'जिन्ना पाकिस्तान में एक धर्मनिरपेक्ष, चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार चाहते थे
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जब नाराज हो गए जिन्ना से लोग
संविधान सभा की बहस का सारांश जस्टिस मोहम्मद मुनीर ने कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया- 'जिन्ना पाकिस्तान में एक धर्मनिरपेक्ष, चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार चाहते थे ताकि पाकिस्तान की राष्ट्रीयता किसी व्यक्ति विशेष की नस्ल और मजहब के आधार पर संचालित न हो'। जिन्ना ने कहा था-"मैं नहीं जानता कि मजहब आधारित देश का मतलब क्या होता है? मुसलमानों ने तो 1300 साल पहले ही लोकतंत्र सीख लिया था"। ज़ाहिर था कि यह उन कट्टरपंथियों के लिए बड़ा झटका था, जो मजहबी आधार पर ही पाकिस्तान के अस्तित्व को मानते थे और जिनके लिए लोकतन्त्र का कोई मतलब नहीं था।
संविधान सभा में जिन्ना के भाषणों से यह वर्ग इतना ख़फ़ा हुआ कि उनके भाषणों के ये अंश ज़्यादातर अख़बारों में नहीं छपे। जिन्ना के बंगले में हथियारबंद मुस्लिम घुस गए। पकड़े जाने पर उन्होंने कहा कि वे जिन्ना की हत्या करने आए थे। ग्यारह सितंबर ,1947 को लाहौर में सड़कों पर जिन्ना मुर्दाबाद के नारे लगे और उनका पुतला जलाया गया। उनकी हत्या के चार प्रयास नाक़ाम हो गए।
जिन्ना के जीवित रहते ही क़रीबी दोस्त डॉक्टर मोहम्मद अयूब खुहरो ने सार्वजनिक तौर पर जिन्ना की निंदा की और उन्हें क़ायदेआज़म मानने से इनकार कर दिया ,उन्हें क़ाफ़िरे आज़म कहा। समारोहों में उन्हें खुले आम काफ़िर कहा जाने लगा। बात यहीं समाप्त नहीं होती। जब 11 सितंबर उन्नीस सौ अड़तालीस को जिन्ना का निधन हुआ तो जमात इस्लामी के नेता मौलाना मौदूदी ने उनके नमाजे जनाज़ा का नेतृत्व करने से इनकार कर दिया और जिन्ना की मौत की सार्वजनिक तौर पर खुशी मनाईं।
क्या इमरान ख़ान ने इतिहास के इन पन्नों पर नज़र डाली है?
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मौत से पहले ये कहा था जिन्ना ने
मौत से पहले जिन्ना इतने अकेले थे कि 23 जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को पेशावर के फ्रंटियर पोस्ट में जिन्ना ने लियाक़त अली खां को कथन के हवाले से छपा ,"मैंने जीवन की सबसे बड़ी भूल की है। अब अगर मुझे मौक़ा मिला तो मैं फौरन दिल्ली जाऊंगा और जवाहरलाल से कहूंगा कि अतीत की मूर्खतापूर्ण ग़लतियों को भूल जाएं ....
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। दस लाख से भी ज़्यादा लोगों के कत्लेआम पर बना देश जिन्ना के बाद धीरे-धीरे लोकतंत्र की गलियां भूलने लगा। पाकिस्तान की गाड़ी पटरी से उतर गई । इसके बाद पहला संविधान जिन्ना की मौत केआठ साल बाद याने उन्नीस सौ छप्पन में मंज़ूर हुआ।
यह संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं था और अल्पसंख्यकों की हिमायत नहीं करता था।आज की तरह ही इस पर फौज़ का कड़ा शिकंजा था। क्या इमरान ख़ान ने इतिहास के इन पन्नों पर नज़र डाली है? जो इमरान ख़ान दोस्ती की बात करता था, वह भारत में संप्रदायों के बीच फूट डालने की राजनीति करता है। क्या उन्हें पता है कि बीस फ़ीसदी अल्पसंख्यकों वाले पाकिस्तान में आज सिर्फ़ दो फीसदी आबादी अल्पसंख्यक बची है।
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