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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: न्यूजीलैंड- अनोखी फिल्मों वाला देश

सार

जब से सिनेमा का जन्म हुआ तबसे न्यूजीलैंड सिनेमा का इतिहास प्रारंभ होता है। यहां जनता के लिए चलचित्र का पहला प्रदर्शन 1896 में हुआ था। 1898 में पहली बार फिल्म शूटिंग हुई। 1900 में बनी एक डॉक्यूमेंट्री सबसे पुरानी फिल्म प्राप्त होती है। 1914 में न्यूजीलैंड की पहली फ़ीचर फिल्म बनी थी।
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न्यूजीलैंड का सिनेमा इतिहास - फोटो : Istock
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विस्तार
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दक्षिण प्रशांत महासागर में स्थित न्यूजीलैंड के विषय में बाहरी लोगों को बहुत कम जानकारी है। न वे इसकी भौगोलिक स्थिति के बारे में बहुत जानते हैं और न ही उनकी इसकी सभ्यता-संस्कृति से उनकी पहचान है। क्रिकेट और कीवी के अलावा एकाध हिन्दी फिल्मों जैसे ‘कहो न प्यार है’, ‘ओम जय जगदीश’, ‘मैं प्यार की दीवानी’, ‘आई हेट लव स्टोरीज’, ‘मुझे कुछ कहना है’, ‘रहना है तेरे दिल में’ न्यूजीलैंड के मोहक-आकर्षक लोकेशन के सिवा सामान्य दर्शक शायद ही यहां के विषय में कुछ जानते हैं। ‘लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स’ देखी है तो वहा के लोकेशन से अभिभूत होंगे। ‘द पियानो’ फ़िल्म भी देखी है तो माओरी लोगों की झलक मिली होगी।

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टापुओं का समूह न्यूजीलैंड मुख्यरूप से दो बड़े भूखंड– उत्तर तथा दक्षिण आईलैंड में बसा हुआ है। राजधानी वेलिंग्टन और ऑक्लैंड दो प्रमुख शहर हैं। यहां रेगिस्तान, ज्वालामुखी, गुफ़ाएं, घाटियां, मैनग्रोव्स, झीलें, समुद्र तट, ग्लैशियर्स, पहाड़, अंगूर के बाग सब प्राकृतिक खूबसूरती के साथ उपस्थित हैं। वनस्पतियां एवं पशु-पक्षी (कीवी) भी अनोखे हैं। इन्हीं विशिष्टताओं के कारण यह सिने-लोकेशन तथा पर्यटन का केंद्र है।


इस आलेख में हम बात करेंगे यहां के सिने-इतिहास तथा कुछ फिल्मों की।


न्यूजीलैंड में सिनेमा की शुरुआत

जब से सिनेमा का जन्म हुआ तबसे न्यूजीलैंड सिनेमा का इतिहास प्रारंभ होता है। यहां जनता के लिए चलचित्र का पहला प्रदर्शन 1896 में हुआ था। 1898 में पहली बार फिल्म शूटिंग हुई। 1900 में बनी एक डॉक्यूमेंट्री सबसे पुरानी फिल्म प्राप्त होती है। 1914 में न्यूजीलैंड की पहली फ़ीचर फिल्म बनी थी।

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20वीं सदी में पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कई डॉक्यूमेंट्री बनीं। 3 जनवरी 1930 को न्यूजीलैंड में बनी पहली टॉकी’ फिल्म का प्रदर्शन हुआ था। 1970 के दशक में सामाजिक, राजनैतिक, कला और कलाकारों को लेकर कई डॉक्यूमेंत्री बनीं। ब्रुस पेटी की 1976 में बनी एनीमेटेड फ़िल्म का खास महत्व है, इस लघु फिल्म को अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। 1 अप्रैल 1981 को न्यूजीलैंड फ़िल्म संग्रहालय की स्थापना हुई।

1984 में ऑस्ट्रेलिया की ‘द वूमेन’स फिल्म युनिट की स्थापना हुई, इसी साल जेन कैम्पेन ने ‘आफ़्टर ऑवर्स’ बनाई। ‘लघु फिल्में कमतर नहीं होती हैं, वे भिन्न होती हैं’ कहने वाली, ऑस्ट्रेलिया में रह रही जेन कैम्पेन मूल रूप से न्यूजीलैंड की पैदाइश हैं। लीग से हट कर फ़िल्म बनाने वाली निर्देशक जेन कैम्पेन दो बार अकादमी, दो बार बाफ़्टा, दो बार गोल्डेन ग्लोब पुरस्कार जीत चुकी हैं।


‘द पियानो’, ‘द पॉवर ऑफ़ डॉग’, ‘द पोर्ट्रेट ऑफ़ ए लेडी’, ‘एन एन्जेल एट माई टेबल’, ‘होली स्मोक!’, ‘ब्राइट स्टार’ आदि उनकी कुछ फ़िल्में हैं। टीवी के लिए भी फ़िल्म बनाने वाली जेन कैम्पेन को ‘द पॉवर ऑफ़ डॉग’ केलिए सर्वोत्तम निर्देशक का अकादमी सम्मान मिला तथा ‘द पियानो’ केलिए सर्वोत्तम मूल स्क्रीनप्ले का अकादमी सम्मान प्राप्त हुआ है।


इस फिल्म को कई अन्य पुरस्कार मिले तथा इसके बेस्ट डॉयरेक्टर के रूप में जेन कैम्पेन का नामांकन हुआ था। जेन कैम्पेन ने होली हंटर, आना पाक्विन, बारबरा हरशी, क्रिस्टेन डनस्ट, जेस प्लेमोन्स जैसे दिग्गज अभिनेताओं को अपनी फ़िल्म में निर्देशित किया है।

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विश्व सिनेमा और न्यूजीलैंड में बनी फिल्में - फोटो : istock

न्यूजीलैंड फिल्म उद्योग पर नजर

न्यूजीलैंड फिल्म उद्योग काफ़ी विकसित है, यहां फिल्म निर्माण एवं पोस्ट प्रोडक्शन की काफी सुविधाएं उपलब्ध हैं। जेन कैम्पेन के अलावा पीटर जैक्सन, मर्टिन कैम्पबेल, ली टामाहोरी, पीटर जैक्सन की साथी फ़्रान वाल्श, एंड्रू एडमसन, निक्की कारो आदि अन्य कई विश्व प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक भी न्यूजीलैंड से आते हैं।
 
साथ ही सैम नील, रसल क्रो, क्लिफ़ कर्टिस, कैश कैसल-हग्स (‘व्हेल राइडर’, ‘पीस ऑफ़ माई हार्ट’, ‘ए हेवनली विलेज’ आदि), मेलिनी लिन्स्की (‘हेवनली क्रीचर्स’, ‘विन विन’, ‘स्वीट होम अलाबामा’ आदि), एलन डेल (‘दि एक्स फ़ाइल्स’, ‘वन्स अपॉन ए टाइम’, ‘इंडियाना जोन्स’, ‘द गर्ल विथ द ड्रैगन टैटू’ आदि), कार्ल अर्बन (‘व्हाइट फ़ैंग’, ‘स्टार ट्रैक’, ‘द लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स’ आदि), रोज मैकआइवर (‘द पियानो’, ‘द लवली बोन्स’, ‘डेफ़ोडिल्स’ आदि), ब्रूक विलियम्स (‘स्पार्टकस’, ‘12 मन्कीज’ आदि) आदि न्यूजीलैंड के कुछ प्रसिद्ध सिने अभिनेता एवं अभिनेत्री हैं।

कुछ अभी यहीं रह रहे हैं, कुछ ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों में बस गए हैं।

मूल निवासी माउरी पर विटि इहीमीरा तथा पैट्रिशिया ग्रेस जैसे रचनाकारों ने साहित्य रचा है। इन्होंने माउरी संस्कृति को साहित्य में अमर कर दिया है। विटि इहीमारा के उपन्यास ‘व्हेल राइडर’ पर इसी नाम से निकी कारो ने 2000 में फिल्म बनाई। यहां एक छोटी लड़की पाइकिया या पाई के पास शाश्वत एवं सटीक सहज ज्ञान है। वह वो आवाजें सुनती है जिसे कोई अन्य नहीं सुन पाता है, अस्तित्व की दुनिया से उसे संदेश मिलते हैं, जिन्हें केवल वह जानती है। वह पैदाइशी लीडर है।

दर्शक एक छोटी बच्ची को विशाल व्हेल की पीठ पर देखता है। माउरी परम्परागत पोशाक, माउरी मंत्र आदि देखता है। माउरी प्रमुख प्रतीक व्हेलदंत देखता है। निकी कारो के बारे में विटी इहीमीरा का कहना है, ‘निकी ने गजब का रूपांतरण किया है, उसने इसे अधुनातन बना दिया है। किइसा कैसल-हग्स के अभिनय, लीसा जेराल्ड के संगीत, लिओन नेरबाई की फ़ोटोग्राफ़ी, माउरी शब्दों के निरंतर प्रयोग केलिए इस फिल्म को देखा जाना चाहिए।

निकी कारो ने ही बायोपिक ‘द ज़ू कीपर्स वाइफ़’ (2017) बनाई है और एक सशक्त स्त्री को परदे पर उकेरा है। हैरी ग्रेगसन-विलियम्स का संगीत तथा एंड्रिज पारेख का कैमरा ‘द ज़ूकीपर्स वाइफ़’ फिल्म को विशिष्ट बनाता है। निकी कारो की रेंज दिखाती दोनों भिन्न मिजाज की फिल्में हैं। एक ओर न्यूजीलैंड की परिकथा-कहानी ‘व्हेल राइडर’ दूसरी ओर ‘द ज़ूकीपर्स वाइफ़’ जैसी ठोस और ब्लीक फिल्म। दोनों के केंद्र में सशक्त किशोरी/स्त्री है।

अनोखी, तीन ऑस्कर से नवाजी फिल्म ‘द पियानो’ में निर्देशिका जेन कैम्पियन ने पियानो को मुख्य किरदार के रूप में प्रदर्शित किया है, साथ ही उन्होंने 19वीं सदी के न्यूजीलैंड को साकार कर दिया है। गहन निहितार्थ की यह नारीवादी फिल्म उस युग के बहुत सारे मुद्दे उठाती है, जो आज भी प्रासंगिक हैं।

माइकेल निमैन के संगीत तथा स्टुअर्ट ड्राईबर्ग का कैमरा, लोकेशन, फिल्म की थीम, लाजवाब अभिनय, पर्यावरण, संस्कृतियों की टकराहट और भी बहुत कुछ है इस फिल्म में।

उपरोक्त फिल्मों के अलावा ‘गुडबॉय पोर्क पी’, ‘वन्स वेयर वारियर्स’, ‘बैड टेस्ट’, ‘मीट द फ़ीबल्स’, ‘टॉपलेस वीमेन टॉक अबाउट देयर लाइव्स’,‘हेवनली क्रीचर्स’, ‘डेड अलाइव’, ‘द क्वाइट अर्थ’ तथा ‘ब्लैक शीप’ न्यूजीलैंड की कुछ अन्य फिल्में हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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