हाराष्ट्र की राजनीतिक तासीर अलग है। यहां तीन दशकों से कोई भी सियासी पार्टी अपने दम पर बहुमत नहीं पा सकी है।
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भाजपा की रणनीति और सियासत
इधर, भाजपा जरांगे के प्रभाव क्षेत्र मराठवाडा में मराठो के खिलाफ ओबीसी को लामबंद करने की कोशिश कर रही है। इसमें कितनी सफलता मिलती है, यह देखने की बात है। ऐसे में महिलाओं को सीधे आर्थिक लाभ पहुंचाने वाली ‘लाडकी बहिण योजना और बूथ मैनेजमेंट पर ही भाजपा की जीत का काफी दारोमदार है।
दूसरे, राहुल गांधी के संविधान बचाओ अभियान पर पलटवार करते हुए केन्द्रीय मंत्री अमित शाह ने राहुल के हाथों में लाल किताब को ‘कोरी किताब’ कहा था। इसका दलितों में कैसा संदेश गया है, कहना मुश्किल है। हालांकि भाजपा और संघ के कुछ नेताओं का मानना है कि ‘कटेंगे तो... और लाडकी बहिण’ योजना का धमाका नतीजों में दिखेगा। लोगों को इसका अंदाज नहीं है।
वैसे इस चुनाव में मतदाताओं का एक तबका ऐसा भी है, जो सभी पार्टियों के रवैए से निराश है। ऐसे में वोटिंग प्रतिशत अगर घटा तो नुकसान सबसे ज्यादा महायुति को होगा। हालांकि भाजपा इस खतरे को लोकसभा चुनाव के बाद से समझ चुकी है। उसके वोट गिरें, इसकी पुरजोर कोशिश होगी।
इस बीच राजनीतिक प्रेक्षक इस बात का गहराई से अध्ययन कर रहे हैं कि योगी के ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारे का महाराष्ट्र में बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के मानस पर कितना असर हो रहा है और इसकी राजनीतिक परिणति क्या होगी? क्या योगी का यह नारा राज्य में फिर से हिंदू समाज को महायुति के पक्ष में एकजुट कर पाएगा, खासकर वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक के विरोध में मुस्लिम समाज में हो रही आक्रामकता एकता के संदर्भ में।
वैसे योगी के जिस ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ नारे को हिंदू एकजुटता के परिप्रेक्ष्य में रामबाण उपाय के रूप में देखा जा रहा था, वह महाराष्ट्र और झारखंड चुनाव प्रचार के शबाब पर आते आते शंका के घेरे में जरूर आ गया है। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस नारे का खुलकर समर्थन किया था। लेकिन महाराष्ट्र में इस मुद्दे पर खुद महायुति और राष्ट्रीय स्तर एनडीए भी बंटता नजर आ रहा है।
आंदोलनों और संघर्षो का इतिहास देखें तो नकारात्मक कहलाने वाले नारे ही लोगों को संगठित करने में ज्यादा असरकारी साबित होते हैं।
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कांग्रेस के अपने दांव
कांग्रेस तो पहले ही इसे नकारात्मक और साम्प्रदायिक सोच का नतीजा बता रही है, जबकि योगी और भाजपा इसे बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार की मिसाल देकर सही ठहरा रहे हैं। इसमें यह चेतावनी भी छिपी है कि अगर जनसांख्यिकीय बदलाव यूं ही होते रहे तो भारत में भी बहुसंख्यक हिंदुओं की वैसी ही हालत होने में देर नहीं लगेगी। इसीलिए झारखंड और अब मुंबई में भी मुसलमानों की बढ़ती आबादी, उसकी वजह से हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव तथा उसकी राजनीतिक परिणति को लेकर भी भाजपा नेता लगातार आगाह कर रहे हैं।
इसमें शक नहीं कि योगी के ‘कटेंगे तो बंटेगे’ नारे ने विपक्षी खेमे में खलबली मचा दी है। इस नारे की गूंज कनाडा के ब्रैम्पटन में भी सुनाई दी, जहां खालिस्तानी सिखों ने हिंदू मंदिर पर हमला किया था। ‘कटेंगे तो’ नारे को खारिज करने के लिए अलग अलग प्रति नारे गढ़े जा रहे हैं।
यूपी में नौ सीटों पर हो रहे विधानसभा उपचुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी ने इन नारे में निहित खतरे को भांपा और इसके जवाबी नारे गढ़ने की कोशिश की। शुरू में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि इस नारे को ध्यान में रखकर पीडीए समीकरण को एकजुट रहना चाहिए और उपचुनाव में भाजपा को सबक सिखाना चाहिए। लेकिन लगता है कि उससे बात नहीं और योगी के नारे के जवाब में ‘ जीतेंगे तो जुड़ेंगे’ और जैसे नारे गढ़े गए।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा पर जवाबी हमला करते हुए कहा कि ‘तुम ही कटोगे और तुम ही बंटोगे।‘ महाराष्ट्र में विपक्षी महाविकास आघाडी के घटक शिवसेना (उद्धव) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने चुनौती के स्वर में कहा कि हम महाराष्ट्र में किसी को न तो लूटने देंगे और न ही लुटने देंगे। लेकिन महाराष्ट्र में इस पर सत्तासीन महायुति के घटक राकांपा नेता अजित पवार ने भाजपा से अलग लाइन लेते हुए इस नारे को यह कहकर खारिज किया कि महाराष्ट्र का स्वभाव इस तरह बांटने का नहीं है। इसी झारखंड में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने नया नारा दिया ‘डरोगे तो मरोगे‘ तो भीम आर्मी पार्टी के चंद्रशेखर रावण ने कहा कि ‘पढ़ेंगे तो बढ़ेंगे।
अगर योगी के नारे का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो इसकी पहली पंक्ति ‘बंटेंगे तो कटेंगे भले ही नकारात्मक लगे, लेकिन दूसरी पंक्ति ‘एक रहेंगे तो नेक रहेंगे’ पूरी तरह सकारात्मक है। योगी ने यह नारा किस सोच और गणित के साथ दिया या फिर यह उनके मुंह से निकली परिस्थितिजन्य सहज अभिव्यक्ति थी, कहना मुश्किल है। लेकिन अगर वो चाहते तो दूसरी पंक्ति को पहले स्थान पर और पहली पंक्ति को दूसरे स्थान पर रख सकते थे। इससे वो राजनीतिक खलबली नहीं मचती, जो उनके इस नारे से हुई है।
वैसे भी आंदोलनों और संघर्षो का इतिहास देखें तो नकारात्मक कहलाने वाले नारे ही लोगों को संगठित करने में ज्यादा असरकारी साबित होते हैं। इसका कारण इसमें जनमानस में छिपे भय और आक्रोश का राजनीतिक सामाजिक दोहन होता है। भले ही उसका अंतिम परिणाम कुछ भी हो।
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