जानकारी जुटाने के बाद एक विचार मन में आया कि भारत वह देश है जहां मिठाइयों की इतनी विविधता है कि हर क्षेत्र में स्वाद और मिठास के दर्जनों विकल्प मिल जाएंगे, लेकिन अब मिठाई के नाम पर चॉकलेट का चलन भी तेजी से बढ़ रहा है। जब मिठाई के इतने विकल्पों के बावजूद चॉकलेट ने अपनी जगह बना ली और एड आने लगे हमारे पर्वों पर चॉकलेट का कुछ मीठा हो जाए तो फिर यहां कुछ भी चल सकता है। शायद इसी क्रम में अब विदेशी त्योहारों का भी स्वागत होने लगा है। सवाल यह नहीं कि चॉकलेट क्यों खाई जा रही है या हैलोवीन क्यों मनाया जा रहा है, बल्कि सवाल यह है कि हम किसी चीज को अपनाने से पहले उसके बारे में जानने और अपनी परंपराओं से उसका संबंध समझने की कोशिश कितनी करते हैं?
हैलोवीन हर साल 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। इसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन यूरोप की सेल्टिक परंपरा 'समहैन' से जुड़ी मानी जाती हैं। यह परंपरा मुख्य रूप से आयरलैंड, स्कॉटलैंड और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित थी। समहैन के अवसर पर गर्मियों के अंत और सर्दियों की शुरुआत को चिह्नित किया जाता था। उस समय लोगों की मान्यता थी कि इस रात जीवित लोगों और मृत आत्माओं के बीच की दूरी कम हो जाती है। इसी विश्वास से जुड़ी कई परंपराएं विकसित हुईं, जिनमें आग जलाना और विशेष वेशभूषा पहनना शामिल था।
बाद में ईसाई परंपरा में एक नवंबर को ऑल सेंट्स डे मनाया जाने लगा। इससे एक दिन पहले की शाम को 'ऑल हैलोज ईव' कहा गया, जो आगे चलकर हैलोवीन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। समय के साथ इस त्योहार का स्वरूप बदलता गया। आयरिश और स्कॉटिश प्रवासियों के साथ यह परंपरा अमेरिका पहुंची और वहां इसे व्यापक लोकप्रियता मिली। आज हैलोवीन पर लोग डरावने कपड़े पहनते हैं, चेहरे पर भूत-प्रेत जैसे चित्र बनाते हैं, कद्दू को काटकर उसमें रोशनी रखते हैं और बच्चे घर-घर जाकर मिठाइयां मांगते हैं। इसे 'ट्रिक ऑर ट्रीट' कहा जाता है।
अर्थात जिस त्योहार की जड़ें यूरोप की प्राचीन लोकमान्यताओं और धार्मिक परंपराओं में हैं, वह आज मनोरंजन, वेशभूषा, पार्टियों और बाजार का एक बड़ा आयोजन बन चुका है। अमेरिका और यूरोप में इसका सामाजिक और व्यावसायिक महत्व है। वहां बच्चों से लेकर बड़े तक इसमें भाग लेते हैं। लेकिन भारत में इसका बढ़ता आकर्षण एक अलग तरह के सामाजिक प्रश्न को जन्म देता है।
भारत में अब स्कूलों, होटलों, क्लबों और विभिन्न आयोजनों में हैलोवीन पार्टियां आयोजित होने लगी हैं। बाजारों में डरावने मुखौटे और विशेष वेशभूषा उपलब्ध हैं। सोशल मीडिया पर लोग अपने चेहरे को भूतिया रूप देकर तस्वीरें साझा कर रहे हैं। इसमें किसी को आपत्ति करने की आवश्यकता नहीं है कि कोई व्यक्ति मनोरंजन के लिए ऐसा क्यों कर रहा है। दुनिया की दूसरी संस्कृतियों के बारे में जानना और उनके उत्सवों को समझना अच्छी बात है। लेकिन क्या किसी विदेशी परंपरा को अपनाने का अर्थ केवल उसकी बाहरी नकल करना ही है?
हास्यप्रद यह है कि भारत में आधुनिकता का एक नया पैमाना विकसित होता दिखाई दे रहा है। कोई विदेशी त्योहार लोकप्रिय हो जाए तो हम उसे अपनाने में देर नहीं करते। कद्दू में आंख-नाक काटकर मोमबत्ती जलाना हमें नया और आकर्षक लगता है, लेकिन अपने त्योहारों के पीछे छिपे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अर्थ जानने में हमारी रुचि अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है। विदेशी त्योहारों के लिए विशेष आयोजन और वेशभूषा तैयार हो जाती है, लेकिन अपने पर्वों के वास्तविक महत्व को समझाने के लिए उतना उत्साह हमेशा दिखाई नहीं देता।
यह स्थिति केवल हैलोवीन तक सीमित नहीं है। खानपान से लेकर पहनावे और उत्सव मनाने के तरीकों तक, हम कई बार पश्चिमी प्रभाव को आधुनिकता का पर्याय मान लेते हैं। भारतीय मिठाइयों की लंबी परंपरा के बीच चॉकलेट का चलन बढ़ना अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब किसी नई चीज को अपनाते हुए हम अपनी पुरानी पहचान और स्थानीय परंपराओं को कमतर समझने लगते हैं, तब विचार करने की आवश्यकता होती है। दुनिया से सीखना और अपनी जड़ों को भूल जाना दो अलग-अलग बातें हैं। जो किसी भी स्थिति में ठीक नहीं लगता है।
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