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Dol Utsav 2025: पश्चिम बंगाल में होली नहीं दोल उत्सव, बाकी देश से अलग है बंगाल में होली की परंपरा

सार

Dol Utsav 2025: पश्चिम बंगाल में होली को परंपरा बाकी देश के मुकाबले अलग और अनूठी है। देश भर में होली का त्योहार जहां होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में यह होलिका दहन के दिन ही मनाया जाता है।
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पश्चिम बंगाल में दोल उत्सव। (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
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Dol Utsav 2025: पश्चिम बंगाल में होली को परंपरा बाकी देश के मुकाबले अलग और अनूठी है। देश भर में होली का त्योहार जहां होलिका दहन के अगले दिन मनाया जाता है, वहीं पश्चिम बंगाल में यह होलिका दहन के दिन ही मनाया जाता है। यानी बंगाल एक दिन पहले ही यह त्योहार मनाता है और इसे यहां होली बल्कि दोल उत्सव या दोल जात्रा कहा जाता है।

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एक चीज और है जो होली को दोल उत्सव से अलग करती है। वह यह कि होली का त्योहार जहां भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप कथा से जुड़ा है वहीं दोल उत्सव राधा और कृष्ण के इर्द-गिर्द होता है। इनमें भी शांतिनिकेतन की होली तो दुनिया भर में मशहूर है। इसे देखने के लिए भारी तादाद में देशी-विदेशी लोग वहां पहुंचते हैं।

बंगाल के दोल उत्सव के पीछे की पौराणिक कथा यह है कि, कृष्ण ने राधा के प्रति अपना प्यार प्रदर्शित करने के लिए उनके चेहरे पर फाग (गुलाल जैसा रंगीन पावजर) मल दिया था। राधा उस समय सखियों के साथ झूला झूल रही थी। बांग्ला के दोल का मतलब भी झूला ही होता है।
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उसके बाद सखियों ने उन दोनों यानी राधा-कृष्ण को डोली में बिठा कर घुमाया था। इसी से दोल जात्रा शुरू हुई। सीधे शब्दों में कहें तो बंगाल का दोल राधा और कृष्ण के प्रेम के उत्सव के तौर पर मनाया जाता है।

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बांग्ला कैलेंडर का आखिरी त्योहार होने की वजह से राज्य में इसे बसंत के स्वागत के तौर पर भी मनाया जाता है। यानी बंगाल में दोल उत्सव महज पौराणिक कथाओं पर आधारित एक त्योहार ही नहीं बल्कि बसंत के स्वागत और रबी की फसल कटने का आनंद जताने का उत्सव भी है।

पश्चिम बंगाल के अलग-अलग इलाकों में इस दोल उत्सव का स्वरूप बी अलग-अलग है। मिसाल के तौर पर बांकुड़ा जिले के गोकुलनगर स्थित गोकुलचंद मंदिर में इसका स्वरूप एकदम अलग है। उस मंदिर में गोकुलचंद यानी कृष्ण की प्रतिमा को दोल के एक दिन पहले ही मंदिर में रखा जाता है।

इसके अलावा पूरे साल वह प्रतिमा विष्णपुर की राजबाड़ी यानी मल्ला राजाओं के महल मल्लाराजबाड़ी में रहती है। दोल उत्सव खत्म होने के बाद प्रतिमा को पुलिसिया पहरे में मंदिर से फिर राजबाड़ी पहुंचा दिया जाता है। यह परंपरा सदियों से जारी है। विष्णपुर को गुप्त वृंदावन भी कहा जाता है। यहां दो दिनों तक इस उत्सव का आयोजन किया जाता है।

इसी तरह नदिया जिले के शांतिपुर स्थित श्यामचंद मंदिर में दोल उत्सव के मौके पर एक दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है। यहां दोल उत्सव पूर्णिमा से रामनवमी तक चलता है। शांतिनिकेतन की होली का जिक्र किए बिना दोल उत्सव की चर्चा अधूरी ही रह जाएगी।

पश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले के शांतिनिकेतन में कविगुरु रबींद्रनाथ ठाकुर ने बेहतर शिक्षा मुहैया कराने के लिए विश्व भारती विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। लेकिन यह विश्वविद्यालय दोल के मौके पर वसंतोत्सव के आयोजन की वजह से पूरी दुनिया में अपनी खास जगह बना चुका है।

कोलकाता के जोड़ासांको स्थित रबींद्र भारती विश्वविद्यालय में भी शांतिनिकेतन की तर्ज पर ही  वसंतोत्सव का आयोजन किया जाता है। अंतर यही है कि यहां होली के दो-तीन दिनों पहले से ही इसका आयोजन शुरू हो जाता है। यहां पहली बार वर्ष 1962 में दोल और बसंत उत्सव मनाने की परंपरा शुरू हुई थी जो अब तक जस की तस है। इस दौरान नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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