द हार्ट डिवाइडेड’ नॉवेल (सांकेतिक)
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कई मुद्दों को उठाने वाले इस उपन्यास का कथानक परम्परा और आधुनिकता के इर्द-गिर्द घूमता है। विभाजन पूर्व हिन्दुओं और मुसलमानों में दोस्ती थी, परिवार भी संबंध कायम करते थे। सारी बातें युवाओं के माध्यम से की गई हैं। इनके अपने आदर्श हैं, अपनी प्रेरणाएं हैं। वे अपने अभिभावकों तथा अपने आसपास के समाज के परपम्परागत मूल्यों को चुनौती देते हैं। जोहरा पूछती है, ‘क्या समुदायों के कानून से बड़ कोई और कानून नहीं है?
मनुष्यता का कानून जो आदमी और आदमी के बीच बाधाओं को नकारे...’ समान समाज की बात करते हैं। अपनी तरह से समाज परिवर्तन का ख्वाब देखते हैं। निजी महत्वाकांक्षाओं, प्रेम, राजनीति के द्वारा वे यह करना चाहते हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर बहस करते हैं। उनकी ख्वाइश है कि कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग एक होकर काम करे।
यहां आदर्शवाद है और उसकी सीमाएं भी नजर आती हैं। हालांकि तमाम बौद्धिक बहस अर आदर्शवाद के बावजद उनके पास उनके देश के भविष्य की कोई व्यवहारिक योजना नहीं है। यथार्थ काफी कटु और कठोर है। उनका स्वप्न कभी पूरा नहीं होता है। अंतत: मनुष्यता एवं मनुष्यों की अकूत कीमत पर देश का विभाजन हो जाता है।
मोहिनी की कहानी
उपन्यास में एक हिन्दू एक्टिविस्ट लड़की मोहिनी भी है। ब्राहम्ण लड़की मोहिनी एवं हबीब में लगाव है, जाहिर-सी बात है, परिवारों को यह पसंद नहीं, मोहिनी परिवार के दबाव में है वह प्रेमी और माता-पिता के अपने प्रेम के बीच झूलती रहती है। उपन्यासकार मोहिनी को उन दिनों के राजरोग टीबी से समाप्त कर देती है क्योंकि उपन्यास में लिखा है, ‘तुम दोनों दोनों परिवारों केलिए बेइज्जती लाओगे अर सदा केलिए उन्हें जुदा कर दोगे।’ मुमताज अपने उपन्यास में स्त्री संबंधित मुद्दे उठाती हैं, खासकर मुस्लिम समाज की लड़कियों/औरतों से संबंधित मुद्दे।
जोहरा की सहेली नजमा अपने खानदान की इज्जत केलिए कुर्बान होती है, उसके घर वाले उसकी मर्जी के खिलाफ़ उम्र में 35 साल बड़े दुहाजू नवाब वकरुद्दीन के बेटे नसिरुद्दीन से उसकी सगाई करा देते हैं। जोहरा जिस आदमी को पसंद करती है, घर वालों की नजर में वह नीची जाति/वर्ग का है। वह नौकरी करती है और शादी से इंकार कर देती है। खानदान केलिए उसके ये निर्णय किसी झटके से कम नहीं हैं। औरतों का काम करना मतलाब खानदान की नाक कटना।
पढ़ी-लिखी सुगरा और उसके पति मंसूर की दुनिया बिल्कुल अलग है। मंसूर को उसके शरीर से मतलब है उसकी भावनाओं से नहीं। सुगरा मुस्लिम स्त्री के आदर्श को आत्मसात किए हुए सोचती है वह पति को अपनी सेवा से खुश रखेगी, उसका विश्वास है, घर ही औरत की जन्नत है। लेकिन शादी के बाद वह खुश नहीं है।
मुमताज दिखाती हैं कि विभाजन पूर्व हिन्दू-मुस्लिम एक इलाके में रहते हुए भी अपने-अपने रीति-रिवाज, संस्कृति से बंधे हुए थे। धर्म परिवर्तन के बिना इनमें शादियां नहीं हो सकती थीं। वे इन्हीं घरेलू नियमों, संस्कृति की भिन्नता, धार्मिक असहष्णुता, विचारों में भेद, राजनीतिक विभाजन को देश विभाजन केलिए उत्तरदायी मानती हैं।
एक बार ‘द हार्ट डिवाइडेड’ अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
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