आईं।
बंशीधर ब्रजवासी ने पहले भाजपा में शामिल होने की बात स्वीकार की, लेकिन विवाद बढ़ने पर अपना रुख बदल लिया। उनका कहना है कि उन्होंने भाजपा की सदस्यता नहीं ली, बल्कि सरकार को समर्थन देने का फैसला किया है। राहुल राज के मामले में भी पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल होने और समर्थन देने के बीच अंतर को लेकर स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत है।
अब सवाल यह है कि यदि केवल समर्थन देना था तो सदस्यता की रसीद क्यों बनी? पार्टी के कार्यक्रम में सदस्यता ग्रहण करने का सार्वजनिक प्रदर्शन क्यों हुआ? प्रदेश अध्यक्ष के संदेश में दोनों को पार्टी में शामिल बताने की जरूरत क्यों पड़ी?क्या राजनीतिक विवाद खड़ा होने के बाद सदस्यता को समर्थन का नाम दिया जा रहा है? क्या तस्वीर और रसीद की राजनीतिक जिम्मेदारी से बचा जा सकता है?
संविधान का शिकंजा या राजनीतिक बहाना?
इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू संविधान की दसवीं अनुसूची है। इसके पैरा 2(2) में प्रावधान है कि ऐसा निर्वाचित सदस्य, जो किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में नहीं चुना गया हो, चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो सकता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। निर्दलीय निर्वाचित सदस्य के लिए छह महीने की कोई छूट नहीं है। छह महीने का प्रावधान निर्दलीय सदस्यों के लिए नहीं, बल्कि कुछ परिस्थितियों में मनोनीत सदस्यों के लिए है। इसलिए राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी के मामले में असली सवाल यही है कि क्या उन्होंने भाजपा की औपचारिक सदस्यता ग्रहण की थी या केवल सरकार को समर्थन देने की घोषणा की थी?
दोनों स्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है। कोई निर्दलीय सदस्य सरकार का समर्थन कर सकता है, उसके पक्ष में मतदान कर सकता है और अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने के लिए सत्ता पक्ष के साथ खड़ा हो सकता है। लेकिन राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करना अलग मामला है।
संविधान के पैरा 6 के अनुसार अयोग्यता से जुड़े सवाल पर संबंधित सदन के सभापति को निर्णय करना होता है। इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों की सदस्यता निश्चित रूप से समाप्त हो जाएगी। लेकिन कानूनी चुनौती को हल्के में भी नहीं लिया जा सकता।
तेजस्वी-प्रशांत किशोर ने खोला मोर्चा!
भाजपा के इस घटनाक्रम पर राष्ट्रीय जनता दल और जन सुराज ने सवाल उठाए हैं। तेजस्वी यादव ने दोनों निर्दलीय विधान पार्षदों की सदस्यता समाप्त करने की मांग की है। उनका आरोप है कि भाजपा संविधान और दल-बदल कानून की मर्यादा का उल्लंघन कर रही है।
दूसरी तरफ प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी इसे जनादेश के साथ धोखा बताते हुए कानूनी लड़ाई लड़ने का ऐलान किया है। पार्टी ने विधान परिषद के सभापति के सामने शिकायत करने और जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय जाने की बात कही है। जन सुराज का तर्क है कि मतदाताओं ने दोनों को निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुना था। चुनाव जीतने के तत्काल बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेना मतदाताओं के फैसले की भावना के विपरीत है।
यहां एक सवाल विपक्ष से भी है। क्या राजनीतिक दलों को केवल तब संविधान की याद आती है जब सत्ता पक्ष के किसी कदम से उन्हें राजनीतिक लाभ दिखाई देता है? क्या यही कसौटी विपक्षी दलों के नेताओं पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए?फिर भी, इस मामले में कानूनी प्रावधान को राजनीतिक आरोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
जदयू को हराया, भाजपा के साथ आए!
इस घटनाक्रम का एक दूसरा राजनीतिक पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दोनों नेताओं ने चुनाव में भाजपा के सहयोगी जदयू के उम्मीदवारों को हराया था। अब वही दोनों भाजपा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। राहुल राज की सीट गठबंधन में जदयू के हिस्से आई थी। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर जीत हासिल की। बंशीधर ब्रजवासी ने भी जदयू उम्मीदवार को हराया।
ऐसे में भाजपा का दोनों नेताओं को अपने साथ खड़ा करना क्या केवल राजनीतिक समर्थन जुटाने की कोशिश है या गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन का कोई नया खेल? जदयू के लिए भी यह असहज स्थिति है। उसके उम्मीदवारों को हराने वाले निर्दलीय अब उसी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के साथ दिखाई दे रहे हैं। क्या भाजपा अपने सहयोगी दल की राजनीतिक कीमत पर अपनी ताकत बढ़ाने में जुटी है? क्या गठबंधन में सीटों का बंटवारा चुनाव तक ही सीमित रह गया है?
भाजपा की सफाई, लेकिन सवाल बरकरार!
विवाद बढ़ने के बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने दोनों नेताओं के पार्टी में औपचारिक रूप से शामिल होने की बात से पीछे हटते हुए इसे समर्थन का मामला बताया। लेकिन क्या केवल बयान बदल देने से तस्वीर और सदस्यता की रसीद का महत्व समाप्त हो जाएगा?
यदि दोनों नेताओं ने भाजपा की सदस्यता नहीं ली तो पार्टी के सामने यह सवाल है कि सदस्यता ग्रहण करने की घोषणा और रसीद का मामला कैसे सामने आया? और यदि सदस्यता ली थी तो अब उससे इनकार क्यों किया जा रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम में राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी की राजनीतिक जिम्मेदारी भी कम नहीं है। जनता ने उन्हें निर्दलीय चुनकर विधान परिषद भेजा है। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि उनका फैसला क्या था और अब वे किस हैसियत से भाजपा के साथ खड़े हैं?
फैसला सभापति के हाथ में!
अब निगाहें बिहार विधान परिषद के सभापति पर हैं। विपक्ष शिकायत करने की तैयारी में है। जन सुराज कानूनी लड़ाई का ऐलान कर चुका है और राजद भी इस मामले को आगे बढ़ाने के पक्ष में है।सभापति के सामने केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि सदस्यता की रसीद, तस्वीर, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का शुरुआती संदेश और दोनों नेताओं के अलग-अलग समय पर दिए गए बयान भी महत्वपूर्ण होंगे।
आखिरकार फैसला साक्ष्यों और संविधान के प्रावधानों के आधार पर ही होना चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों के लिए संविधान की व्याख्या भी सुविधा के हिसाब से बदल सकती है? निर्दलीय चुनाव लड़ना, जनता का विश्वास हासिल करना और जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करना क्या इतनी सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है कि उसके संवैधानिक परिणामों की चिंता ही न की जाए?
बिहार का यह प्रकरण केवल दो विधान पार्षदों की सदस्यता का मामला नहीं है। यह राजनीतिक नैतिकता, मतदाताओं के जनादेश और दल-बदल कानून की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है। अब देखना है कि भाजपा अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने की इस कोशिश को संवैधानिक कसौटी पर कैसे सही साबित करती है और विधान परिषद के सभापति इस विवाद पर क्या फैसला सुनाते हैं।
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