चीतों की जो उपप्रजाति भारत से विलुप्त हुई थी, उसका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस वेनाटिकस था
- फोटो : पेक्सेल्स
चीतों के पुनर्वास की पहल
देश में विलुप्त होते चीतों के पुनर्वास की पहल यूपीए 2 के कार्यकाल में तत्कालीन केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने की थी। बाद में यह मामला अदालत तक गया। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी को इस परियोजना के लिए मंजूरी दी थी। साथ ही, कोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को चीतों के लिए उपयुक्त जगह खोजने का आदेश दिया था। कई राष्ट्रीय उद्यानों पर विचार के बाद एक्सपर्ट्स ने मध्यप्रदेश के श्योपुर में कूनो पालपुर राष्ट्रीय उद्यान को चुना।
हालांकि, इस दौड़ में मप्र के 1200 किमी क्षेत्र में फैले नौरादेही अभयारण्य का नाम भी था, लेकिन 748.61 वर्ग किमी में फैले कूनो पालपुर अभयारण्य को ज्यादा उपयुक्त माना गया। यहां 36 चीतों को बसाया जाएगा। वैसे कूनो में गुजरात के गिर से शेर लाने की भी योजना है, लेकिन मामला अटका हुआ है।
वैसे भी दुनिया में कुल 7 हजार चीते ही बचे हैं। इनमें भी ज्यादातर अफ्रीका के जंगलों में ही हैं। कुछ चीते ईरान में भी बताए जाते हैं। भारत में चीते कहानियों और परिकथाओं में ही बचे थे। वो कहानियां अब फिर जिंदा हो सकती हैं। हालांकि चीतों को भारत लाना काफी खर्चीला काम है। नामीबिया से लेकर कूनो तक के सफर पर करीब 75 करोड़ रू. खर्च होंगे। इनमें से 50.22 करोड़ रू. इंडियन ऑइल कंपनी दे रही है।
यह सवाल मौजूं है कि आखिर अफ्रीका से ही चीते लाकर मप्र के कूनो में क्यों बसाए जा रहे हैं? इसका जवाब विशेषज्ञों के मुताबिक यह है कि चीतों की जो उपप्रजाति भारत से विलुप्त हुई थी, उसका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस वेनाटिकस था और अफ्रीका से जो चीते भारत लाए जा रहे हैं, उनका वैज्ञानिक नाम एसीनोनिंक्स जुबेटस जुबेटस है। इन दोनो प्रजातियों के जीन्स लगभग समान हैं, इसीलिए उन्हें भारत लाया जा रहा है।
हालांकि चीतों का यह महाद्वीपीय स्थलांतरण इतना आसान भी नहीं है। यह परियोजना भी अपने आप में एक प्रयोग ही है। क्योंकि अफ्रीकी चीते हिंदुस्तानी पर्यावरण में खुद को कितना ढाल पाएंगे।
अपनी तासीर को यहां के हिसाब से कितना बदल पाएंगे यह अभी देखना होगा। संक्षेप में कहें तो अफ्रीकी चीतों को अब एशियाई चीता बनना होगा। चीते इस कसौटी पर कितना खरा उतरते हैं, यह देखने की बात है।
यह भी विडंबना है कि एक तरफ देश ने विदेशी सत्ता से आजादी पाई तो दूसरी तरफ हमने रफ्तार और फुर्ती के प्रतीक चीतों को इस देश से विदा कर दिया। भारत में चीतों की आखिरी खेप के रूप में तीन चीते सरगुजा (अब छत्तीसगढ़ में) में वहां के राजा रामानुज प्रताप सिंह ने अपनी बहादुरी दिखाते हुए शिकार के रूप में खत्म कर दिए।
मध्यकाल में चीते चतुर शिकारी के रूप में बादशाहों, राजाओं की पहली पसंद थे। कई राजाओं ने इन्हें शौक से पाला भी था। क्योंकि चीता जिस रफ्तार से भागता और अपने शिकार पर झपटता है, उसके आगे शेर का शाही मिजाज भी फीका पड़ता है।
एक जमाने में देश भर में फैले चीते आजादी के चार साल बाद ढूंढे नहीं मिल रहे थे। नतीजतन भारत सरकार ने 1952 में चीतों को विलुप्त जाति घोषित कर दिया। जबकि एशियाई चीते (अंग्रेजी में इन्हें हंटिंग पैंथर भी कहा जाता है) भारत की शान हुआ करते थे। चीतों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि मध्यकाल के कवि भूषण ने महानायक शिवाजी की तुलना चीते से की थी।
उन्होंने लिखा था ‘दावा द्रुमदंड पर चीता मृगझुंड पर भूषण वितुंड पर जैसे मृगराज है। यानी शिवाजी की आक्रामकता चीते के समान है। चीते की खूबी यह है कि वह अंधेरे में भी अपने शिकार को साफ देख सकता है और उस पर झपट सकता है। इसीलिए शायर अल्लामा इकबाल लिखा ‘ मिलेगा मंजिले मकसूद का उसी को सुराग, अंधेरी शब में है चीते की आंख जिसका चिराग।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।