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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: पड़ोसी बांग्लादेश का सिने-इतिहास

सार

बांग्लादेश ने प्रारंभ से अपनी फिल्म की गुणवत्ता को निखारने का काम किया और करीब दो दशक में यहां प्रतिवर्ष 90 फिल्म बनने लगीं। फिल्म विभाग के प्रमुख अब्दुल जब्बार खान थे। कई फिल्में युद्ध पर बननी स्वाभाविक थीं। 1972 में पहली फुल लेन्थ फीचर फिल्म ‘ओरा एगारो जन’ बनी।
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1973 में बनी ‘तिस्ता एकटी नदीर नाम’ - फोटो : Twitter
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विस्तार
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आज के बांग्लादेश, इसके पूर्व का पुराना पाकिस्तान और उसके भी पहले का भारत के अंग के इस क्षेत्र की स्थिति बड़ी अजीब रही है। प्राकृतिक आपदा खासकर बाढ़, भयंकर गरीबी, अशिक्षा सदा से इसके साथ रही है और काफी समय दमन-अत्याचार और राजनैतिक उथल-पुथल भी इस इलाके ने झेली है। मगर भाषा और संस्कृति के मामले में यह स्थान बहुत समृद्ध रहा है। इसका पूर्वी पाकिस्तान से बांग्लादेश बनने में भाषा एक बड़ा कारण रही है। भारत विभाजन के पूर्व यह बंगाल का अंग था और पूर्वी बंगाल के नाम से जाना जाता था।

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भारत विभाजन के बाद यह पूर्वी पाकिस्तान कहलाया और दोनों हिस्सों में पर्याप्त दूरी के बावजूद पश्चिमी पाकिस्तान पूर्वी हिस्से पर हावी रहा। न केवल राजनैतिक रूप से बल्कि भाषा और सांस्कृतिक रूप से भी पूर्वी पाकिस्तान पर पश्चिम का दबाव बना रहा। अपनी भाषा को लेकर हर व्यक्ति के मन में एक अलग लगाव होना स्वाभाविक बात है और जब कोई उसकी भाषा का अपमान करता है अथवा उसे नष्ट करने का प्रयास करता है तो यह हमारा कर्तव्य और भावात्मक दायित्व प्राकृतिक रूप उसे बचाने का होता है।
 

बांग्लादेश के सिने-इतिहास की शुरुआत 1971 से

पूर्वी पाकिस्तान के लोगों का अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्य-सिनेमा से बहुत गहरा लगाव है अत: उन्होंने अपनी इस विरासत को बचाने के लिए जान की बाजी लगा दी। 1952 में बंगाली भाषा आंदोलन के दो वर्ष बाद ढ़ाका में शहीदुल आलम, अब्दुल जब्बर खान तथा काजी नुरुज़ामान की अगुआई में ‘को-ऑपरेटिव फिल्म मेकर्स लिमिटेड’ की स्थापना हुई। और भी कई कारण थे, नतीजन 1971 में बांग्लादेश का उदय हुआ। अत: जब हम बांग्लादेश के सिने-इतिहास की बात कर रहे हैं तो 1971 से शुरुआत करती हूं।

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बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के पूर्व 1971 में मात्र 6 फिल्में बांग्ला तथा दो उर्दू में रिलीज हुईं। ज़ाहिर रेहान ने 20 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ‘स्टॉप जेनोसाइड’ बनाई। इसमें उन्होंने 26 मार्च 1971 से 16 दिसम्बर 1971 के बीच पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा अपने देश की जनता पर हुए क्रूर अत्याचार को दिखाया और लोगों से इसे रोकने की अपील की। मानव-संहार और नस्ल नष्ट करने की इन घटनाओं की खूब आलोचना हुई थी।

इस देश से आने वाली यह पहली अंतरराष्ट्रीय सिने-पहल थी। 1971 में ही ईस्ट पाकिस्तान फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन का नाम बदल कर बांग्लादेश फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन कर दिया गया। 21वीं सदी के पहले दशक तक यही एक मात्र प्रमुख फिल्म स्टूडियो तथा कलर लैब था।

बांग्लादेश ने प्रारंभ से अपनी फिल्म की गुणवत्ता को निखारने का काम किया और करीब दो दशक में यहां प्रतिवर्ष 90 फिल्म बनने लगीं। फिल्म विभाग के प्रमुख अब्दुल जब्बार खान थे। कई फिल्में युद्ध पर बननी स्वाभाविक थीं। 1972 में पहली फुल लेन्थ फीचर फिल्म ‘ओरा एगारो जन’ बनी। युद्ध पर बनी इस ऐतिहासिक फिल्म की कहानी अल मसूद की है और मुक्ति संग्राम की कहानी कहती इस फिल्म का निर्देशन कासी नज़रुल इस्लाम (Chashi Nazrul Islam 11 अक्टूबर 1941-11जनवरी 2015) ने किया।

इन्हें 1986 में शरदचंद्र के उपन्यास ‘सुभदा’ पर इसी नाम से बांग्ला भाषा में फिल्म बनाने के लिए उस वर्ष के सर्वोत्तम निर्देशक के साथ सारे अन्य नेशनल पुरस्कार जीते। आलमगीर कबीर (‘धीरे बह मेघना’, ‘सूर्य कन्या’ तथा परिणिता’ आदि) और सुभाष दत्ता दो अन्य निर्देशकों ने इस दौरान युद्ध विषयक फिल्म बनाई।

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विश्व सिनेमा का इतिहास - फोटो : Istock

नब्बे के दशक में बांग्लादेश की फिल्में

अस्सी और नब्बे के दशक में सिनेमा यहां के गरीब और कम शिक्षित लोगों के मनोरंजन का प्रमुख साधन बन गया। धनी-मानी लोग वीसीआर की ओर मुड़ गए। बांग्लादेश अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाने के लिए सिनेमा का सहारा लेने लगा। फिल्म उद्योग मुख्य रूप से ढ़ाका में था अत: यहां की फिल्में ‘ढ़ालीवुड’ (Dhallywood) के नाम से जानी जाने लगीं। काफी समय तक यहां की फिल्में न केवल भारत की फिल्मों से प्रभावित रहीं वरन उनकी नकल भी करती रहीं।
 
बांग्लादेश के सिने-निर्देशकों ने अपनी विरासत को सदैव स्मरण रखा है। बांग्ला साहित्याधारित सिनेमा तो प्रारंभ से बनता रहा है और आज भी यह जारी है। मुक्ति के बाद एक पहली अंतरराष्ट्रीय फिल्म है, ऋत्विक घटक की 1973 में बनी ‘तिस्ता एकटी नदीर नाम’ (A River Called Titas) जिसमें प्रबीर मित्र ने मुख्य भूमिका निभाई है। इस फिल्म को 2002 में ब्रिटिश फिल्म इंस्ट्यूट ने 10 सर्वोत्तम बांग्लादेशी फिल्मों में शामिल किया है।

शरतचंद्र की कहानी पर शाहिदुल अमीन ने ‘रामेर सुमति’ बनाई। जिसमें एक दुष्ट लड़के के कुछ घटनाओं बाद सुधरने की बात दिखाई गई है। उन्हीं के उपन्यास पर बुलबुल अहमद ने ‘राजलोखी-श्रीकांतो’ बनाई और उन्हीं की रचना पर मोहिउद्दीन फ़ारुक ने 1988 में ‘बिराज बोउ’ बनाई। अस्सी और नब्बे का दशक को बांग्लादेशी फिल्मों का स्वर्ण युग माना जाता है। अब्दुर रज्जाक, काबोरी सरवर, शबाना, फ़ारूक, शबनम, रोज़ीना, चम्पा, अमल बोस इस दौर के प्रसिद्ध अभिनेता-अभिनेत्री रहे हैं।

आलमगीर कबीर, तन्वीर मोकाम्मल, तारेक मसूद आदि इस देश में फिल्म में रियलिज्म तथा नेचुरलिज्म के वाहक रहे हैं। 8 मार्च 1955 को खुलना में जन्मे, सात पुरस्कारों से नवाजे गए लेखक-निर्देशक तन्वीर मोकाम्मल ने फीचर और डॉक्यूमेंट्री दोनों तरह की फिल्में बनाई। ‘नदीर नाम मधुमति’, ‘चित्रा नदीर पारे’,‘लालशालू’, बायोपिक ‘लालन’, ‘रुपशा नदीर बैंके’ आदि उनकी प्रमुख फिल्में हैं। इनकी कई फिल्में युद्ध और पलायन से जुड़ी हुई हैं।

बांग्लादेश से इस सदी में आने वाली कुछ फिल्में हैं: ‘आमजन’, ‘प्रेमेर ताजमहल’, ‘रॉन्ग नंबर’, ‘श्यामल छाया’, ‘प्रिया अमार प्रिया’, ‘तुमी स्वप्नो तुमी साधना’, ‘मोने प्राणो प्राणे आछो तुमी’, ‘माटिर मोयना’, ‘चंद्रग्रहन’। 2010 में खिजिर हयात खान ने ‘जागो’ नाम से प्रथम स्पोर्ट आधारित फिल्म बनाई।


भारत और बांग्लादेश सिनेमा

भारत और बांग्लादेश के सिने-व्यक्तित्व मिलजुल कर काम करते हैं। 2016 में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक गौतम घोष ने बांग्लादेश के सहयोग (इम्प्रेस टेले फिल्म्स एंड आशीर्वाद चलचित्र) से और वहां के अभिनेताओं (कुसुम सिकदार, ममुनुर रशीद आदि) को लेकर ‘शंखचील’ बनाई जिसे क्षेत्रीय भाषा की फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। फिल्म दोनों देशों में रिलीज हुई।

निर्देशक मुन्जुरुल इस्लाम मेघ मेरे मित्र हैं अभी हाल में वे अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोआ में आए हुए थे। 2020 में ‘ऑपरेशन सुन्दरबन’, ‘हवा’ जैसी सफल फिल्में यहां बनीं। आज बांग्लादेश में 100 प्रोडक्शन हाउस हैं। ढ़ाका इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल, बांग्लादेश शॉर्ट फिल्म फ़ोरम, इंटरनेशनल शॉर्ट एंड इंडिपेंडेन्ट फिल्म फेस्टिवल जैसे समारोह आयोजित होते हैं। इसके अपने कई पुरस्कार तथा फिल्म एडुकेशन इंस्ट्यूटट हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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