फिल्मों में प्रोपेगेंडा का दौर
इसी समय प्रोपेगेंडा फिल्में भी बनने लगीं। जिसका सबसे अधिक फायदा उठाया मैक्सिको के नेता पैन्चो विला ने। उस पर अमेरिका के निर्देशक राऔल वैल्श ने भी 1914 में ‘द लाइफ ऑफ जनरल विला’ नाम से फिल्म बनाई। उसने इस माध्यम का इतना उपयोग किया कि उसके मरने के सौ साल बाद भी उसे याद किया जाता है।
हॉलीवुड तथा अमेरिकी दर्शक मैक्सिको के खूबसूरत लोकेल से विस्मित थे। वे पैन्चो विला के करिश्मा के भी प्रशंसक थे। अमेरिका और मैक्सिको पड़ोसी देश हैं मगर दोनों की संस्कृति और विचार में जमीन-आसमान का फर्क है। अमेरिका शुरू से मैक्सिको के प्रति विरोधी विचारों का प्रदर्शन करता रहा है। हॉलीवुड के ब्लैकलिस्टेड सिने-निर्देशक जैसे हर्बर्ट बिबेरमैन भी मैक्सिको आकर फिल्म बनाते रहे हैं।
पचास और साठ के दशक में कई अच्छी फिल्में आई, जिनमें से कुछ का जिक्र करना चाहूंगी। लुई बुनेल ने ही 1950 में अस्सी मिनट की फिल्म ‘द यंग एंड द डैम्ड’ बनाई, इस ड्रामा-क्राइम फिल्म में मैक्सिको सिटी के बस्ती इलाके का किशोर अपराधियों का एक समूह अत्याचार और अपराध भरी जिंदगी जी रहा है, जहां युवा पेड्रो की नैतिकता नष्ट कर धीरे-धीरे उसे भ्रष्ट बनाया जाता है।
फिल्म में एल्फांसो मेजी, रोबर्टो कोबो, एस्टेला इंडा आदि ने भूमिकाएं की है। लुई बुनेल ने 1962 में 95 मिनट की एक फंतासी बनाई, जिसमें उच्च वर्ग की एक डिनर पार्टी में मेहमान जाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं।
एक बहुत प्रसिद्ध कम्पोजर एल्बर्टो मेडीना रोड ट्रिप पर जाता है और उसकी कार पेट्रोल खत्म होने पर पहाड़ी से लुढ़क जाती है। जब वह सहायता के लिए कोशिश कर रहा है उसे एक घर मिलता है, जहां परिवार की आपत्ति के बावजूद स्त्री उसका स्वागत करती है। असल में ये लोग राहगीरों को रहने दिया करते थे, लेकिन अंतिम वाले राहगीर ने उन्हें धोखा दिया था इसीलिए परिवार विरोध कर रहा था।
99 मिनट की इस फिल्म ‘स्कूल फॉर ट्रैम्प्स’ (1955) में जलन, ईर्ष्या और तमाम अटपटी स्थितियां परिवार में दिखाई गई हैं। अंतत: एल्बर्टो न केवल परिवार का सम्मान अर्जित करता है वरन परिवार की सबसे बड़ी बेटी का दिल भी जीतता है। दोनों प्रेम में पड़ जाते हैं। फिल्म का निर्देशन रोजेलिओ ए. गोन्जालेज ने किया है, उसने ‘मैक्सिको 2000’ भी बनाई। यहां की फिल्म ‘फ्रीडा’ (1983) भी खूब प्रसिद्धि है।
वर्तमान की मैक्सिकन फिल्में
आज भी जब मैक्सिको की फिल्मों की बात होती है तो अक्सर लोग काले-सफेद गर्म ट्रोपिकल चमकते सूर्य, साफ-सुथरी टाइल्स वाले प्यारे गांव, बड़ा सा हैट लगाए, कढ़ाईदार बंड़ी पहने, गिटार लिए और बाल्कनी पर झुकी हुई, बालों में फूल सजाए अपनी काली आंखें चमकाती धूप में पकी सेनिरीटा की बात सोचते हैं। वे ऐसा मैक्सिको को देखते हैं जैसा वह है नहीं। वहां भी रेगिस्तान और दलदल में काम करते मजदूर हैं, गरीबी है, दु:ख-दर्द है।
मैक्सिको के एक खास जॉनर का नाम है ‘कॉमेडिया रैन्चेरा’ अर्थात ग्रामीण कॉमेडी है। ऐसी पहली फिल्म 1936 में बनी थी। पिछले कुछ सालों में ‘पैन’स लेबिरिंथ’, ‘बैबल’, ‘मिल्क’ जैसी अच्छी फिल्में मैक्सिको से आई हैं। 2018 की ‘रोमा’ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और सर्वोत्तम निर्देशन का ऑस्कर पाया।
इस सकारात्मक फिल्म में पारिवरिक तथा राजनैतिक उथल-पुथल के बीच एक नौकरानी जा जीवन और कार्य चित्रित है। ‘द स्टूडेंट’ सरकार की टैक्स इंसेन्टिव नीति तथा स्थानीय लोगों के पैसों से कम बजट में बनी फिल्म है जिसमें एक उम्र दराज व्यक्ति पढ़ने की अपनी इच्छा पूरी करते हुए शिक्षक बन जाता है।
आज मैक्सिको सिनेमा को खराब बाजार तथा पायरेसी-दो खतरे हैं। इसके बावजूद हम मैक्सिको के सिनेमा को देखते हुए अपना क्षितिज व्यापक कर सकते हैं।
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