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गांधी जी की नजर में मानव अपशिष्ट ‘सोना’ भी

सार

गांधी जी स्वच्छता को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का मूलभूत सिद्धांत मानते थे। उन्होंने 1925 में लिखा था कि “स्वच्छता ईश्वर की भक्ति के समान है।”
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महात्मा गांधी के अनमोल विचार - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मानव मल मूत्र घोर गंदगी का प्रतीक तो है, लेकिन त्यागा हुआ हेय अपशिष्ट प्राकृतिक संन्तुलन के लिये कितना जरूरी है, उसे गांधी जी और वैज्ञानिकों की सोच से समझा जा सकता है। दरअसल मानव अपशिष्ट प्रबंधन एक ऐसा विषय है जो स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि से गहराई से जुड़ा हुआ है।

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महात्मा गांधी ने स्वच्छता को ईश्वर भक्ति के समान माना और इसे राष्ट्रीय प्रगति का आधार बताया। उन्होंने खुले में शौच को सामाजिक अभिशाप कहा, परंतु साथ ही ग्रामीण संदर्भ में मानव मल को प्राकृतिक खाद के रूप में उपयोग करने की वकालत भी की थी। आज भारत में खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) जो अभियान चल रहा है वह गांधी जी के विचारों से प्रेरित है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो धरती से अर्जित मानव अपशिष्ट में निहित पोषक तत्व, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटैशियम, को पुनर्चक्रित कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है, किन्तु आधुनिक स्वच्छता प्रणालियों में यह प्राकृतिक चक्रण अक्सर बाधित हो जाता है। पुनर्चक्रण एक प्राकृतिक व्यवस्था है जो धरती से अर्जित जीवन के लिये अति अवश्यक तत्वों को वापस धरती का लौटाने से संबंधित है।
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गांधी जी स्वच्छता को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का मूलभूत सिद्धांत मानते थे। उन्होंने 1925 में लिखा था कि “स्वच्छता ईश्वर की भक्ति के समान है।” उनका विश्वास था कि भारत की गरीबी और बीमारियों का प्रमुख कारण अस्वच्छता है, वह भी विशेषकर खुले में शौच की प्रवृत्ति से!

उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “स्वच्छता राजनीतिक स्वतंत्रता से भी अधिक महत्वपूर्ण है।” उनके आश्रमों में, जैसे साबरमती आश्रम, शौचालयों की सफाई अनिवार्य थी। वह स्वयं शौचालय साफ करते थे ताकि लोगों में स्वच्छता के प्रति चेतना जागे और जातिगत भेदभाव मिटे।

गांधी जी ने खुले में शौच को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक अवश्य माना था, लेकिन ग्रामीण भारत की परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने एक व्यावहारिक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत किया था। ‘यंग इंडिया’ और ‘हरिजन’ जैसी पत्रिकाओं में उन्होंने लिखा कि यदि शौचालय उपलब्ध न हों तो मानव मल को खेतों में उचित गहराई में दबाकर प्राकृतिक खाद बनाया जाए।

उनका विचार था कि मानव अपशिष्ट, पशु गोबर और अन्य जैविक कचरे को वैज्ञानिक ढंग से ‘सोने जैसी’ खाद में परिवर्तित किया जाए।

इससे न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी बल्कि पर्यावरण संतुलन भी बना रहेगा। उन्होंने पश्चिमी शैली के शौचालयों की नकल करने के बजाय भारतीय संदर्भ में सरल और पर्यावरण-अनुकूल समाधान सुझाए, जैसे सूखे शौचालय, जिनमें मल को सड़ाकर खाद बनाया जा सके।

उनका दर्शन आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ सामंजस्य पर आधारित था, जो आज के पारिस्थितिक स्वच्छता के सिद्धांत से मेल खाता है। उनका यह दृष्टिकोण प्राकृतिक पोषक चक्रण को प्रोत्साहित करता था, जिसमें मिट्टी से लिए गए तत्व स्थानीय स्तर पर पुनः लौटें। मतलब जहां की मिट्टी के तत्व लिये हैं, वहीं लौटाये जांय।

गांधी जी के स्वच्छता दर्शन से प्रेरित उनके जन्मदिवस 2 अक्तूबर 2014 को शुरू किये गये स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) का प्रमुख उद्देश्य भारत को खुले में शौच मुक्त बनाना था। इसके ग्रामीण मिशन के अंतर्गत 2014 से 2019 के बीच 10 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए, जिससे शौचालय कवरेज 39 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत से अधिक माना गया।

यूनिसेफ के अनुसार, स्वच्छ भारत मिशन ने लगभग 50 करोड़ लोगों के जीवन में परिवर्तन लाया और खुले में शौच करने वाली वैश्विक जनसंख्या को आधा कर दिया। स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसका प्रभाव उल्लेखनीय रहा। दस्त जैसी बीमारियों में कमी आई, क्योंकि खुले में शौच से जल और मिट्टी प्रदूषित होते हैं।

एक अध्ययन में पाया गया कि इस अभियान से शिशु मृत्यु दर में भी कमी आई। हालांकि चुनौतियाँ अभी भी हैं।  कुछ क्षेत्रों में शौचालयों का उपयोग सीमित है और अपशिष्ट प्रबंधन की कमी से पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं।

दूसरी ओर वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो मानव अपशिष्ट में लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन और फॉस्फोरस केंद्रीय सीवेज प्रणाली में चला जाता है।

प्राकृतिक चक्रण में पौधे मिट्टी से पोषक तत्व ग्रहण करते हैं, जीव उन्हें खाते हैं और फिर उनके अपशिष्ट से वे तत्व मिट्टी में लौट आते हैं। किंतु आधुनिक फ्लश शौचालयों में मल पानी के साथ मिश्रित होकर सीवेज बन जाता है, जो अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों (वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट प्लांट) में भेजा जाता है।

यहां सूक्ष्मजीवों द्वारा विघटन के बाद ठोस अवशेष (बायोसॉलिड्स) निकलता है, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत नाइट्रोजन और 50 प्रतिशत फॉस्फोरस होता है।

यदि यह अवशेष कृषि में उपयोग न किया जाए तो ये पोषक तत्व नदियों में बहकर अतिपोषण (यूट्रोफिकेशन) का कारण बनते हैं, जहाँ शैवालों की अत्यधिक वृद्धि जल में ऑक्सीजन की मात्रा घटा देती है और जलीय जीवन को हानि पहुँचाती है। विश्व स्तर पर लगभग 80 प्रतिशत सीवेज बिना उपचार के छोड़ा जाता है, जिससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी होती है।

पारिस्थितिक स्वच्छता (इकोसैन) में मल और मूत्र को अलग-अलग संग्रहित कर पुनः उपयोग में लाया जाता है। मूत्र, जिसमें लगभग 80 प्रतिशत नाइट्रोजन होता है, को पतला कर जैविक उर्वरक बनाया जाता है, जबकि मल को कंपोस्टिंग द्वारा खाद में बदला जाता है। एक अध्ययन के अनुसार, मानव अपशिष्ट से बनी खाद न केवल फसल उपज बढ़ाती है बल्कि मिट्टी का स्वास्थ्य भी सुधारती है।

इकोसैन व्यवस्था के विभिन्न लाभ बताये जा रहे हैं, जैसे इससे जल संरक्षण होता है इसमें फ्लश प्रणाली की तुलना में 90 प्रतिशत कम पानी की आवश्यकता होती है। पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण, खाद्य सुरक्षा और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।

किंतु इसके कुछ सीमित पक्ष भी हैं। जैसे भारी धातुओं या औषधीय अवशेषों से प्रदूषण का खतरा तथा सांस्कृतिक स्वीकृति की कमी। उन्नत तकनीकें जैसे स्ट्रुवाइट क्रिस्टलीकरण द्वारा फॉस्फोरस निकाला जाता है, जिसे पौधे 76 प्रतिशत तक अवशोषित कर लेते हैं।

बायोगैस उत्पादन से ऊर्जा प्राप्त होती है और बचा हुआ अवशेष खाद के रूप में उपयोगी होता है। भारत की मिट्टी में नाइट्रोजन (89 प्रतिशत), फॉस्फोरस (80 प्र.श) और पोटैशियम (50प्र.श) की कमी पाई जाती है, जो भूमि के क्षरण से जुड़ी है।

इसलिए आवश्यक है कि परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) का दृष्टिकोण अपनाया जाए और अपशिष्ट से प्राप्त बायोसॉलिड्स को स्थानीय कृषि में प्रयोग कर तत्वों को उसी क्षेत्र में लौटाया जाए। इसमें सूक्ष्मजीवों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो जैविक पदार्थ को विघटित कर पोषक तत्वों को पुनः मिट्टी में उपलब्ध कराते हैं।

ओडीएफ अभियान में इकोसैन को सम्मिलित करने से प्राकृतिक संतुलन को सुदृढ़ किया जा सकता है। किंतु यदि अपशिष्ट केवल एकत्र किया जाए और पुनर्चक्रण न हो, तो मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और बढ़ जाएगी। गांधी जी के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उनके समय में थे। स्वच्छता और अपशिष्ट पुनर्चक्रण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण संभव है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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