Digital Loneliness And Cybercrime
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अपराध का नया मनोविज्ञान
पारंपरिक अपराधों में बल प्रयोग प्रमुख होता था। आधुनिक डिजिटल अपराधों में मनोविज्ञान प्रमुख है। आज अपराधी बंदूक से कम और भावनाओं से अधिक काम लेते हैं। वे पहले भरोसा पैदा करते हैं, फिर निर्भरता और उसके बाद भय। यही कारण है कि अनेक मामलों में पीड़ित व्यक्ति लंबे समय तक यह स्वीकार ही नहीं कर पाता कि वह किसी अपराध का शिकार हुआ है। उसे लगता है कि उसने स्वयं कोई गलती की है। यही अपराधियों की सबसे बड़ी सफलता होती है।
अपराध विज्ञान के विशेषज्ञ वर्षों से बताते रहे हैं कि अधिकांश सफल ठगी लालच से नहीं, बल्कि भावनात्मक प्रभाव से होती है। कहीं प्रेम का भ्रम पैदा किया जाता है, कहीं सहानुभूति का, कहीं निवेश का सपना दिखाया जाता है और कहीं सामाजिक प्रतिष्ठा खोने का डर। यानी अपराधी अब जेब नहीं, मन को निशाना बना रहे हैं।
भारतीय समाज में डर की भूमिका
भारत जैसे समाज में सम्मान, प्रतिष्ठा और सामाजिक छवि का महत्व अत्यधिक है। यही कारण है कि यहां कई बार लोग आर्थिक नुकसान सह लेते हैं, लेकिन सार्वजनिक शर्मिंदगी का जोखिम नहीं उठाना चाहते। यही मानसिकता अनेक प्रकार के ब्लैकमेल, साइबर उगाही और ऑनलाइन धमकी के मामलों को बढ़ावा देती है।
यदि किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिला दिया जाए कि उसकी निजी जानकारी सार्वजनिक हो सकती है, उसके परिवार तक पहुंच सकती है या उसके सामाजिक जीवन को प्रभावित कर सकती है, तो वह अक्सर तर्कसंगत निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रह जाता। भय मनुष्य की निर्णय क्षमता को कमजोर कर देता है। इसीलिए कहा जाता है कि आधुनिक अपराध की सबसे बड़ी मुद्रा पैसा नहीं, बल्कि भय है।
सोशल मीडिया : आईना या मुखौटा?
सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। आज कोई भी व्यक्ति अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकता है। लेकिन इसके साथ एक दूसरी समस्या भी पैदा हुई है। डिजिटल दुनिया में लोग अक्सर अपना वह रूप प्रस्तुत करते हैं जो वे दिखाना चाहते हैं, जरूरी नहीं कि वे वास्तव में वैसे ही हों। एक आकर्षक प्रोफाइल, कुछ तस्वीरें, कुछ साझा रुचियां और कुछ प्रभावशाली वाक्य इनसे किसी व्यक्ति की वास्तविकता का पता नहीं चलता।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से नकली तस्वीरें, नकली वीडियो और यहां तक कि नकली आवाजें तैयार करना भी संभव हो चुका है। आने वाले वर्षों में यह चुनौती और बढ़ सकती है। ऐसे में केवल डिजिटल पहचान के आधार पर किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करना और उस पर पूर्ण विश्वास कर लेना जोखिम भरा हो सकता है।
कानून की नजर में
ऐसी घटनाएं केवल नैतिक या सामाजिक समस्या नहीं हैं, बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य भी हैं। यदि किसी व्यक्ति को धोखे से फंसाया जाता है, उससे धन वसूला जाता है, उसे धमकाया जाता है, उसकी निजी जानकारी का दुरुपयोग किया जाता है या उसे मानसिक दबाव में रखा जाता है, तो भारतीय न्याय संहिता तथा सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अंतर्गत विभिन्न आपराधिक प्रावधान लागू हो सकते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में देश की साइबर अपराध शाखाओं ने ऐसे मामलों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया है। राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल और विभिन्न राज्यों की साइबर हेल्पलाइन भी नागरिकों को सहायता प्रदान कर रही हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पीड़ित व्यक्ति स्वयं को दोषी न माने। अपराधी का अपराध, अपराधी का ही उत्तरदायित्व है। कानून का उद्देश्य पीड़ित को संरक्षण देना है, न कि उसे शर्मिंदा करना।
केवल डिजिटल नहीं, भावनात्मक साक्षरता भी जरूरी
हम बच्चों को गणित सिखाते हैं, विज्ञान सिखाते हैं, कंप्यूटर सिखाते हैं, लेकिन बहुत कम लोग उन्हें भावनात्मक निर्णय लेना सिखाते हैं। किसी संबंध में भरोसा कैसे बनाया जाए? किसी व्यक्ति की मंशा को समझने के लिए किन संकेतों पर ध्यान दिया जाए? किस स्थिति में सावधान हो जाना चाहिए? भावनात्मक दबाव और भावनात्मक शोषण में अंतर कैसे पहचाना जाए?
ये प्रश्न भी आज उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने साइबर सुरक्षा के तकनीकी प्रश्न। डिजिटल साक्षरता का अर्थ केवल पासवर्ड सुरक्षित रखना नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि हम डिजिटल दुनिया में मानवीय व्यवहार को समझ सकें।
समाज को क्या करना चाहिए?
सबसे पहले हमें पीड़ितों को दोष देने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। जब भी कोई व्यक्ति ऐसे अपराध का शिकार होता है, समाज का एक वर्ग तुरंत उसे ही कठघरे में खड़ा कर देता है। यही कारण है कि अनेक लोग शिकायत दर्ज कराने से भी बचते हैं। दूसरा, परिवारों में संवाद बढ़ाना होगा। यदि घर का वातावरण ऐसा हो जहां व्यक्ति बिना भय के अपनी समस्या साझा कर सके, तो अपराधियों के लिए लोगों को अलग-थलग करना कठिन हो जाएगा।
तीसरा, विद्यालयों और महाविद्यालयों में डिजिटल नागरिकता, साइबर सुरक्षा और भावनात्मक स्वास्थ्य पर नियमित चर्चा होनी चाहिए। चौथा, हमें यह स्वीकार करना होगा कि तकनीक का युग केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का युग भी है। सबसे बड़ा सुरक्षा कवच तकनीक नहीं, विवेक है। डिजिटल दुनिया हमारे जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी है। इससे बचा नहीं जा सकता और न ही इसकी आवश्यकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसका उपयोग समझदारी से करें।
हर ऑनलाइन मित्र शत्रु नहीं होता, हर डिजिटल संबंध झूठा नहीं होता और हर नया परिचय खतरनाक नहीं होता। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि स्क्रीन के उस पार बैठे व्यक्ति की वास्तविकता को जाने बिना उस पर पूर्ण विश्वास कर लेना बुद्धिमानी नहीं है। आधुनिक समाज की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि अपराधी तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। चुनौती यह है कि वे मनुष्य की भावनाओं, अकेलेपन और भय को तकनीक के साथ जोड़कर इस्तेमाल कर रहे हैं।
इसलिए आने वाले समय में हमारी सुरक्षा केवल मजबूत पासवर्ड या आधुनिक सॉफ्टवेयर से सुनिश्चित नहीं होगी। वह हमारे विवेक, हमारी भावनात्मक परिपक्वता, हमारे सामाजिक संबंधों और कानून पर हमारे भरोसे से सुनिश्चित होगी। क्योंकि अंततः किसी भी डिजिटल जाल से बचाने वाली सबसे प्रभावी फायरवॉल मशीन में नहीं, मनुष्य के भीतर होती है।
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