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मौत से पहले पाकिस्तान पर ये कह गए थे जिन्ना, इमरान सुनेंगे तो भूल जाएंगे अल्पसंख्यकों पर बोलना

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अल्पसंख्यकों के लिए बेहतरी की बात करके जिन्ना ने अपने लिए कितनी बड़ी आफ़त मोल ली थी। - फोटो : Social Media
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क्या बात करते हैं इमरान? पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बन जाने से ही अक़्ल नहीं आ जाती। अल्पसंख्यकों के नाम पर हिंदुस्तान को नसीहत दे रहे हैं। फ़ौज के हाथों में खेल रहे इमरान ख़ान जिन्ना का पाकिस्तान बनाना चाहते हैं। क्या उन्हें पता है कि अल्पसंख्यकों के लिए बेहतरी की बात करके जिन्ना ने अपने लिए कितनी बड़ी आफ़त मोल ली थी। उन्हें उसी पाकिस्तान में काफ़िर कहा गया था ,जो खुद उन्होंने बनाया था। यह सच है कि जिन्ना पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए अच्छी स्थितियां चाहते थे, लेकिन वे ऐसा कर नहीं पाए। इमरान ख़ान को यह सौ फीसदी सच कहानी ज़रूर जानना चाहिए।

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इस कहानी को जानना चाहिए इमरान को 
कहानी शुरू होती है 10अगस्त 1947 की  शाम से। लाहौर में रह रहे शायर जगन्नाथ आज़ाद से मोहम्मदअली जिन्ना ने चाय पर मुलाक़ात की इस दौरान जिन्ना ने कहा- आज़ाद साहब! पाकिस्तान बन रहा है। आप इस मुल्क़ के लिए पहला क़ौमी तराना लिख दीजिए। आज़ाद ने हैरत से उन्हें ताका। जिन्ना ताड़ गए। बोले-क्या सोच रहे हैं? आपसे क्यों कह रहा हूं? अरे भाई ! जब हिन्दुस्तान का सबसे मक़बूल कौमी तराना- सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा एक मुसलमान इक़बाल लिख सकता है, तो पाकिस्तान का क़ौमी तराना हिन्दू क्यों नहीं लिख सकता? आज़ाद ने हां कर दी।

बारह अगस्त को आज़ाद ने यह तराना- ऐ सर ज़मीने पाक..लिखा। जिन्ना ने मंज़ूर किया और चौदह अगस्त, उन्नीस सौ सैंतालीस की आधी रात को यह तराना पूरे पाकिस्तान ने सुना। क़रीब दो बरस यह पाकिस्तान का राष्ट्रगीत बना रहा। जब जिन्ना का निधन हो गया तो 1950 में इसे हटा दिया गया। इस बीच आज़ाद साहब को लाहौर में धमकियां मिलने लगीं तो बेचारे जम्मू आकर बस गए। उन्हें उम्दा शायरी के लिए पाकिस्तान का प्रेसिडेंशियल अवॉर्ड भी मिला था।  11 अगस्त को पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना ने कहा-" पाकिस्तान में अब आप आज़ाद हैं। अपने मंदिरों में जाने के लिए आज़ाद हैं, मस्जिदों में जाने के लिए आज़ाद हैं, पूजा के किसी भी स्थल पर जाने के लिए आज़ाद हैं। आप किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों इससे इस देश को फ़र्क़ नहीं पड़ता। 
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'जिन्ना पाकिस्तान में एक धर्मनिरपेक्ष, चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार चाहते थे - फोटो : File Photo
जब नाराज हो गए जिन्ना से लोग 
संविधान सभा की बहस का सारांश जस्टिस मोहम्मद मुनीर ने कुछ इस तरह से प्रस्तुत किया- 'जिन्ना पाकिस्तान में एक धर्मनिरपेक्ष, चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार चाहते थे ताकि पाकिस्तान की राष्ट्रीयता किसी व्यक्ति विशेष की नस्ल और मजहब के आधार पर संचालित न हो'। जिन्ना ने कहा था-"मैं नहीं जानता कि मजहब आधारित देश का मतलब क्या होता है? मुसलमानों ने तो 1300 साल पहले ही लोकतंत्र सीख लिया था"। ज़ाहिर था कि यह उन कट्टरपंथियों के लिए बड़ा झटका था, जो मजहबी आधार पर ही पाकिस्तान के अस्तित्व को मानते थे और जिनके लिए लोकतन्त्र का कोई मतलब नहीं था। 

संविधान सभा में जिन्ना के भाषणों से यह वर्ग इतना ख़फ़ा हुआ कि उनके भाषणों के ये अंश ज़्यादातर अख़बारों में नहीं छपे। जिन्ना के बंगले में हथियारबंद मुस्लिम घुस गए। पकड़े जाने पर उन्होंने कहा कि वे जिन्ना की हत्या करने आए थे। ग्यारह सितंबर ,1947 को लाहौर में सड़कों पर जिन्ना मुर्दाबाद के नारे लगे और उनका पुतला जलाया गया। उनकी हत्या के चार प्रयास नाक़ाम हो गए।

जिन्ना के जीवित रहते ही क़रीबी दोस्त डॉक्टर मोहम्मद अयूब खुहरो ने सार्वजनिक तौर पर जिन्ना की निंदा की और उन्हें क़ायदेआज़म मानने से इनकार कर दिया ,उन्हें क़ाफ़िरे आज़म कहा। समारोहों में उन्हें खुले आम काफ़िर कहा जाने लगा। बात यहीं समाप्त नहीं होती। जब 11 सितंबर उन्नीस सौ अड़तालीस को जिन्ना का निधन हुआ तो जमात इस्लामी के नेता मौलाना मौदूदी ने उनके नमाजे जनाज़ा का नेतृत्व करने से इनकार कर दिया और जिन्ना की मौत की सार्वजनिक तौर पर खुशी मनाईं। 
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क्या इमरान ख़ान ने इतिहास के इन पन्नों पर नज़र डाली है? - फोटो : File Photo
मौत से पहले ये कहा था जिन्ना ने 
मौत से पहले जिन्ना इतने अकेले थे कि 23 जनवरी उन्नीस सौ अड़तालीस को पेशावर के  फ्रंटियर पोस्ट में जिन्ना ने लियाक़त अली खां को कथन के हवाले से छपा ,"मैंने  जीवन की सबसे बड़ी भूल की है। अब अगर मुझे मौक़ा मिला तो मैं फौरन दिल्ली जाऊंगा और जवाहरलाल से कहूंगा कि अतीत की मूर्खतापूर्ण ग़लतियों को भूल जाएं .... 

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। दस लाख से भी ज़्यादा लोगों के कत्लेआम पर बना  देश जिन्ना के बाद धीरे-धीरे लोकतंत्र की गलियां भूलने लगा। पाकिस्तान की गाड़ी पटरी से उतर गई । इसके बाद पहला संविधान जिन्ना की मौत केआठ साल बाद याने उन्नीस सौ छप्पन में मंज़ूर हुआ।

यह संविधान धर्मनिरपेक्ष नहीं था और अल्पसंख्यकों की हिमायत नहीं करता था।आज की तरह ही इस पर फौज़ का कड़ा शिकंजा था। क्या इमरान ख़ान ने इतिहास के इन पन्नों पर नज़र डाली है? जो इमरान ख़ान दोस्ती की बात करता था, वह भारत में संप्रदायों के बीच फूट डालने की राजनीति करता है। क्या उन्हें पता है कि बीस फ़ीसदी अल्पसंख्यकों वाले पाकिस्तान में आज सिर्फ़ दो फीसदी आबादी अल्पसंख्यक बची है। 


 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.
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