चंद्रचूड़ ने न्यायालयों में समानता को बढ़ावा दिया और हाशिए पर रहने वाले समुदायों (जैसे दलित, आदिवासी, महिलाएं, और अन्य कमजोर वर्ग) के अधिकारों की रक्षा की।
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न्याय तक पहुंच आसान बनाने का प्रयास
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की ये पहलें न्याय तक पहुंच को आसान और सुलभ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हुईं। उनका उद्देश्य था कि न्याय केवल अदालतों में ही नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक के लिए सुलभ और सकारात्मक रूप से उपलब्ध हो। उन्होंने प्रत्येक नागरिक को शीघ्र और सुलभ न्याय की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके लिए न्यायालयों के कामकाज में सुधार के लिए कदम उठाए, जिससे लंबित मामलों की संख्या को घटाया जा सके और न्याय की गति को तेज किया जा सके।
चंद्रचूड़ ने न्यायालयों में समानता को बढ़ावा दिया और हाशिए पर रहने वाले समुदायों (जैसे दलित, आदिवासी, महिलाएं, और अन्य कमजोर वर्ग) के अधिकारों की रक्षा की। उनके द्वारा दिए गए फैसलों में इन समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन रोकने के लिए कई उपाय किए गए। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सभी को न्याय तक समान पहुंच मिले, और किसी भी व्यक्ति को भेदभाव या असमानता का सामना न करना पड़े।
मौलिक और महिला अधिकारों का सम्मान
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का भारतीय संवैधानिक कानून में सबसे महत्वपूर्ण योगदान के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में था। इस निर्णय में उन्होंने गोपनीयता के अधिकार को संविधान के तहत मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया। चंद्रचूड़ ने महिलाओं के अधिकारों और लैंगिक समानता की रक्षा करने वाले कई ऐतिहासिक फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (2018) में, उन्होंने धार्मिक विश्वासों के आधार पर राष्ट्रगान गाने से इनकार करने के अधिकार को बरकरार रखा, जो धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
इसके अलावा उन्होंने महिलाओं के धार्मिक स्थानों में प्रवेश के अधिकार का समर्थन किया और लिंग आधारित भेदभाव को चुनौती दी। अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ (2020) में इंटरनेट शटडाउन और विरोध के अधिकार पर उनके द्वारा दिया गया फैसला लोकतंत्र की मूलभूत स्वतंत्रताओं की रक्षा करता है। इस निर्णय ने यह स्थापित किया कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका का कर्तव्य है, विशेषकर डिजिटल युग में।
प्रेस की स्वतंत्रता और न्यायिक स्वायत्तता
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण फैसले दिये जो मीडिया की स्वतंत्रता और पत्रकारों के अधिकारों को सुरक्षित रखने में सहायक रहे। उन्होंने हमेशा प्रेस की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का मूल स्तंभ माना और इसे संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार के तहत सुरक्षित किया। उन्होंने सरकार और अन्य संस्थाओं द्वारा मीडिया पर लगाए गए दबाव और सेंसरशिप के खिलाफ कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए। उदाहरण के तौर पर, उन्होंने उन मामलों में मीडिया के अधिकारों का बचाव किया, जहां समाचारों और रिपोर्टों को नियंत्रित या रोकने की कोशिश की जा रही थी।
चंद्रचूड़ ने कई बार प्रेस की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत व्यक्तिगत और सामूहिक स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ा, जो कि नागरिकों को बोलने और विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड के प्रमुख निर्णय और फैसले
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कई महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं, जो भारतीय कानूनी परिदृश्य में स्थायी रूप से दर्ज हो गए हैं। एक जज और प्रधान न्यायाधीश के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान चंद्रचूड़ संविधान पीठ के फैसलों सहित 700 से अधिक फैसलों में शामिल रहे हैं, जिनमें से कई को उन्होंने लिखा और कुछ में उन्होंने असहमति जताई तो कुछ में सहमति भी व्यक्त की।
प्रधान न्यायाधीश के रूप में, वह 18 संविधान पीठों के फैसलों का हिस्सा थे। वह 104वें संशोधन अधिनियम 2019 को चुनौती देने वाली पीठ का भी हिस्सा थे, जिसने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए प्रदान किए गए आरक्षण को और 10 साल के लिए बढ़ा दिया।
अयोध्या राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले के फैसले (2019) में न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने विशेष रूप से अपनी असहमतिपूर्ण राय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जबकि पीठ के बहुमत (जिसमें मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस.ए. बोबडे, एन.वी. रमना और अन्य शामिल थे) ने राम जन्मभूमि ट्रस्ट के पक्ष में फैसला सुनाया और विवादित भूमि को राम मंदिर के निर्माण के लिए हिंदुओं को दे दिया लेकिन न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर असहमति जताई।
विशेष रूप से संपत्ति विवादों को नियंत्रित करने वाले कानूनी सिद्धांतों और धर्म और कानून के बीच संबंधों के मुद्दे पर राय दी। उन्होंने जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे की समाप्ति पर असहमति व्यक्त की और इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और परामर्शात्मक बनाने की आवश्यकता जताई।
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