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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: लेनी रिफेंस्थाल- हिटलर की गिरफ्त में निर्देशक

सार

बहुत सारी फिल्में हिटलर और उसके काम के प्रचार-प्रसार के लिए बनाने वाली जर्मन सिने-निर्देशक लेनी रिफेंस्थाल का काम विवादास्पद रहा। उसने फिल्म निर्माण में कई अनोखे प्रयोग किए। खुद कैमरे की कई नई तकनीकि विकसित की। उसने कैमरे को रेल पर रखा ताकि वह दौड़ने वाले की गति के अनुसार शूटिंग कर सके।
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लेनी रिफेंस्थाल हिटलर से रहीं प्रभावित - फोटो : Twitter
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विस्तार
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कई किशोर प्रारंभ में हिटलर के करिश्मा से चकित होकर उससे प्रभावित थे। उनमें से कई को जब हिटलर की असलियत पता चली तो उन्होंने उसके प्रति विद्रोह किया और अपने काम में उसके कारनामों का कच्चा चिट्ठा खोलते रहे। नोबेल पुरस्कृत उपन्यासकार गुंटर ग्रास ऐसे ही व्यक्ति थे। मगर कुछ लोग ताजिंदगी उसकी चमक-दमक से बाहर न आ सके और सारी उम्र उसके लिए काम करते रहे, तब भी जब वह उन्हें गिरफ्तार कर सता रहा था। ऐसी ही एक सिने-निर्देशक हुई हैं- लेनी रिफेंस्थाल। बहुत बाद में उसने भी अफसोस किया।

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बहुत सारी फिल्में हिटलर और उसके काम के प्रचार-प्रसार के लिए बनाने वाली जर्मन सिने-निर्देशक लेनी रिफेंस्थाल का काम विवादास्पद रहा। उसका पूरा नाम हेलेन बेर्टा अमाली रिफेंस्थाल था, उसका जन्म 22 अगस्त 1902 में बर्लिन में बेर्था तथा अल्फ्रेड रिफेंस्थाल के घर हुआ। असल में उसके जीवन का प्रारंभ एक प्रयोग से हुआ।

डांसर से बनी निर्देशक

वह मंच पर नाचने का अनुभव करना चाहती थी। डांसर के रूप में उसकी सफलता ने फिल्मों के लिए उसकी राह खोल दी। इसी समय उसने सिने-निर्देशक आर्नोल्ड फैंक का ध्यानाकर्षित किया और उसकी कुछ फिल्मों में अभिनय किया। आर्नोल्ड फैंक उसका मेंटर बन गया और जल्द ही वह सिने-निर्देशन के क्षेत्र में उतर गई।

1932 में पहाड़ों की यात्रा की रहस्यमई, रोमांटिक गाथा पर ‘द ब्लू लाइट’ बनी। इसमें लेनी ने इटली की आदर्शवादी लड़की युंटा की भूमिका निभाई। युंटा कठिन चढ़ाई के बाद उस जादुई चोटी पर पहुंचती है, जहां क्रिस्टल से चमकीली नीली रोशनी निकलती है। वहां के मिथक के अनुसार उस चोटी पर जाने वाला मृत्यु को प्राप्त होता है। मगर युंटा वहां जाकर रोशनी के मूल को देखती है।

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इसी समय हिटलर सत्ता में आया था। हिटलर ने सत्ता में आने पर लेनी को 1933 में न्यूरेम्बर्ग में होने वाली नाजी पार्टी की रैली को कैमराबद्ध करने को कहा, आज यह फिल्म ‘विक्ट्री ऑफ फेथ’ आज उपलब्ध नहीं है। 1934 की रैली फिल्म ‘ट्रैयम्फ ऑफ द विल’ उपलब्ध है। हिटलार ने ही लेनी को यह फिल्म बनाने केलिए कहा था।

हिटलर-नाजी आदर्शों का गुणगान करती, यह हिटलर की प्रोपेगंडा फिल्मों में शीर्ष पर है। यह फिल्म हिटलर तथा नाजी आदर्शों का गुणगान करती है। फिल्म को 1935 का ‘द जर्मन फिल्म प्राइज’ तथा 1937 में इंटरनेशनल ग्रैंड प्री मिला।1951 में उसने ‘द ब्लू लाइट’ को पुन: एडिट किया जो 1952 में प्रदर्शित हुई।

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लेनी रिफेंस्थाल ने फिल्मों में किए कई नए प्रयोग - फोटो : Twitter
जर्मन आर्म्ड फोर्स को संतुष्ट करने के लिए लेनी ने 1935 में ‘डे ऑफ फ्रीडम: आवर आर्म्ड फोर्सेस’ एक लघु फिल्म बनाई। अगले साल उन्हें 1936 के ओलंपिक खेलों पर दो भाग में फिल्म बनाने का काम भी मिला। उस साल ये खेल जर्मनी में हुए थे। ‘ओलंपिया’ नाम से ये फिल्में दो भाग (पहले भाग ‘फेस्टीवल ऑफ नेशन्स’, दूसरा भाग ‘फेस्टीवल ऑफ ब्यूटी’ नाम से) में बनी। 1938 में जाकर इनका प्रदर्शन हुआ। दूसरे भाग की फिल्म ‘फेस्टीवल ऑफ ब्यूटी’ अपनी कलात्मकता के लिए सराही गई।

हिटलर ने ही डलवाया जेल में

इसके बाद काफी समय तक लेनी के बुरे दिन चले। अट्ठारहवीं सदी के स्पैनिश ऑपेरा के आधार पर उसने ‘लोलैंड’ बनाई जिसे बनने के बीच ही 1944 में रोक दिया गया। इसी समय उसके पिता और भाई की मृत्यु हुई। वह खुद भी काफी बीमार पड़ गई, इसी समय उसने जर्मन आर्मी के एक मेजर पीटर जेकब से शादी की। पर इसी समय से हिटलर ने उसे निगरानी में रख दिया। बाद में ‘हिटलर्स फिल्म गॉडेस’ के नाम से जानी जाने वाली लेनी रिफेंस्थाल को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया, लेकिन बाद में दोषमुक्त करके छोड़ दिया गया। 

खूबसूरत लेनी रिफेंस्थाल दोबारा फिल्म जगत में अपने पैर न जमा सकी, उस समय की फिल्म बिरादरी ने उसका बॉयकॉट कर दिया। वह अपने काम में लगी रही, अफ्रीका गई और गुलाम व्यापार पर एक रंगीन डॉक्यूमेंट्री ‘ब्लैक कार्गो’ बनाई, अगले पंद्रह सालों में स्पेन में रहकर तीन स्क्रीनप्ले लिखे, और अपनी फिल्म ‘ओलम्पिया’ ले कर जर्मनी का दौरा किया। उसने ‘द लास्ट ऑफ द न्यूबा’ नाम से ढ़ेरों फोटोग्राफ्स प्रकाशित किए।

लंदन टाइम्स ने 1972 में म्यूनिख में होने वाले ओलंपिक खेलों को कवर करने के लिए उसे सौंपा। 1974 वह कोलोराडो में फिल्म समारोह में गई, उसे वहां से नाजी विरोधियों ने उठा लिया। ‘पीपुल ऑफ काऊ’ नाम से  1976 में उसने फोटोग्राफ्स का एक और भाग प्रकाशित किया। स्कूबा डाइविंग सीखकर उसने पानी के भीतर के कोरल जीवन पर फोटोग्राफी की और ‘कोरल गार्डेन’ नाम से प्रकाशित किया।

जर्मन निर्देशक रे म्यूलर ने 1993 में उसकी जीवनी पर एक फिल्म ‘द वंडरफुल, हॉरीबल लाइफ ऑफ लेनी रिफेंस्थाल’ बनाई। उसी साल उसकी आत्मकथा, ‘लेनी रिफेंस्थाल: ए बायोग्राफी’ प्रकाशित हुई। वह 100 साल की हुई तो उसने गहरे समुद्र में गोताखोरी पर ‘अंडरवाटर इंप्रेशंस’ प्रदर्शित की। 

कहने को लेनी भले ही विवादास्पद रही हो मगर उसने फिल्म निर्माण में कई अनोखे प्रयोग किए। वह बहुत साहसी तथा कुशल सिने-निर्देशक थी। उसने खुद कैमरे की कई नई तकनीकि विकसित की। उसने कैमरे को रेल पर रखा ताकि वह दौड़ने वाले की गति के अनुसार शूटिंग कर सके। उस समय जूम लेंसेस नहीं आए थे और कैमरे की आवाज या रेल की आवाज फिल्म में नहीं आनी चाहिए, इसलिए उसने ऐसे कैमरे का विकास करवाया जिनसे क्लोज-अप में भी कैमरे का शोर न रिकॉर्ड हो।


फिल्म निर्माण में किए कई अनोखे प्रयोग

घुड़सवारी को फिल्माने के लिए उसने ऑटोमेटिक कैमरे को एक बैग में रख दिया और कैमरे के चारों ओर के खाली स्थान को पंखों से भर दिया। इस बैग को उसने एक दूसरे घोड़े की काठी पर रखा और इस तरह घुड़सवारी को कुशलता से कैमरे में कैद कर लिया। 

इसी तरह उसने ऑटोमेटिक कैमरों को गुब्बारों से जोड़कर हवा में स्टेडियम के ऊपर उड़ा दिया ताकि होने वाले कार्यक्रमों की खूब बारीकी से फोटोग्राफी हो सके। उद्घाटन समारोह के समय उसने सिर के ऊपर से जहाज से शॉट्स लेने की योजना बनाई थी मगर वर्षा के कारण यह कार्य सफल न हो सका। इसी तरह उसने पानी के नीचे की शूटिंग के लिए विशेष तरह के कैमरा का प्रयोग किया। तैराकी के लिए छोटे कैमरे को रबर राफ्ट में जोड़ कर तैराक के साथ-साथ घुमाया-तैराया। इन्हीं सब नए प्रयोगों के लिए फिल्म इतिहास में लेनी रिफेंस्थाल को सदा याद किया जाएगा।

101 वर्ष की उम्र में इस जुझारू और कर्मठ फिल्म निर्देशक का सोते हुए 8 सितम्बर 2003 को निधन हो गया। असल में यूरोप के फिल्म जगत का ध्यान खींचने वाली लेनी रिफेंस्थाल कैंसर से मरी।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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