विश्व सिनेमा का इतिहास
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नब्बे के दशक में बांग्लादेश की फिल्में
अस्सी और नब्बे के दशक में सिनेमा यहां के गरीब और कम शिक्षित लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गया। धनी-मानी लोग वीसीआर की ओर मुड़ गए। बांग्लादेश अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए सिनेमा का सहारा लेने लगा। फिल्म उद्योग मुख्य रूप से ढ़ाका में था अत: यहां की फिल्में ‘ढ़ालीवुड’ (Dhallywood) के नाम से जानी जाने लगीं। काफी समय तक यहां की फिल्में न केवल भारत की फिल्मों से प्रभावित रहीं वरन उनकी नकल भी करती रहीं।
बांग्लादेश के सिने-निर्देशकों ने अपनी विरासत को सदैव स्मरण रखा है। बांग्ला साहित्याधारित सिनेमा तो प्रारंभ से बनता रहा है और आज भी यह जारी है। मुक्ति के बाद एक पहली अंतरराष्ट्रीय फिल्म है, ऋत्विक घटक की 1973 में बनी ‘तिस्ता एकटी नदीर नाम’ (A River Called Titas) जिसमें प्रबीर मित्र ने मुख्य भूमिका निभाई है। इस फिल्म को 2002 में ब्रिटिश फिल्म इंस्ट्यूट ने 10 सर्वोत्तम बांग्लादेशी फिल्मों में शामिल किया है।
शरतचंद्र की कहानी पर शाहिदुल अमीन ने ‘रामेर सुमति’ बनाई। जिसमें एक दुष्ट लड़के के कुछ घटनाओं बाद सुधरने की बात दिखाई गई है। उन्हीं के उपन्यास पर बुलबुल अहमद ने ‘राजलोखी-श्रीकांतो’ बनाई और उन्हीं की रचना पर मोहिउद्दीन फ़ारुक ने 1988 में ‘बिराज बोउ’ बनाई। अस्सी और नब्बे का दशक को बांग्लादेशी फिल्मों का स्वर्ण युग माना जाता है। अब्दुर रज्जाक, काबोरी सरवर, शबाना, फ़ारूक, शबनम, रोज़ीना, चम्पा, अमल बोस इस दौर के प्रसिद्ध अभिनेता-अभिनेत्री रहे हैं।
आलमगीर कबीर, तन्वीर मोकाम्मल, तारेक मसूद आदि इस देश में फिल्म में रियलिज्म तथा नेचुरलिज्म के वाहक रहे हैं। 8 मार्च 1955 को खुलना में जन्मे, सात पुरस्कारों से नवाजे गए लेखक-निर्देशक तन्वीर मोकाम्मल ने फीचर और डॉक्यूमेंट्री दोनों तरह की फिल्में बनाई। ‘नदीर नाम मधुमति’, ‘चित्रा नदीर पारे’,‘लालशालू’, बायोपिक ‘लालन’, ‘रुपशा नदीर बैंके’ आदि उनकी प्रमुख फिल्में हैं। इनकी कई फिल्में युद्ध और पलायन से जुड़ी हुई हैं।
बांग्लादेश से इस सदी में आने वाली कुछ फिल्में हैं: ‘आमजन’, ‘प्रेमेर ताजमहल’, ‘रॉन्ग नंबर’, ‘श्यामल छाया’, ‘प्रिया अमार प्रिया’, ‘तुमी स्वप्नो तुमी साधना’, ‘मोने प्राणो प्राणे आछो तुमी’, ‘माटिर मोयना’, ‘चंद्रग्रहन’। 2010 में खिजिर हयात खान ने ‘जागो’ नाम से प्रथम स्पोर्ट आधारित फिल्म बनाई।
भारत और बांग्लादेश सिनेमा
भारत और बांग्लादेश के सिने-व्यक्तित्व मिलजुल कर काम करते हैं। 2016 में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक गौतम घोष ने बांग्लादेश के सहयोग (इम्प्रेस टेले फिल्म्स एंड आशीर्वाद चलचित्र) से और वहां के अभिनेताओं (कुसुम सिकदार, ममुनुर रशीद आदि) को लेकर ‘शंखचील’ बनाई जिसे क्षेत्रीय भाषा की फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिल्म दोनों देशों में रिलीज हुई।
निर्देशक मुन्जुरुल इस्लाम मेघ मेरे मित्र हैं अभी हाल में वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोआ में आए हुए थे। 2020 में ‘ऑपरेशन सुन्दरबन’, ‘हवा’ जैसी सफल फिल्में यहां बनीं। आज बांग्लादेश में 100 प्रोडक्शन हाउस हैं। ढ़ाका इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, बांग्लादेश शॉर्ट फिल्म फ़ोरम, इंटरनेशनल शॉर्ट एंड इंडिपेंडेन्ट फिल्म फेस्टिवल जैसे समारोह आयोजित होते हैं। इसके अपने कई पुरस्कार तथा फिल्म एडुकेशन इंस्ट्यूटट हैं।
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