आने वाली पीढ़ी में इस हानि का आभास होगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी
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खुले विचार
माना समय बदलता है, जनरेशन बदलती पर जो अपशब्दों से भरी चीजें आप अपने रूम में बैठकर देखते थे, आज घर में हॉल के सोफे पर बैठ कर आसानी से देखी जा सकती है, क्योंकि घर के बड़े भी वही सब उसी सोफे पर बैठ कर देख रहे है तो उनको भी वो अब विचलित नहीं कर सकता।
दूसरी जगह पर घर के बड़ों के विचार में रूढ़िवादिता आज भी मिल जाएगी परंतु इस मामले में वो काफी खुले विचारों के हो गए हैं।
यूं तो हमारे हाथ में बहुत हद तक चीजें होती है जैसे कि घर में बढ रहे बच्चों को क्या माहौल देना है उसके लिए एक विकल्प ये भी है कि हम उनके सामने ये सब ना देखें, पर ये सब देख कर जो अप्रत्यक्ष विचार हममें भी कहीं ना कहीं पनपते है उसका क्या हल है क्योंकि वो बहुत हानिकारक है, इसके लिए जितना हो सके ऐसी भाषा से बचिए। ध्यान रहे, हमारे विचारो में यकीनन “शब्दों के संस्कार” खत्म होने जैसा माहौल बन गया है।
व्यक्तिगत स्तर पर रख सकते हैं ध्यान
आप निर्माताओं को नहीं रोक सकते और ना ही एक समुदाय बना कर उनके खिलाफ कोई मुहिम छेड़ सकते हो क्योंकि वो व्यहवारिक नहीं है। वो तो बस जो बिकता है वो बेच रहे हैं पर हां आप निश्चित ही व्यक्तिगत स्तर पर इसका ध्यान रख सकते है कि कब हमें क्या देखना है क्या नहीं देखना है किसके सामने कितना जरूरी है ये सब देखना और आखिरकार इन सबसे हमारे विचार या व्यहवार में क्या फर्क पड़ रहा है।
आज निश्चित ही समाज इससे होने वाली हानि का मुआयना नहीं कर पा रहा है, पर कल जब आने वाली पीढ़ी में इस हानि का आभास होगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी, अर्थात् आज ही अपने व्यक्तिगत स्तर पर जाग जाइए।
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