अब बारहवीं का छात्र विज्ञान के किसी अध्याय के कठिन शब्दों को आसान भाषा में समझाने के लिए एआई से कह सकता है। प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रहा कोई किशोर एआई से पूछ सकता है कि अभ्यास प्रश्न में उसने कहां गलती की। छोटे शहर का कोई भी छात्र बिना किसी संकोच के अपनी भाषा में अपने ढंग से सवाल पूछ सकता है। अब यह दूर की कौड़ी नहीं है। कई युवा पहले से ही सीखने, दोहराने, नई चीजें बनाने और नए हुनर सीखने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं।
ओपनएआई के वैश्विक आंकड़ों से पता चलता है कि दस में से नौ किशोर एक हफ्ते में सीखने और कौशल बढ़ाने के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल करते हैं। भारत में यह रुझान और भी अधिक स्पष्ट दिखता है। यहां सीखने और शिक्षा के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल करने वाले उपयोगकर्ताओं की संख्या वैश्विक तुलना में दोगुनी है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश के लिए, इससे बहुत सारे नए मौके खुलते हैं। यहां अच्छे शिक्षकों, गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री, भाषाई सहायता और छात्रों पर व्यक्तिगत ध्यान की उपलब्धता में काफी असमानता है। एआई सीखने की प्रक्रिया को अधिक वैयक्तिक, आसान और इंटरैक्टिव बनाकर इन कमियों को कुछ हद तक दूर करने में मदद कर सकता है।
लेकिन, इसके साथ एक अहम जिम्मेदारी भी आती है कि एआई युवाओं के लिए कैसे सुरक्षित हो? हम उन्हें नुकसान पहुंचाने वाले या उनकी उम्र के हिसाब से अनुचित कंटेंट से कैसे बचाएं? उन्हें एआई पर निर्भर होने से कैसे रोकें? और, कैसे पक्का करें कि एआई बच्चों के लिए सोचने के बजाय, उन्हें बेहतर ढंग से सोचने में मदद करे? इसलिए, किशोरों की सुरक्षा का अर्थ सिर्फ नुकसानदायक कंटेंट को ब्लॉक करना नहीं, बल्कि एआई का सुरक्षित, समझदार व स्वतंत्र इस्तेमाल करना भी होना चाहिए।
उम्र का अंदाजा लगाने वाली तकनीक सुरक्षा की एक और परत जोड़ सकती है। चैटजीपीटी 18 साल से कम उम्र के यूजर्स की पहचान करने और अपने-आप अतिरिक्त सुरक्षा उपाय लागू करने के लिए व्यवहार और अकाउंट-लेवल संकेतों का इस्तेमाल करता है। लेकिन, भारत में अक्सर परिवार के लोग फोन और कंप्यूटर साझा करते हैं, और लड़कियों के लिए इनका इस्तेमाल और भी सीमित हो सकता है। ऐसे में, अकाउंट पर दर्ज उम्र हमेशा उसे इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति की सही उम्र से मेल नहीं खाती। जाहिर है कि एआई कंपनियां अकेले किशोरों की सुरक्षा का समाधान नहीं कर सकतीं। किशोरों में खुद से सही फैसले लेने की क्षमता विकसित करने में माता-पिता, शिक्षकों और बड़ों की अहम भूमिका होती है-जैसे यह समझना कि एआई गलत हो सकता है, इस्तेमाल के गलत तरीकों को पहचानना और यह जानना कि कब इससे दूर हो जाना चाहिए। किशोरों की सुरक्षा सिर्फ किसी उत्पाद से जुड़ा सवाल नहीं, बल्कि समाज से जुड़ा मुद्दा है।
सुरक्षा का मतलब यह भी है कि एआई युवाओं को क्या करने के लिए प्रेरित करता है। क्या यह उनमें सही-गलत की समझ, जिज्ञासा व स्वतंत्र सोच विकसित करने में सहायता करता है? मसलन, अगर कोई छात्र गणित के किसी सवाल का जवाब मांगता है, तो एआई या तो सीधे जवाब दे सकता है, या उन्हें खुद उस सवाल को हल करने में मदद कर सकता है। युवाओं के लिए, हमें दूसरे तरीके को प्राथमिकता देनी चाहिए। जहां बड़े लोग काम तेजी से करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं, वहीं किशोरों के मामले में सीखने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
यह भी तय होना चाहिए कि असल में एआई उत्पाद कैसे काम करते हैं। मसलन, माता-पिता को ऐसे उपकरण दिए जा सकते हैं, जिनसे वे तय कर सकें कि उनके किशोर बच्चे एआई का इस्तेमाल कैसे करें; इसमें पढ़ाई के घंटे तय करना भी शामिल हो सकता है।
भारत के पास न सिर्फ युवाओं के लिए एआई अपनाने का, बल्कि यह तय करने में मदद करने का भी सुनहरा मौका है कि किशोरों के लिए जिम्मेदार एआई कैसा होना चाहिए। भारत का अनुभव दुनियाभर के युवाओं के लिए एआई को डिजाइन करने के मामले में सीख दे सकता है। अगर एआई हमारे बच्चों के सीखने और बढ़ने का हिस्सा बनने जा रहा है, तो उसके साथ उनकी सुरक्षा का भी ध्यान रखना जरूरी है।