बिहार में भी लगता है कि महागठबंधन अपनी हार पचा नहीं पा रहा है?
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बिहार में भी लगता है कि महागठबंधन अपनी हार पचा नहीं पा रहा है। हार के कारणों की सर्चिंग जारी है, लेकिन दूसरों के सिर पर ठीकरे फो़ड़कर। तेजस्वी यादव ने इसका ठीकरा चुनाव आयोग पर कह कर फोड़ा कि 20 सीटों पर मात्र 200 वोटों से भी कम अंतर से हारे। क्योंकि डाक मत पत्रो की गिनती में गड़बड़ी की गई।
इन मतपत्रों की गणना रात में क्यों की गई? हमने शिकायत भी की, लेकिन चुनाव आयोग ने उसे अनसुना किया। यानी इन सीटों पर चुनाव अधिकारियों ने राजग को जितवा दिया। इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं कि एक तो मतपत्रों की गिनती में गड़बड़ी आसान है। दूसरी तरफ हारी हुई पार्टी ईवीएम में भी गड़बड़ी के आरोप लगा रही है। फिर सही क्या है? जो लोग मतपत्रों से वोटिंग कराना ज्यादा सुरक्षित मानते हैं, उन्हें ट्रंप के आरोपों पर भी ध्यान देना चाहिए।
अमेरिका में पोस्टल बैलेट से वोटिंग होती है। वहां इन वोटों और ऑनलाइन वोटों की गिनती में भी गड़बड़ी के आरोप ट्रंप ने लगाए हैं। ट्रंप समर्थकों ने एक नारा दिया है ‘स्टॉप द स्टील’ यानी चोरी करना बंद करो! ट्रंप ने एक और लगाया कि चुनाव में गड़बडी की वजह वोटो की गिनती का काम उस वामपंथी कंपनी को देना है, जिसकी प्रतिष्ठा खराब है। उन्होंने दावा किया कि यदि वैध (लीगल) वोटों की गिनती, तो हो मैं ही जीतूंगा।
इधर मध्य प्रदेश में 28 में से 19 विधानसभा सीटों पर हार के बाद कांग्रेस ने कहा कि यह धन तंत्र की जीत है। जो नतीजे आए या जनता ने जो फैसला सुनाया, उसने कांग्रेस और भाजपा के चुनाव पूर्व आंतरिक सर्वे की पोल भी खोल कर रख दी। वैसे ऐसे सर्वेक्षणों की प्रामाणिकता संदिग्ध ही रहती है। लेकिन पलट कर यह जानना दिलचस्प है कि कांग्रेस के आंतरिक सर्वे में 28 में से 25 सीटों पर पार्टी की जीत पक्की मानी गई थी, क्योंकि कांग्रेस के मुताबिक इन सीटों पर ‘दलबदलू’ चुनाव लड़ रहे थे और जनता इनको उप चुनावों में सबक सिखाने के लिए उधार बैठी हुई थी।
उधर उपचुनाव पूर्व भाजपा के आंतरिक सर्वे में कहा गया था कि बीजेपी के 27 (एक सीट बाद में और बढ़ गई) सीटों में से सिर्फ 7 सीटों पर जीतने की संभावना है। लेकिन वास्तविक नतीजे ठीक उलट आए। कांग्रेस 19 सीटों पर हारी और भाजपा को 19 पर जीती। हालांकि, बीजेपी के आंतरिक सर्वे की एक बात काफी हद तक सही निकली कि ग्वालियर चंबल संभाग की अधिकांश सीटों पर पार्टी की स्थिति कमजोर है। लेकिन नतीजों से समझा जा सकता है कि किस पार्टी का सर्वे ज्यादा जमीनी और किसका हवाई था।
लोकतंत्र में चुनावशास्त्र की नैतिकता और अनैतिकता अंतिम हार-जीत से तय होती है।
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दरअसल, लोकतंत्र में चुनावशास्त्र की नैतिकता और अनैतिकता अंतिम हार-जीत से तय होती है। मतों की गणना और जनादेश से निर्धारित होती है। यहां 'जो जीता वही सिकंदर' होता है, तो हारे के खाते में सिर्फ हरिनाम ही बचता है। चुनाव में जीत का ताज (येन केन प्रकारेण ही सही) जिसके सिर रखा जाता है, उसके चाल चरित्र और नीयत को पवित्र मान लिया जाता है। कोई यह सवाल नहीं खड़ा करता कि भाई हमने यह चुनाव जीता तो इसके पीछे असल कारण क्या है? जनता का आशीर्वाद या फिर साम दाम दंड भेद का हथकंडावाद?
अर्थात् जीत का परवाना परमेश्वर कि पाती के रूप में लिया जाता है, तो हार की होम डिलीवरी में मिला खाली डिब्बे को भी बजा बजाकर देखा जाता है कि ऐसा हुआ तो किस कारण? इस आत्म विश्लेषण में खुद की गलती का बटन कोई दबाना नहीं चाहता। कहने का आशय ये कि चुनाव में हार कारण और उनकी नई-नई व्याख्याओं से हम रूबरू हो रहे हैं। अभी बिहार में राजद ने राजग की जीत की एक नई परिभाषा पेश की है।
महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट कि वो नीतीश कुमार शपथ ग्रहण समारोह को बहिष्कार कर रहे हैं, क्योंकि ‘जनादेश’ को ‘शासनादेश’ में बदल दिया गया है। यानी जनता तो हमे (महागठबंधन को) जिताना चाहती थी, लेकिन प्रशासन ने राजग के सिर जीत का सेहरा बांध दिया है। हालांकि, वो इस सवाल पर चुप हैं कि ‘शासनादेश’ के रहते 110 सीटें भी वो कैसे जीत गए?
इसका अर्थ यह नहीं कि चुनाव लड़ना कोई पवित्र नैतिक अनुष्ठान है और मिथ्याचार के लिए इसमें कोई गुंजाइश नहीं है। खासकर तब कि जब चुनाव लड़ना मैनेजमेंट में तब्दील हो गया है, उस स्थिति में चुनाव लड़ने से ज्यादा महत्वपूर्ण उसे ‘जीतना’ हो गया है।
बीजेपी ने इसमें महारत हासिल कर ली है, जबकि कांग्रेस अपने उन्हीं पिटे हुए तरीकों से चुनाव लड़ती है। लेकिन यह मैनेजमेंट भी तभी काम करता है, जब आप में जनभावना की नब्ज सही पहचानने की कूवत हो। लोकमानस के ऑक्सीमीटर पर गहराई से नजर हो। केवल नेताओं की रीडिंग और चश्मे के भरोसे गया कोई भी लड़ा गया चुनाव जीत की इबारत नहीं लिख सकता।
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