राउल ने कभी मूवी कैमरा नहीं चलाया था, मगर उन्होंने 1958 में अफगानिस्तान में ‘द डेविल’स पास’ एडवेंचर फिल्म की शूटिंग की, फिल्म को बर्लिन फिल्म समारोह में सर्वोच्च पुरस्कार का नामांकन मिला। असल में उनसे कहा गया था कि कुछ फोटो लेने हैं। यदि वे जानते कि फिल्म बनानी है और उन्हें डॉयरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी का पद संभालना है, तो शायद वे कभी हां न कहते, ऐसा उन्होंने खुद 2001 में द गार्डियन पत्रिका को बताया। इसी फिल्म को देखने के बाद गोदार्द ने उन्हें अपनी पहली फिल्म ‘ब्रेथलेस’ के लिए ले लिया। और यह फिलम फ्रांस के सिनेमा केलिए मील का पत्थर साबित हुई।
फिल्म ‘ब्रेथलेस’ डॉक्यूमेंट्री शैली में बनी फिल्म है, जिसमें प्राकृतिक प्रकाश का उपयोग हुआ है, इस फिल्म के टटकेपन, ऊर्जा और कच्चेपन ने फ्रांस की चली आ रही चमकीली फिल्मों को धुंधला कर दिया और एक नई लहर चल निकली, जिसने पूरी दुनिया के सिनेमा को अपनी गिरफ्त में ले लिया।
राउल ने श्वेत-श्याम तथा रंगीन दोनों तरह की फिल्मों के लिए काम किया। दोनों तरह की फिल्मों की उनकी समझ बहुत गहरी थी। वे मानते थे कि जब कैमरामैन रंगीन फिल्म के साथ काम कर रहा होता है, वह जानता है, मनुष्य की आंख जितना संवेदनशील कोई फिल्म स्टॉक नहीं होता है। समस्या है, उनके समय की तकनीक और काम करने का अभ्यास प्रारंभिक कलर स्टॉक के साथ विकसित हुआ था। प्रारंभ से उनका तात्पर्य टेक्निकलर जैसे से था, जो बहुत लचीला नहीं होता है। फिल्म की कलर तकनीक विकसित होती गई परंतु कई फोटोग्राफर वहीं अटके रहे।
इसमें आने वाली एक समस्या अभिनेताओं के मेक-अप से जुड़ी हुई है। कलर फिल्म के लिए मेक-अप जरूरी है। पहले के सारे मेक-अप मैन टेक्निकलर के लिए अभ्यस्त थे, वे अभिनेता का मेक-अप लाल करते थे, जो उस तकनीक के लिए आवश्यक था। जब लेबोरटरी इस लाल को सही करना चाहती थी, वे कुछ नीला मिलाते थे।
सिनेमाटोग्राफर की चुनौतियां
गोदार्द अपनी फिल्म दीवाल के संग फिल्माना पसंद करते थे, अगर दीवाल नीली हुई, तो सब चौपट हो जाता था, अत: सिनेमाटोग्राफर को इन तकनीक परिवर्तन की जानकारी होना आवश्यक है और इनके साथ उन्हें अपनी कार्य पद्यति में बदलाव लाना चाहिए। ये सब पुरानी बातें हैं। अब काफी कुछ बदल गया है। फिल्म स्टॉक में आमूलचूल परिवर्तन आ गया है। कोडाक्रोम में बिना मेक-अप के भी सर्वोत्कृष्ट फोटो आते हैं।
वे बताते हैं, गेवर्ट (जेवर्ट) 36 फिल्म स्टॉक, जिसका बनाना बंद हो गया है, के कारण फिल्म ‘लोला’ इतनी खूबसूरत बन पड़ी है। यह तकनीक सफेद को उत्तम सफेद और काले को उत्तम काले में पकड़ने में सक्षम थी। इसका दानेदार टेक्चर वास्तविकता और वायवी का भास देता था। इसी कारण ‘लोला’ का 70% लालित्य आता है।
ऐसा समझदार सिनेमाटोग्राफर 92 वर्ष की आयु में जब 8 नवम्बर 2016 को गुजरा तो शोक संदेशों की बाढ़ आ गई।
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