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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: मात्र डॉक्यूमेंट्री नहीं है कनाडा का सिने-इतिहास

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कनाडा की फिल्म- द केविन इन द वुड्स - फोटो : Twitter
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कनाडा के सिनेमा की बात चलते ही सबसे पहले वहां का खूबसूरत लोकेशन याद आता है। ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’, ‘द केबिन इन द वुड’ आदि फिल्मों में वेंकोवर नजर आता है, तो न मालूम कितनी फिल्मों में हमने न्याग्रा जलप्रपात की फुहारों का आनंद लिया है। आईएमडीबी की मानें तो कम-से-कम 142 फिल्मों में इसे दिखाया गया है। इसी तरह कनैडियन रोकीज कई फिल्मों में दिखाई पड़ते हैं। मगर ये अधिकांशत: हॉलीवुड सिनेमा में नजर आते हैं।

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कानूनन भी फिल्म बनाने के लिए कनाडा का उपयोग हॉलीवुड ही नहीं यूरोप के अन्य देश भी करते रहे हैं। कनाडा के दर्शक भी देशी से अधिक हॉलीवुड फिल्में देखना अधिक पसंद करते हैं। मगर इसका मतलब यह नहीं कि कनाडा में फिल्में नहीं बनती हैं।

कनाडा में फिल्म का पहला प्रदर्शन 28 जून 1896 को मोन्ट्रियल में हुआ था। जुलाई 1896 को होलैंड भाइयों ने ओटावा के वेस्ट एंड पार्क में एडीसन के विटास्कोप का प्रदर्शन जनता के लिए किया। जो दृश्य दिखाए गए उनमें से एक खूब चर्चित हुआ, यह ब्रॉडवे की अभिनेत्री में इर्विन का ‘द किस’ था। टोरोंटो में पहला प्रदर्शन अगस्त में हुआ तो दिसम्बर 1898 में पहला शो वेन्कोवर में हुआ।

कनाडा फिल्मों का इतिहास

कनाडा की पहली मूक फिल्म जो स्टूडियो में नहीं लोकेशन पर फिल्माई गई थी वह थी, ‘बैक टू गॉड’स कंट्री’। यह अपने समय की एक सफलतम फिल्म थी। इसमें एक बहादुर, स्वतंत्र तथा खुद को साबित करने वाली स्त्री को दिखाया गया है, जो मुसीबत में फंसे एक आदमी का उद्धार भी करती है। जेम्स फ्रीर ने प्रेइरीज में किसान के जीवन को प्रदर्शित करती फिल्म बनाई। उसी ने ‘अराइवल ऑफ सीपीआर एक्सप्रेस एट विनिपेग’ तथा ‘पैसिफिक एंड एटलांटिक मेल ट्रेन’ जैसी फिल्में भी बनाईं। ये फिल्में कैनेडियन पैसिफिक रेलवे द्वारा प्रायोजित थीं। वह इन फिल्मों को लेकर इंग्लैंड भी गया। इनकी सफलता का नतीजा हुआ, 1902 में फेडरल सरकार ने फ्रीर के एक और टूर को प्रायोजित किया। 

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1903 में कनाडा के फिल्म एक्चेंज की स्थापना मोंट्रियल में हुई और 1906 में मोंट्रियल में पहला थियेटर खुला। एक साल बाद मोंट्रियल में ही 1200 सीट का लक्जरी थियेटर खुला। इस दौरान जो फिल्में बन रही थीं, उनका आर्थिक पक्ष कनाडा के लोग संभाल रहे थे लेकिन उन्हें कनाडा के बाहर के लोग बना रहे थे। कनाडा के लोग, जैसे हेनरी विंटर, जेम्स स्कॉट केवल न्यूजरील तथा यात्रा संबंधित फिल्में बना रहे थे।

1913 में हेलीफेक्स में द कनैडियन बाइस्कोप कंपनी ने कनाडा की पहली फीचर फिल्म ‘इवांजलीन’ बनाई। यह एकाडियन्स के निष्कासन से संबंधित कविता के आधार पर बनी थी। इसे समीक्षकों और दर्शकों दोनों की प्रशंसा मिली। 1915 में बंद होने तक कंपनी ने कई फिल्में बनाई मगर कोई इतनी सफल न हो सकी। दि ऑल रेड फीचर कंपनी ने 1812 के युद्ध पर 1914 में ‘द वार पिजन’ फिल्म बनाई।

दि ऑन्टारिओ मोशन पिक्चर ब्यूरो दुनिया का पहला राज्य प्रायोजित फिल्म संगठन था। इसकी स्थापना 1917 में किसानों, बच्चों तथा फैक्टरी कर्मचारियों के शिक्षा कार्य के लिए की गई। यह 1934 में बंद हो गया। इसका मुख्य काम कनाडा के व्यापार तथा उद्योग का विज्ञापन करना था। इसने ‘सीइंग कनाडा’ नाम से एक शॉर्ट फिल्मों की शृंखला बनाई और उन्हें विभिन्न देशों में वितरित किया। इस काल की याद रखने योग्य फिल्म ‘द वाइकिंग’ (1931) है, इसमें सील के शिकारियों के कठिन जीवन को परदे पर दिखाया गया है। समृद्ध पर्यावरण में फिक्शन तथा नॉनफिक्शन का मिश्रण है यह फिल्म। हॉलीवुड की फिल्म ‘कैप्टन्स ऑफ द क्लाउड्स की तर्ज पर 1940 में ‘बुश पायलेट’ बनी।

1939 में नेशनल फिल्म बोर्ड की स्थापना हुई। 1967 में द कैनेडियन फिल्म डेवलेपमेंट कॉर्पोरेशन इस उद्योग को दस मिलियन डॉलर का फंड देने लगा। दस साल बाद यह पच्चीस मिलियन डॉलर हो गया। इस साल क्रिस्टोफर चैम्पमैन ने 17 मिनट की एक फिल्म ‘ए प्लेस टू स्टैंड’ बनाई जो बिना संवाद के ओन्टारिओ के जीवन को दिखाती है।

इसी साल माइकेल स्नो ने ‘वेवलेंथ’ नाम से प्रयोगात्मक लैंडमार्क फिल्म बनाई। 1967 में ही एलान किंग द्वार निर्देशित फिल्म ऑफ द इयर, सर्वोत्तम फीचर फिल्म तथा सर्वोत्तम फिल्म का स्पेशल पुरस्कार जीतने वाली फिल्म ‘वारेनडेल’ मानसिक रूप से अस्वस्थ बच्चों तथा उनके थेरेपिस्ट को दिखाती एक अनोखी फिल्म बनी।

1984 में इसका नाम बदल कर टेलेफिल्म हो गया। अब कनाडा के लोग कनाडा की पहचान के लिए फिल्म बनाने लगे। टोरोंटो न्यू वेव आंदोलन प्रारंभ हुआ जिसमें ब्रुस मैक्डॉनाल्ड, एटम इगोयन, पेट्रिशिया रोज़ेमा जैसे लोग जुड़े थे। ये सामाजिक आंदोलन से जुड़ी फिल्में बना रहे थे। रोजेमा ने ‘आई हैव हर्ड द मरमेड्स सिंगिंग’ बनाई जो एलजीबीटीक्यू से जुड़ी फिल्म है। 1988 में डेविड क्रोनेनबर्ग ने जुड़वां गायनाकॉलिस्ट पर एक हॉरर-मनोवैज्ञानिक फिल्म ‘डेड रिंगर्स’ बनाई। दोनों भाइयों को अलग पहचानना कठिन है और दोनों इसका फायदा उठाते हैं मगर जीवन में एक औरत के आने पर उनमें मतभेद होता है। 1997 की एटम इगोयन द्वारा निर्देशित, इआन होम, सराह पोली द्वारा अभिनीत फिल्म ‘द स्वीट हेयरआफ्टर’ दिखाती है कि बातें वैसी ही नहीं होती हैं जैसी वे नजर आती हैं।

इक्कीसवीं सदी और कनाडा की फिल्में

हाल के वर्षों में कनाडा से जो फिल्में आई हैं उन्होंने सिने-विश्व का ध्यान खींचा है। 2001 में वहां के आदिवासियों को लेकर जकरियाज कुनुक ने ‘इनुक्टिटुट: द फास्ट रनर’ एक मिथिकल गाथात्मक फिल्म बनाई, इसमें मात्र बर्फ के बीच का जीवन प्रदर्शित है। इस फिल्म ने इस जीवन के प्रति दुनिया की आंखें खोल दीं। इसमें एक योद्धा अपने पूरे समुदाय को बुरी आत्मा से बचाता है। 2007 में सररियलिस्ट फिल्म मेकर गाई मैडिन ने ‘माई विनीपेग’ डॉक्यूमेंट्री-फंतासी फिल्म बनाई, जिसने समीक्षकों और दर्शकों का ध्यान खींचा। 

2010 में कनाडा के लोकप्रिय निर्देशक डेनिस विलेनेउव ने ‘इंसेन्डीज’ बनाई जिसमें जुड़वां नवल मारवान तथा जीन मारवान अपने पारिवारिक इतिहास को जानने के लिए मिडिल ईस्ट की यात्रा करते हैं तथा अपनी मां की अंतिम इच्छा पूरी करते हैं। एक ऑस्कर (सर्वोत्तम अभिनेत्री: वाली ब्री लार्सन) के साथ कुल 108 पुरस्कार जीतने 2015 की करीब दो घंटे की ‘रूम’ फिल्म ऐसी ही है।

लेनी एब्राहम निर्देशित इस फिल्म में जन्म से एक छोटा लड़का जैक (जैकब ट्रैम्बले) और उसकी मां (ब्री लार्सन) अपहरण के बाद बरसों एक छोटे-से कमरे में कैद रखे जाते हैं। मां बच्चे को इस स्थान पर भी कैसे खुश रखती है, शिक्षित करती है, कैसे वे इस कैद से निकलते हैं, यह देखने और अनुभव करने की बात है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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