दरअसल हरि सिंह गुजराती थे। वहां उनका ख़ुद का ठीक ठाक व्यवसाय था जिससे उनकी आमद 50-60 हज़ार रुपए महीने की हो जाती थी। लेकिन उनके सिर पर विदेश जाकर पैसे कमाने का भूत सवार था। वे पढ़े लिखे नहीं हैं। जिससे उन्हें बाहर जाने में दिक़्क़त आती। चार साल पहले किसी तरह जुगाड़ करके उन्होंने सिंगापुर जाने का बंदोबस्त कर लिया था। वहां उन्हें साफ़ सफ़ाई के काम में नौकरी भी मिल गई। अच्छा पैसा कमाया और घर आकर यार दोस्तों के बीच ख़ूब शेखी भी बघारी। लेकिन अब चस्का कहीं और जाने का था। उनके कुछ रिश्तेदार पुर्तगाल में काम करते हैं।
पिछले साल हरि सिंह ने भी वहीं जाने का मन बनाया। लेकिन जाएं कैसे?उनके इस उतावलेपन की भनक जब एजेंट को लगी तो उसने हरि को सब्ज़बाग़ दिखाना शुरू किया। ग़ैर क़ानूनी तरीके से पुर्तगाल जाने के लिए उन्होंने 20 लाख रूपए एजेंट को दिये थे। बात यह हुई कि कुछ हवाई सफ़र और लंबे समुद्री सफ़र यानी जहाज़ के ज़रिये वे वहां पहुंच जाएंगे इस सफ़र में उनकी पत्नी भी साथ थी। लेकिन कारवां सही जगह नहीं पहुंच सका।
और फिर हुई ऐसी घटना
हरि सिंह बताते है कि एजेंट ने ग्रीस में आते -आते हाथ खड़े कर दिए। जाली काग़ज़ पर इससे आगे का सफ़र वह नहीं करा सकता था। लिहाज़ा ग्रीस में ही उन्हें उतरना पड़ा।बिना सही दस्तावेज़ के वे जाएं तो जाएं कहां? ग़ैरक़ानूनी तरीके से यूरोप पहुंचने के कारण क़ानूनी सज़ा भुगतने का डर उन्हें सता रहा था। लेकिन मोटी क़ीमत अदाकर यहां तक पहुंचे हरि को ख़ाली हाथ वतन लौटना भी नहीं है। उनके लिए बस यही विकल्प था कि वे ग्रीस में हीं कहीं रहे और किसी तरह अपने जीवन यापन की व्यवस्था करे।
काफ़ी मशक़्क़त के बाद भी पति पत्नी दोनों को एक साथ रहने और नौकरी पाने में कामयाबी नहीं मिली। बिना ज़रूरी दस्तावेज़ के विदेश में ख़ुद को भरोसेमंद साबित करना,काम पाने और रहने की व्यवस्था करना कितना मुश्किल रहा होगा इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जोड़े को बिछड़ना पड़ा। पत्नी को एथेंस में छोटा मोटा काम मिल गया।और हरि सिंह को सेंतोरीनी आना पड़ा।
कंस्ट्रक्शन के काम में किसी तरह घुस गए हैं, ताकि जीवन की गाड़ी आगे बढ़ सके। पिछले तीन महीने से वे सेंतोरीनी और पत्नी एथेंस में हैं। वे पराए शहर में अकेली रह रही पत्नी की सेफ़्टी को लेकर चिंतित नहीं हैं। वे बोलते हैं यहां रहने वाली अकेली महिलाएं भी पूरी तरह सुरक्षित हैं। लेकिन पैसे के अभाव में पत्नी से मिलना मुश्किल है। इसलिए वीडियो चैट का ही सहारा है।
हालांकि कंस्ट्रक्शन के काम में अब उनको 1500 यूरो महीने का मिल जाता है। पत्नी भी कुछ ऐसा ही कमा ले रही है। उम्मीद है कि उनकी आर्थिक हालत अब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी। लेकिन पुर्तगाल जाने का बुखार अबतक उतरा नहीं है। जब अपनी आपबीती सुनाने से उनका मन हल्का हुआ तो बोलने लगे कि अपने काग़ज़ बनवाकर कर एक दिन वे पुर्तगाल पहुंचेंगे। इसके बाद स्वीडन फिर नार्वे। अब इसके लिए उन्हें आगे क्या क़ीमत चुकानी होगी यह उन्हें नहीं पता। पर जाने का जोश ख़त्म नहीं हुआ है।
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