अफगानिस्तान में फिल्मों का इतिहास
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इस सदी की बात करें तो मरियम घानी अफगान सिने-संसार में एक बड़ा नाम है। इस विजुअल आर्टिस्ट, लेखक, लेक्चरर, प्रड्यूसर, फिल्म मेकर ने 2019 में फिल्म ‘व्हाट वी लेफ़्ट अनफिमिश्ड’ बनाई है। एक घंटा ग्यारह मिनट की यह फिल्म उनकी पहली फीचर फिल्म है। यह फिल्म कम्युनिस्ट शासन (1978-1991) के दौरान अफगानिस्तान में फिल्म बनाने की कहानी कहती है, जिसमें पांच ऐसी फिल्मों को लिया गया है, जिनके बनाते समय इन्हें बनाने वालों की जिंदगी पर बन आई थी।
वे सत्ता के निशाने पर थे, मगर फिल्म बनाने का काम पागलपन के साथ कर रहे थे। ये पांच फिल्में हैं, ‘दि एप्रिल रिवोल्यूशन’, ‘डाउनफ़ॉल’, ‘द ब्लैक डाइमंड’, ‘रॉन्ग वे’ तथा ‘एजेंट’। मरियम घानी शॉट फिल्म भी बनाई 22 मिनट की ‘ए ब्रीफ़ हिस्ट्री ऑफ़ कोलाप्सेस’ (2012) एवं ‘द फ़ायर दिस टाइम’ (2022)।
अफगानिस्तान में कभी बड़ी मात्रा में फिल्में नहीं बनीं। फिल्म निर्माण में यहां बार-बार बाधाएं आती रहीं। एक समय यहां ‘द फोरबिडेन रील’, ‘ए फ़्लिकरिंग ट्रुथ’ जैसी फिल्में बनीं। इस सदी की यहां बनने वाली अच्छी और प्रसिद्ध फिल्मों में से एकाध को देखना रोचक होगा।
डॉक्यूमेंट्री ‘चिल्ड्रेन ऑफ काबुल’
2011 में एक डॉक्यूमेंट्री आई ‘चिल्ड्रेन ऑफ काबुल’। 25 मिनट की इस फिल्म को जॉन बौघर ने बनाया था। इसमें युद्ध से क्षत-विक्षत अफगानिस्तान की सड़कों और बाल श्रमिकों की त्रासदी को परदे पर दिखाया गया है। ओमिद, सैनबार, यास्मिन तथा फ़ैयाज को परिवार की आय केलिए कार धो रहे हैं, कचड़ा बीन रहे हैं, लोहा पीट रहे हैं, खाना बेच रहे हैं।
युद्ध और आर्थिक कठिनाइयों को बच्चे झेल रहे हैं। देश का भविष्य कैसा होगा? यही इस फिल्म का प्रतिपाद्य है। रोया सदात निर्देशित 83 मिनट की फिल्म ‘ए लेटर टू द प्रेसीडेंट’ (2017) एक निम्न सरकारी अधिकारी सौरेया को एक स्त्री को गांव के दबंग से बचाने के अपराध में जेल में डाला गया है वह सींकचों के पीछे से अफगान के राष्ट्रपति से सहायता की गुहार का पत्र लिखती है।
2018 की डॉक्यूमेंट्री ‘ए थाउजंड गर्ल्स लाइक मी’ (76 मिनट) में सराह मानी ने एक 23 साल की स्त्री को उसके पिता द्वारा बलत्कृत होते दिखाया है। वह जनता के सामने नेशनल टीवी पर अपने शोषण की बात का खुलासा करती है और शोषणकर्ता को बचाने वाले अफगानी कानून पर प्रकाश डालती है। यह अभिनय नहीं है, अत: शोषिता खैतेर ने स्वयं मुख्य काम किया है। 2020 में ‘द रेड बाइसिकल’ (फ़ाजिला अमीरी) तथा ‘काबुल गर्ल्स’ दो उल्लेखनीय फिल्में यहां बनी हैं।
‘द रेड बाइसिकल’ 13 मिनट की क्राइम शॉर्ट फिल्म है, जबकि ‘काबुल गर्ल्स’ (सैयद मसूद एस्लामी, मासूमा इब्राहिमी) ड्रामा फिल्म की लम्बाई 73 मिनट है।
आज के अफगानिस्तान में अवस्थित पहली फिल्म में एक लाल साइकिल दो अफगानी औरतों के लिए दुनिया की खिड़की खोलती है। जबकि दूसरी फिल्म में चार औरतों में एक बात साझा है, चारों अपने जीवन की कठिनाइयों की मारी हैं। वे काबुल आई हैं और किसी-न-किसी तरह ये चारों एक-दूसरी से जुड़ी हुई हैं।
आशा है अफगानिस्तान जल्द ही ढ़ेर सारी अच्छी फिल्में बनेंगी और सिने-दुनिया में सराही जाएंगी।
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