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आजादी का अमृत महोत्सव : उम्मीद है जनता अब समझेगी "राजनीतिक रेवड़ी बनाम लोक कल्याण" का अंतर

सार


यह महज संयोग नहीं कि आजादी के अमृत महोत्सव की बेला में राजनीतिक रेवड़ी पर रार छिड़ गई है। सियासी गलियारे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक राजनीतिक खैरात बनाम लोक कल्याण में फर्क समझने की जरूरत महसूस की जा रही है। मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से सफेद की तर्ज पर राजनीतिक दलों के बीच हमारी खैरात तुम्हारी खैरात से अलग व जन उपयोगी का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है, लेकिन इस रार ने अमृत की उम्मीदें जगा दी हैं।      

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लोक कल्याण के लिए मुफ्त योजनाएं चलाना और लोक लुभावन वादों को बीच कितना अंतर है? - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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यह महज संयोग है कि आजादी के अमृत महोत्सव की बेला में राजनीतिक रेवड़ी पर जो सियासी रार छिड़ी है, उससे जल्द अमृत निकलने वाला है। सियासी गलियारे से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक राजनीतिक खैरात बनाम लोक कल्याण पर बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई के दौरान अब राजनीतिक खैरात बनाम लोक कल्याण में अंतर तलाशने की आवश्यकता महसूस हुई है और सर्वोच्च अदालत ने इस अंतर को समझने के लिए विशेषज्ञों का पैनल तक बनाने का सुझाव दिया है। सभी पक्षकारों से राय मांगी गई है। यहां यह याद दिला देना भी जरूरी है कि इससे पहले 2013 में तमिलनाडु के मामले में राजनीतिक खैरात को सुप्रीम कोर्ट ने ही जायज ठहराया था।

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राजनीतिक खैरात बनाम लोक कल्याण का फर्क

बिहार विधानसभा के 2020 के चुनाव में भाजपा ने वादा किया था कि यदि सरकार बनी तो बिहार में कोरोना की वैक्सीन मुफ्त लगेगी। भाजपा की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनी और वहां कोरोना के टीके मुफ्त लगे। शुरुआत बिहार से हुई। मुफ्त कोरोना वैक्सीन का यह बिहार मॉडल धीरे-धीरे समूचे देश में लागू हो गया।

दरअसल,  देश में करीब 200 करोड़ कोरोना टीके लग चुके हैं, जिनमें से औसतन करीब 150 करोड़ टीके मुफ्त लगे हैं। इस पर केंद्र सरकार को अपने स्वास्थ्य बजट में अलग से 35 हजार करोड़ का अतिरिक्त प्रावधान करना पड़ा था। सवाल उठता है कि क्या यह राजनीतिक खैरात थी या लोक कल्याण? केंद्र सरकार के खजाने पर यह जो वित्तीय बोझ था, क्या वह जनता के पैसे से, जनता के लिए, जनता द्वारा नहीं माना जाना चाहिए।

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जाहिर है आपदा की इस घड़ी में करोड़ों जरूरतमंदों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन राजनीतिक खैरात की श्रेणी में कतई नहीं क्योंकि इस मुफ्त खुराक से करोड़ों आमजनता की जानें बचीं, इम्युनिटी बढ़ीं, वह भी तब जब अस्पतालों में बेड-ऑक्सीजन के लाले पड़ गए थे।

इसी कोरोना महामारी के दौरान एकाएक 25 मार्च 2020 को जब लॉकडाउन की घोषणा हुई तो सारी आर्थिक गतिविधियां एकाएक ठप पड़ गईं। कल-कारखाने,दफ्तर आदि बंद हो गए। रोजी-रोजगार पर संकट गहरा गया। लाखों मजदूर घर-बार पैदल लौट पड़ें।  तब घरों में खाली हाथ लौटे करोड़ों लोगों को मुफ्त राशन क्या खैरात की श्रेणी में मानी जाए। इसी तरह उज्ज्वला योजना के तहत लाखों परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन दिए गए।

इस योजना के सिक्के का एक पहलू यह था कि गांवों तक घरों में गैस चूल्हे जलने लगे। दूसरा पहलू यह भी था कि गांव से शहर तक के गैस उपभोक्ताओं की सब्सिडी बंद करनी पड़ी और जेब पर बोझ बढ़ गया।

इस योजना को शायद इसलिए सरकारी खजाने पर बोझ नहीं माना जाना चाहिए क्योंकि यहां भी जनता के पैसे का ही जरूरतमंद जनता के लिए इस्तेमाल हुआ। एक तरफ सब्सिडी बंद हुई, तो दूसरी मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए। पहले स्वेच्छिक गैस सब्सिडी बंद की अपील का असर दिखा लेकिन आपदा के दौरान आर्थिक खाई पाटने के लिए सभी गैस उपभोक्ताओं की सब्सिडी पूरी तरह बंद कर दी गई। इससे कहीं खुशी तो कहीं गम का आलम दिखा।
 

केंद्र ने स्वच्छता के नाम पर शौचालय निर्माण योजना चलाई। इसका भी असर दिखा। केंद्र सरकार मुफ्त कोरोना टीका, मुफ्त राशन, मुफ्त गैस कनेक्शन, शौचालय निर्माण के लिए वित्तीय मदद जैसी योजनाओं  को अपनी उपलब्धि गिनाती है तो फिर यह सवाल भी उठता है कि जिन राज्यों में एक सीमा तक मुफ्त बिजली, पानी, लैपटॉप, स्कूटी, सस्ता अनाज, महिलाओं-किसानों को वित्तीय मदद दी जा रही है या चुनावों के दौरान ऐसे लोकलुभावन वादे किए जाते रहे हैं, क्या वे राजनीतिक रेवड़ी हैं या लोक कल्याण।


सुप्रीम कोर्ट में ताजा सुनवाई के दौरान आम आदमी पार्टी ने अपनी मुफ्त की योजनाओं के समर्थन में अर्जी दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अब कार्यक्रमों में राजनीतिक दलों के मुफ्त वितरण की ऐसी शैली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली-पानी के बूते अपना विस्तार दिल्ली के बाद पंजाब कर लिया है और अब वह बाकी राज्यों में भी इसी वादे को दोहरा रही है। दिल्ली के सीएम केजरीवाल जब केंद्र पर सवाल उठाते हैं तो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी मानती हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर मदद खैरात नहीं है। मुफ्त के वादे अच्छे और बुरे पर (मेरी कमीज, तुम्हारी कमीज से सफेद शैली में) बहस छिड़ी है। 
 

 

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केंद्र सरकार भी मुफ्त रेवड़ी को लेकर आगे कानून बनाने या चुनाव आयोग से ऐसे दलों पर नकेल के पहले सुप्रीम कोर्ट से ही हल निकल आने की उम्मीद जता रही है। - फोटो : अमर उजाला

पहली बार नहीं छिड़ी है ऐसी रार

दरअसल, राजनीतिक दलों की ओर से मुफ्त वाले चुनावी वादे कोई नए नहीं हैं। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध नेता एनटी रामाराव ने आंध्र प्रदेश के चुनाव में पहली बार 2 रुपये प्रति किलो चावल का वादा किया था। उनकी सरकार बनी। तब से राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों में लीक से हटकर ऐसे वादों की झड़ी लगाने का चलन व सिलसिला जारी है। इसमें कोई किसी से पीछे नहीं है। ऐसा भी नहीं ऐसा मामला पहली बार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
 
इधर तमिलनाडु से जुड़ा मामला जब 2013 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, तब सर्वोच्च अदालत ने उस राजनीतिक खैरात को जायज ठहराया था। मुफ्त चुनावी वादों पर रोक या ऐसे वादे करने वाले दलों की मान्यता खत्म करने की गुहार भी पहली बार नहीं लगी है। चुनाव आयुक्त टीएन शेषण के समय ऐसे वादों पर लगाम के साथ-साथ चुनाव आयोग के डंडे चलते रहे हैं।

 

जिम्मेदारी बनाम बैकफुट

ताजा मामले में चुनाव आयोग पल्ला झाड़ रहा है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर आग्रह किया है कि वह विशेषज्ञ पैनल का उसे हिस्सा न बनाए। सांविधानिक संस्था का हवाला दिया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस इसी महीने सेवानिवृत होने जा रहे हैं लेकिन उन्होंने कहा कि वह विधायिका-कार्यपालिका में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते हैं, लेकिन यह जरूर जानने को इच्छुक हैं कि मुफ्त रेवड़ी और लोककल्याणकारी योजनाओं में क्या फर्क है? 

क्या लक्ष्मण रेखा खींची जानी चाहिए ताकि सरकार के खजाने पर बोझ न पड़े, ताकि जनता का नुकसान न हो, ताकि राजनीतिक स्वार्थ की खातिर आधारभूत बुनियादी ढांचे न चरमराएं। केंद्र सरकार भी मुफ्त रेवड़ी को लेकर आगे कानून बनाने या चुनाव आयोग से ऐसे दलों पर नकेल के पहले सुप्रीम कोर्ट से ही हल निकल आने की उम्मीद जता रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ पैनल को लेकर जो सुझाव दिया, वह लगभग तय है। 17 अगस्त की सुनवाई के दौरान राजनीतिक खैरात बनाम लोककल्याण को परिभाषित करने की ओर कदम बढ़ने के आसार हैं। ऐसे में यह तय माना जा सकता है कि आजादी के अमृत महोत्सव की बेला में फिर से एक बार सुप्रीम कोर्ट से ही राजनीतिक रेवड़ी बनाम लोक कल्याण की इस रार से अमृत की बूंदें निकलेंगी जो भविष्य में राजनीतिक स्वार्थ के बजाय जनकल्याण का मार्ग प्रशस्त करेंगी।
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