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दूसरा पहलू: ताजमहल से भी कीमती था शाहजहां का तख्त-ए-ताउस, बनाने में 1150 किलो सोने का इस्तेमाल

Mon, 16 Jun 2025 07:03 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार

सार

मुगल शासक शाहजहां ने बाइबिल में वर्णित किंग सोलोमन के सिंहासन की तरह अपने लिए राजसिंहासन बनवाया था। तख्त-ए-ताउस को बनाने में 1,150 किलो सोना और 230 किलो रत्नों का इस्तेमाल हुआ था, जिनकी कीमत तब करीब 2.14 करोड़ रुपये थी।
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शाहजहां का तख्त-ए-ताउस - फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
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इतिहास के धुंधले गलियारों में बसी कुछ दास्तानें अधूरी-सी रह जाती हैं। कभी सारी दुनिया को चकाचौंध करने वाले तख्त-ए-ताउस की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। मुगल शासक शाहजहां ऐसा सिंहासन बनवाना चाहता था, जो किंग सोलोमन के जैसा हो। बाइबिल में सोलोमन के सिंहासन के वैभव का बखान है।

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शाहजहां ने वैसा ही सिंहासन बनवाने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया। तख्त-ए-ताउस या मयूर सिंहासन को बनाने में ताजमहल से दोगुना यानी 1,150 किलो सोना और 230 किलो रत्नों का इस्तेमाल किया गया। सिंहासन में बने दो मोरों की पूंछ भी सोने से बनी थी। मुगल इतिहासकार इनायत खान के अनुसार, इसे तब 2.14 करोड़ रुपये की लागत से बनवाया गया था।

17वीं सदी में आए फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने लिखा है कि सिंहासन सोने के छह विशाल पायों पर टिका था। टैवर्नियर ने लिखा है, इसकी छतरी को बेशकीमती रत्नों से सजाया गया था। शाही इतिहासकार अब्दुल हामिद लाहौरी ने लिखा है कि यह शासन की भव्यता का प्रतिबिंब था, जो 3.5 गज लंबा, दो गज चौड़ा और पांच गज ऊंचा था।
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अरबी और फारसी में मोर को ताउस कहते हैं, तभी इसे तख्त-ए-ताउस कहा गया। इसका वजन 31 मन 20 सेर था। हजारों कारीगरों ने इसे सात साल में तैयार किया। पहले यह आगरा किले के दीवाने आम में रहा, लेकिन जब राजधानी दिल्ली स्थानांतरित हुई, तो इसे लाल किले के दीवाने खास में रखा गया।

शाहजहां इसी पर बैठकर शाही फैसले सुनाता था, पर 1658 में शाहजहां को बेटे औरंगजेब ने आगरा किले में कैद कर लिया और वहीं उसकी मौत हुई। वर्ष 1739 में फारस के लुटेरे नादिर शाह ने दिल्ली पर हमला किया और तख्त-ए-ताउस भी अपने साथ ले गया।

1747 में नादिर शाह की उसके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद खजाने की लूट शुरू हो गई। उसी दौरान इसे तोड़ दिया गया और इसके कीमती हिस्से दुनिया भर में बिखर गए। ईरान पर 1794-1925 तक राज करने वाले कजर वंश के शाही सिंहासन के पाये तख्त-ए-ताउस के ही बताए जाते हैं।

इसका एक हिस्सा तुर्किये के तोपकापी पैलेस में है। न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन म्यूजियम में तख्त-ए-ताउस का एक पाया बताया जाता है, एक हिस्सा लंदन के एल्बर्ट म्यूजियम में है, पर पुख्ता तौर पर कोई जानकारी नहीं है।

तख्त-ए-ताउस को ऊंचे चबूतरे पर रखा गया, ताकि ईश्वरीय कृपा रहे। ...पर शाहजहां और तख्त-ए-ताउस, दोनों का ही अंत दुर्भाग्यपूर्ण रहा। तख्त-ए-ताउस कहां गया, किसी को ठीक से नहीं पता, और शाहजहां ने अपने आखिरी वर्ष जेल में काटे। यही तो इतिहास की विडंबना है।

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