बीस सालों में 1396 तेंदुए मारे गए डी.एस. मीना, डीपी बुलानी, एम.एम. बिष्ट बौर डीएस. पुण्डीर के शोध पत्र ‘‘ह्यूमन वाइल्ड लाइफ कन्फिलिक्ट...’’ के अनुसार उत्तराखण्ड में सन् 2000 से लेकर 2020 तक लगभग 1396 तेंदुए मारे गए हैं। इनकी मौत का कारण अवैध शिकार, दुर्घटना, जंगल की आग के साथ जलना, सड़क या रेल दुर्घटना, आदमखोर होने के कारण मारा जाना और आपसी संघर्ष माना गया।
वन्य जीव संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार इनमें 648 गुलदार या तेंदुए प्राकृतिक मौत से, 152 दुर्घटनाओं में, 65 को मानव भक्षी घोषित होने पर मारा गया, 41 शिकारियों द्वारा अवैध शिकार से तथा 212 अज्ञात कारणों से मारे गए। वर्ष 2000 के बाद से नरेंद्रनगर वन प्रभाग में कुल 645 घटनाओं में 740 पशुओं की मौत साथ मानवों के घायल होने के लगभग 126 मामले और 36 मानव मृत्यु की घटनाएं दर्ज हुई हैं।
डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में 1 जनवरी 2020 से 30 नवंबर 2020 तक विभिन्न कारणों से लगभग 121 तेंदुए मृत पाए गए हैं। इसके अलावा, मानव वन्यजीव संघर्ष में, तेंदुए भी या तो अवैध रूप से या उत्तराखंड में आदमखोर घोषित होने के कारण मारे गए।
तेंदुओं का भी हो रहा बड़े पैमाने पर संहार
उत्तराखंड में मानवों के साथ ही तेंदुओं की मृत्युदर में भी वृद्धि देखी गई, जो मुख्यरूप से प्राकृतिक मौतों, अवैध शिकार, दुर्घटनाओं, घोषित खतरों, जलाए जाने, जंगल की आग, खाद्य विषाक्तता, आपसी लड़ाई और सड़क दुर्घटनाओं के कारण हुई।
डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 उसे लेकर 2015 तक उत्तराखण्ड में 166 तेंदुए और 16 बाघ मानवभक्षी घोषित कर उन्हें मारने के आदेश जारी हो चुके थे। टाइम्स आफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2000 से लेकर 2019 तक राज्य में 60 मानवभक्षी मारे गए। इनमें 4 बाघ और 56 तेंदुए थे।
उत्तराखण्ड के जिम कार्बेट कहे जाने वाले लखपत सिंह रावत अकेले ही अब तक 53 मानवभक्षी मार चुके हैं, जिनमें 51 तेंदुए और 2 बाघ शामिल हैं। उनके अलावा जॉय हुकिल ने भी कई मानवभक्षी मारे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अध्ययनों से पता चलता है कि सह-अस्तित्व की रणनीतियों के लिए सार्वजनिक जागरूकता, चराई पर्यवेक्षित चराई, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के बारे में जागरूकता, बचाव दल द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया, मानव बस्तियों के आसपास पौधों की अनावश्यक छतरी या झाड़ियों को हटाने से यह संघर्ष रोका या कम किया जा सकता है।
पहाड़ी राज्य होने कारण उत्तराखण्ड में कुछ अन्य राज्यों की तुलना में मानव-हाथी संघर्ष अपेक्षतया कम है फिर भी राज्य के मैदानी क्षेत्रों में यह संघर्ष एक गंभीर समस्या बनी हुई है। विशेष रूप से नरेंद्रनगर वनप्रभाग के शिवपुरी रेंज में और हरिद्वार वन प्रभाग के साथ ही पौड़ी वन प्रभाग के कोडिया तल्ला और मल्ला सहित गोहरी वन प्रभाग जो मानव और हाथी संघर्ष के लिए सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र हैं।
पिछले 3 सालों में उत्तराखण्ड में 28 लोग हाथियों द्वारा मारे जा चुके हैं तथा बड़े पैमाने पर हाथियों द्वारा फसलें नष्ट की जाती रही हैं। जबकि टाइम्स ऑफ इंडिया (23 नवम्बर 2020) की रिपोर्ट के अन्दर उत्तराखण्ड में विभिन्न कारणों से 2015 से लेकर 2020 तक 170 हाथी मारे जा चुके थे। इस दौरान 45 लोग हाथियों द्वारा मारे गए। अकेले 2019 में उत्तराखण्ड में 24 हाथियों की मौत हुई जिनमें कई हाथी रेल से कट कर मरे।
मानव वन्यजीव संघर्ष का मुख्य प्रभाव मानव और पशुधन की मौत और घायल होने के साथ ही लोगों की फसल को नुकसाान के रूप में सामने आता है। उत्तराखंड में, हर साल, बड़ी संख्या में लोग और जानवर घायल हो जाते हैं और मानव और वन्य जीवन संघर्षों के कारण मारे जाते हैं।
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