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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मैक्सिको का सिनेमा- क्षितिज का विस्तार

सार

1905 में यहां फिल्म निर्माण तथा प्रदर्शन प्रारंभ हो गया। हालांकि मूक काल की फिल्में आज उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी एक सूत्र के अनुसार 1898 में मैक्सिको के पहले फिल्म बनाने वाले सल्वाडोर बैरागन ने एक रील की लघु फिक्शन फिल्म ‘डॉन जुआन टेनोरिओ’ नाम से बनाई थी। 
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फिल्म ‘स्कूल फॉर ट्रैम्प्स’ (1955) - फोटो : Twitter
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विस्तार
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पिछली सदी का तीस और चालीस का दशक मैक्सिको सिनेमा का स्वर्णयुग कहा जाता है। इस काल की फिल्मों में एडवेंचर, ड्रामा और रोमांस है। इस स्वर्णकाल में मैक्सिको फिल्म उद्योग ने अभूतपूर्व गुणवत्ता का परिचय दिया, साथ ही इस काल की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रहीं। जब दुनिया के अधिकतर देश द्वितीय विश्वयुद्ध से जोड़ कर फिल्में बना रहे थे, मैक्सिको के सिने-समाज ने अपनी अनोखी आवाज बुलंद की।

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इस देश ने विदेशी फिल्म निर्देशकों को खूब आकर्षित किया है। रूस के सर्गेई आइनस्सेटीन ने 1931 में ‘क्वो वीवा मैक्सिको’ बनाई तो ऑट्रिया के एल्फ्रेड जिनमैन 1934 में एक अन्य सिने-निर्देशक के साथ मिलकर ‘रेडेस/नेट्स नाम से फिल्म बनाई, जिसमें मैक्क्सिको के एक छोटे-से गांव के गरीब मछुआरों के कामगर के अधिकारों की बात कही गई है।

स्पेन के प्रसिद्ध सिने-निर्देशक, लेखक, फिल्म में सररियलिज्म के जनक लुई बुनेल ने मैक्सिको पर कई फिल्म बनाईं। उन्होंने ‘मैक्सिकन बस राइड’ बनाई। इस फिल्म में एक नवविवाहित आदमी को अपने हनीमून के दौरान अपनी मां के विषय में बुरी खबर मिलती है और वह नदियों-पहाड़ों से होता हुआ बस यात्रा करता है। उसे तमाम तरह के अनुभव होते हैं, तमाम विचार आते हैं। मैक्सिको के परम्परागत तथा आधुनिक जीवन के ज्ञाता लुई बुनेल यहां स्वप्न, सरलियलिज्म का खूबसूरत प्रयोग दिखाते हैं।
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1947 में प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक जॉन स्टीनबेक की कहानी पर आधारित ‘द पर्ल’ पर इसी नाम से 77 मिनट की एक फिल्म एमिलो फेर्नान्डेज ने बनाई। इस फिल्म में एक गरीब गोताखोर और उसके परिवार का जीवन एक सटीक मोती की प्राप्ति के बाद पूरी तरह से बदल जाता है।
 

मैक्सिको में फिल्म निर्माण तथा प्रदर्शन

14 अगस्त 1896 में लुमियर भाइयों ने सर्वप्रथम मैक्सिको सिटी में चलती-फिरती तस्वीरें दिखाईं। अगले ही साल स्थानीय लोगों की सिनेमा में रुचि जाग्रत हो गई और वे न्यूजरील बनाने लगे। मिलिट्री जुलूस, ट्रेन, राज्याभिषेक, विदूषक, एक्रोबैट पर छोटी-छोटी फिल्में बनने लगीं। लोग पागलों के तरह लाइन लगा कर इन्हें देखने पहुंचने लगे।

1905 में यहां फिल्म निर्माण तथा प्रदर्शन प्रारंभ हो गया। हालांकि मूक काल की फिल्में आज उपलब्ध नहीं हैं, फिर भी एक सूत्र के अनुसार 1898 में मैक्सिको के पहले फिल्म बनाने वाले सल्वाडोर बैरागन ने एक रील की लघु फिक्शन फिल्म ‘डॉन जुआन टेनोरिओ’ नाम से बनाई थी। 1900 में राजधानी मैक्सिको सिटी में कई थियेटर थे। इसी समय तीन रील की पूरी लंबाई वाली फीचर फिल्म ‘द पैशन ऑफ जीसेस क्राइस्ट’ बनाई।

एनरिक रोसास तथा टस्कानो ने स्पर्धा में अपने-अपने थियेटर बनाए। दोनों के पास अपने-अपने प्रोजेक्शन उपकरण, कैमरा, एडीटिंग सुविधा थी, वे अपनी फिल्म शूट करते और दिखाते। शुरू में वे डॉक्यूमेंट्री शैली में फिल्में बना रहे थे जिनमें खासतौर पर स्थानीय विशिष्ट लोगों, मैक्सिको की प्राकृतिक आपदाओं, बॉक्सिंग, साढ़ों की लड़ाई आदि दिखा रहे थे।

जनता का मनोरंजन हो रहा था, साथ ही वे पहली बार अपने देश की झलक देख पा रहे थे। न्यूजरील बनाने का सिलसिला सत्तर के दशक तक जारी रहा। 1995 में नोबेल पुरस्कृत साहित्यकार नजीब महफूज की रचना पर ‘मिदल ऐली’ फिल्म बनी।
 

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फिल्म ‘फ्रीडा’ (1983) - फोटो : Twitter

फिल्मों में प्रोपेगेंडा का दौर

इसी समय प्रोपेगेंडा फिल्में भी बनने लगीं। जिसका सबसे अधिक फायदा उठाया मैक्सिको के नेता पैन्चो विला ने। उस पर अमेरिका के निर्देशक राऔल वैल्श ने भी 1914 में ‘द लाइफ ऑफ जनरल विला’ नाम से फिल्म बनाई। उसने इस माध्यम का इतना उपयोग किया कि उसके मरने के सौ साल बाद भी उसे याद किया जाता है।

हॉलीवुड तथा अमेरिकी दर्शक मैक्सिको के खूबसूरत लोकेल से विस्मित थे। वे पैन्चो विला के करिश्मा के भी प्रशंसक थे। अमेरिका और मैक्सिको पड़ोसी देश हैं मगर दोनों की संस्कृति और विचार में जमीन-आसमान का फर्क है। अमेरिका शुरू से मैक्सिको के प्रति विरोधी विचारों का प्रदर्शन करता रहा है। हॉलीवुड के ब्लैकलिस्टेड सिने-निर्देशक जैसे हर्बर्ट बिबेरमैन भी मैक्सिको आकर फिल्म बनाते रहे हैं।
 
पचास और साठ के दशक में कई अच्छी फिल्में आई, जिनमें से कुछ का जिक्र करना चाहूंगी। लुई बुनेल ने ही 1950 में अस्सी मिनट की फिल्म ‘द यंग एंड द डैम्ड’ बनाई, इस ड्रामा-क्राइम फिल्म में  मैक्सिको सिटी के बस्ती इलाके का किशोर अपराधियों का एक समूह अत्याचार और अपराध भरी जिंदगी जी रहा है, जहां युवा पेड्रो की नैतिकता नष्ट कर धीरे-धीरे उसे भ्रष्ट बनाया जाता है।

फिल्म में एल्फांसो मेजी, रोबर्टो कोबो, एस्टेला इंडा आदि ने भूमिकाएं की है। लुई बुनेल ने 1962 में 95 मिनट की एक फंतासी बनाई, जिसमें उच्च वर्ग की एक डिनर पार्टी में मेहमान जाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं।

एक बहुत प्रसिद्ध कम्पोजर एल्बर्टो मेडीना रोड ट्रिप पर जाता है और उसकी कार पेट्रोल खत्म होने पर पहाड़ी से लुढ़क जाती है। जब वह सहायता के लिए कोशिश कर रहा है उसे एक घर मिलता है, जहां परिवार की आपत्ति के बावजूद स्त्री उसका स्वागत करती है। असल में ये लोग राहगीरों को रहने दिया करते थे, लेकिन अंतिम वाले राहगीर ने उन्हें धोखा दिया था इसीलिए परिवार विरोध कर रहा था।

99 मिनट की इस फिल्म ‘स्कूल फॉर ट्रैम्प्स’ (1955) में जलन, ईर्ष्या और तमाम अटपटी स्थितियां परिवार में दिखाई गई हैं। अंतत: एल्बर्टो न केवल परिवार का सम्मान अर्जित करता है वरन परिवार की सबसे बड़ी बेटी का दिल भी जीतता है। दोनों प्रेम में पड़ जाते हैं। फिल्म का निर्देशन रोजेलिओ ए. गोन्जालेज ने किया है, उसने ‘मैक्सिको 2000’ भी बनाई। यहां की फिल्म ‘फ्रीडा’ (1983) भी खूब प्रसिद्धि है। 


वर्तमान की मैक्सिकन फिल्में

आज भी जब मैक्सिको की फिल्मों की बात होती है तो अक्सर लोग काले-सफेद गर्म ट्रोपिकल चमकते सूर्य, साफ-सुथरी टाइल्स वाले प्यारे गांव, बड़ा सा हैट लगाए, कढ़ाईदार बंड़ी पहने, गिटार लिए और बाल्कनी पर झुकी हुई, बालों में फूल सजाए अपनी काली आंखें चमकाती धूप में पकी सेनिरीटा की बात सोचते हैं। वे ऐसा मैक्सिको को देखते हैं जैसा वह है नहीं। वहां भी रेगिस्तान और दलदल में काम करते मजदूर हैं, गरीबी है, दु:ख-दर्द है।

मैक्सिको के एक खास जॉनर का नाम है ‘कॉमेडिया रैन्चेरा’ अर्थात ग्रामीण कॉमेडी है। ऐसी पहली फिल्म 1936 में बनी थी। पिछले कुछ सालों में ‘पैन’स लेबिरिंथ’, ‘बैबल’, ‘मिल्क’ जैसी अच्छी फिल्में मैक्सिको से आई हैं। 2018 की ‘रोमा’ ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा और सर्वोत्तम निर्देशन का ऑस्कर पाया।

इस सकारात्मक फिल्म में पारिवरिक तथा राजनैतिक उथल-पुथल के बीच एक नौकरानी जा जीवन और कार्य चित्रित है। ‘द स्टूडेंट’ सरकार की टैक्स इंसेन्टिव नीति तथा स्थानीय लोगों के पैसों से कम बजट में बनी फिल्म है जिसमें एक उम्र दराज व्यक्ति पढ़ने की अपनी इच्छा पूरी करते हुए शिक्षक बन जाता है।

आज मैक्सिको सिनेमा को खराब बाजार तथा पायरेसी-दो खतरे हैं। इसके बावजूद हम मैक्सिको के सिनेमा को देखते हुए अपना क्षितिज व्यापक कर सकते हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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