एंटोनोव एएन-32, जिसे NATO रिपोर्टिंग नाम ‘क्लाइन’ दिया गया है, एक ट्विन-इंजन टर्बोप्रॉप मिलिट्री ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट है। 1976 में अपनी पहली उड़ान भरने वाला यह विमान सोवियत काल का उत्पादन है, जिसे विशेष रूप से भारत की जरूरतों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था। एएन-26 का उन्नत संस्करण होने के कारण इसमें शक्तिशाली इंजन, बेहतर विंग हाई-लिफ्ट डिवाइसेस और ट्रॉपिकल/हाई-एल्टीट्यूड ऑपरेशंस के लिए मजबूत संरचना दी गई। 1984 में भारतीय वायुसेना में इसे शामिल किया गया। आज भी भारतीय वायुसेना के पास 100 से अधिक एएन-32 विमान सेवा में हैं, जो 12, 25, 33, 43, 48 और 49 स्क्वाड्रनों में तैनात हैं। जोरहाट स्थित 49 स्क्वाड्रन का यही विमान दुर्घटना का शिकार हुआ।
यह विमान 7.5 टन तक कार्गो, 50 पैसेंजर्स या 42 पैराट्रूपर्स ले जाने में सक्षम है। इसकी अधिकतम गति 530 किमी/घंटा और ऑपरेशनल रेंज इसे हिमालय, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों के लिए आदर्श बनाती है। ‘हॉट एंड हाई’ परिस्थितियों में उड़ान भरने की क्षमता के कारण यह भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स का अहम हिस्सा रहा है। फिर वो चाहे ट्रूप मूवमेंट हो, आपदा राहत हो या मेडिकल इवैक्यूएशन। हाल ही में बायो-जेट फ्यूल पर सफल उड़ानें भी इसका आधुनिक अनुकूलन दर्शाती हैं।
लेकिन इसकी सेवा का इतिहास दुर्घटनाओं से भी भरा है। 1986 से अब तक IAF में एएन-32 के 18 से अधिक प्रमुख हादसे दर्ज हैं। मार्च 1986 में जम्मू-कश्मीर में हुई दुर्घटना में 17 लोग मारे गए। उसी वर्ष अरब सागर में एक एएन-32 गायब हो गया। 1990 में केरल के पोनमुडी पहाड़ियों में पांच जवान शहीद हुए। 1992 में पंजाब में दो एएन-32 आपस में टकराए, जिसमें आठ मौतें हुईं। 1999 में दिल्ली एयरपोर्ट पर लैंडिंग के समय दुर्घटना हुई। 2009 में अरुणाचल में 13 लोगों की जान गई। 2016 में चेन्नई से पोर्ट ब्लेयर जाते हुए बंगाल की खाड़ी में 29 जवान लेकर एक एएन-32 गायब हो गया, जिसका मलबा पांच साल बाद मिला। 2019 में जोरहाट से मेचुका जाते हुए एक और क्रैश में 13 जवान शहीद हुए। मार्च 2025 में बागडोगरा में लैंडिंग हादसा हुआ और अब 2026 का जोरहाट हादसा।
ये दुर्घटनाएं अक्सर इंजन फेलियर, लैंडिंग पर असममित थ्रस्ट, मौसम या रखरखाव संबंधी मुद्दों से जुड़ी बताई जाती हैं। एएन-32 की उम्र 40 वर्ष से अधिक और स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता (यूक्रेन-रूस संघर्ष के कारण चुनौतीपूर्ण) सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती है। फिर भी, क्यों है यह विमान अभी भी भारतीय वायुसेना का मुख्य सहारा?
सबसे बड़ा कारण इसकी अपार उपयोगिता है: एएन-32 उन एयरफील्ड्स पर उतर सकता है जहां आधुनिक बड़े ट्रांसपोर्ट जैसे C-17 या C-130 हमेशा आसानी से नहीं पहुंच पाते। पूर्वोत्तर, हिमालयी क्षेत्रों और द्वीपों तक सप्लाई चेन बनाए रखना इसके बिना मुश्किल है। भारतीय वायुसेना के पास अभी इसका पूर्ण विकल्प नहीं है। मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (MTA) प्रोग्राम भविष्य की उम्मीद है, लेकिन वो अभी विकास चरण में है।
दूसरा, आधुनिकीकरण: 2009 में 400 मिलियन डॉलर के अनुबंध के तहत यूक्रेन से अवियोनिक्स, नेविगेशन, रडार और इंजन अपग्रेड किए गए। कई विमानों की सर्विस लाइफ 15-40 वर्ष बधाई गई। भारत में ही कानपुर और चंडीगढ़ के बेस रिपेयर डिपो पर अपग्रेडेशन जारी है। जीपीएस और टेरेन अवेयरनेस वॉर्निंग सिस्टम (TAWS) जैसी सुविधाएं भी जोड़ी गईं। भारतीय वायुसेना इसे ‘रिलायबल प्लेटफॉर्म’ मानता है, हालांकि हर दुर्घटना के बाद जांच और सुधार होते हैं।
तीसरा, आर्थिक और रणनीतिक वास्तविकता: नया विमान खरीदना महंगा और समय लेने वाला साबित हो सकता है। एएन-32 फ्लीट को बनाए रखना अपेक्षाकृत किफायती है, खासकर जब यह बहुमुखी भूमिकाएं निभाता है। भारतीय वायुसेना की कुल ट्रांसपोर्ट क्षमता में इसका योगदान बहुत बड़ा है।
फिर भी, इन दुर्घटनाओं से सबक लेना जरूरी है। रखरखाव, पायलट ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स का घरेलू उत्पादन और तेजी से आधुनिक विकल्पों पर जोर दिया जाना चाहिए। इसके लिए रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायुसेना को फ्लीट मैनेजमेंट में और पारदर्शिता लानी होगी। इसके साथ ही शहीदों की याद में उनके परिवारों को पूरा सम्मान और सहयोग मिलना चाहिए।
जानकर मानते हैं कि एएन-32 भारतीय वायुसेना के लचीलेपन का प्रतीक है। यह चुनौतियों के बीच भी ड्यूटी निभाता रहा। लेकिन ऐसे में सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। भविष्य में MTA, C-295 जैसे नए प्लेटफॉर्म्स के आने से इसकी भूमिका धीरे-धीरे बदलेगी। फिलहाल, जोरहाट जैसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि तकनीकी पुरातनता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए इतने हादसे होने के बाद भी यदि हम नहीं जागे तो यह एक अच्छा संदेश नहीं देगा।
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