पहला- निगरानी नेटवर्क को महत्वपूर्ण सुरक्षा ढांचे के रूप में देखा जाए। सार्वजनिक कैमरों की पहचान की जाए, उन्हें सुरक्षित नेटवर्क में रखा जाए और उनकी सुरक्षा मजबूत की जाए। इंटरनेट पर खुले कमजोर डिवाइस केवल गोपनीयता का नहीं, बल्कि सुरक्षा का भी खतरा हैं।
दूसरा- सभी महत्वपूर्ण डिजिटल सिस्टम में पहचान और एक्सेस नियंत्रण को मजबूत किया जाए। किसी सिस्टम का नियंत्रण खोना उसे बंद होने से ज्यादा खतरनाक हो सकता है। एडमिन अकाउंट, रिमोट एक्सेस, वेंडर लॉगिन और क्लाउड नियंत्रण को विशेष सुरक्षा दी जानी चाहिए।
तीसरा- विभिन्न क्षेत्रों में मिलकर काम करने वाली संकट तैयारी विकसित की जाए। अस्पताल, ऊर्जा, टेलीकॉम, बंदरगाह, परिवहन और सरकारी संस्थाएं केवल सामान्य आपदाओं के लिए नहीं, बल्कि साइबर संकट के लिए भी तैयार रहें, जहां डिजिटल हमले और गलत जानकारी एक साथ सामने आएं।
चौथा- एआई आधारित रक्षा और जोखिम विश्लेषण की क्षमता विकसित की जाए। इसका मतलब मशीनों को पूरी तरह नियंत्रण देना नहीं है, बल्कि एआई की मदद से तेज और बेहतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है, वह भी मानव नियंत्रण और नैतिक ढांचे के साथ।
पांचवां- सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग मजबूत किया जाए। देश का बड़ा डिजिटल ढांचा सरकार के पास नहीं है। यह टेलीकॉम कंपनियों, क्लाउड प्रदाताओं, अस्पतालों, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और अन्य संस्थाओं के पास है। अगर युद्ध इन नेटवर्कों के जरिए लड़ा जाएगा, तो तैयारी भी मिलकर करनी होगी।
पश्चिम एशिया का सबसे बड़ा सबक यह है कि साइबर और एआई अब युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि सामान्य डिजिटल सिस्टम ही ताकत भी बन सकते हैं और कमजोरी भी। जो कैमरा शांति में सुरक्षा देता है, वही युद्ध में निशाने तय करने का साधन बन सकता है। जो मोबाइल फोन रोजमर्रा का उपकरण है, वही जासूसी का माध्यम बन सकता है। जो क्लाउड सेवा सुविधा देती है, वही संकट में जोखिम बन सकती है।
भारत को यह समझना होगा कि भविष्य की सुरक्षा केवल नई तकनीक खरीदने से नहीं आएगी। असली सुरक्षा इस बात में है कि हम अपनी मौजूदा तकनीक को कितनी गंभीरता से सुरक्षित करते हैं। हर जुड़ी हुई प्रणाली एक तरफ सुविधा देती है, दूसरी तरफ जोखिम भी पैदा करती है।
(लेखक: लंदन में रहते हैं और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ हैं. राष्ट्रीय सुरक्षा व प्रौद्योगिकी विषयों पर लगातार लिख रहे हैं)
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