भारत सरकार हर साल अफीम पोस्त की खेती के लिए लाइसेंसिंग नीति की घोषणा करती है।
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1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद अफीम की खेती और निर्माण पर नियंत्रण 1 अप्रैल, 1950 से केंद्र सरकार की जिम्मेदारी बन गया। अफीम और राजस्व कानून (आवेदन का विस्तार) अधिनियम 1950 के आधार पर केंद्र सरकार के तीन अधिनियम, अफीम अधिनियम 1857, अफीम अधिनियम 1878 और खतरनाक औषधि अधिनियम 1930 बनाए जो कि भारतीय संघ के सभी राज्यों में समान रूप से लागू हो गए। पिछले कुछ वर्षों में अफीम के नियंत्रण, उत्पादन, वितरण, बिक्री और कब्जे के तरीकों में कुछ बदलाव हुए और एकाधिकार पूरी तरह से भारत सरकार के हाथों में ही रहा।
जनजाति क्षेत्रों में अफीम उत्पादन की छूट रही
जनजाति क्षेत्रों में ब्रिटिश कानून भी सदैव शिथिल रहे। जनजातियों को जहां अपने उपभोग के लिए शराब बनाने की छूट रही, वहीं अफीम उत्पादन में भी शिथिलता बरती गई। मसलन उत्तराखंड के जनजातीय जौनसार बावर क्षेत्र में प्राचीन काल से मसाले आदि के लिए अफीम की खेती होती रही।
भारत का संविधान लागू होने से पूर्व जौनसार बावर परगना अनुसूचित क्षेत्र होने के कारण यहां अफीम अधिनियम 1857 तथा अनिष्टकर मादक द्रव्य अधिनियम, 1930 लागू नहीं होता था।
सन् 1950 में अफीम और राजस्व विधि (लागू होना विस्तारण) अधिनियम, 1950 के लागू होने के बाद 18 अप्रैल 1950 से इस क्षेत्र में भी अफीम अधिनियम 1857 और अनिष्टकर मादक द्रव्य अधिनियम, 1930 भी लागू हो गए।
चूंकि 30 सितम्बर 1962 को लाइसेंसिंग की अवधि समाप्त होने से 1 अक्टूबर 1962 से अफीम की खेती पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया था और इसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी किया गया फिर भी केन्द्र सरकार को अफीम की अवैध खेती की सूचनाएं मिलीं। वर्ष 1961-62 में केवल 17 हेक्टेअर के लिए लाइसेंस दिए गए थे लेकिन वास्तव में 25 हेक्टेअर में अफीम की खेती की सूचना मिली।
इस प्रकार 1 अक्तूबर 1963 से जौनसार बावर परगने में अफीम की खेती पर सम्पूर्ण प्रतिबंध लग गया। अब इस क्षेत्र में सरकार के नियंत्रण में अफीम की खेती की मांग की जा रही है।
सरकारी देखरेख में होती है अफीम की खेती
भारत सरकार हर साल अफीम पोस्त की खेती के लिए लाइसेंसिंग नीति की घोषणा करती है, अन्य बातों के साथ, लाइसेंस जारी करने या नवीनीकरण के लिए न्यूनतम योग्यता उपज, अधिकतम क्षेत्र जो एक व्यक्तिगत किसान द्वारा खेती की जा सकती है। अधिकतम लाभ जिसकी अनुमति दी जा सकती है प्राकृतिक कारणों आदि के कारण होने वाले नुकसान के लिए एक किसान को।
अफीम पोस्त की खेती केवल उन्हीं क्षेत्रों में की जा सकती है जो सरकार द्वारा अधिसूचित हैं। वर्तमान में ये क्षेत्र तीन राज्यों, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं। मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले और राजस्थान के चित्तौड़गढ़ और झालावाड़ जिले में अफीम उत्पादक कुल क्षेत्रफल का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा है।
सरकार के नियंत्रण में चलते हैं अफीम कारखाने
नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस एक्ट 1985 और नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस रूल्स, 1985 के तहत वर्तमान में नारकोटिक्स कमिश्नर अधीनस्थों के साथ अफीम पोस्त की खेती और अफीम के उत्पादन के अधीक्षण से संबंधित सभी शक्तियों का प्रयोग करता है और सभी कार्य करता है।
भारत में दो सरकारी अफीम और अल्कलॉइड कारखाने हैं पर बेहतर नियंत्रण और प्रबंधन करने के लिए वर्ष 1976 में मुख्य कारखानों के नियंत्रक के संगठन की स्थापना की गई थी। ये कारखाने मध्य प्रदेश के नीमच और उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में हैं।
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