1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’
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तीसरी स्थिति की फिल्मों के लिए टेसोमी गैब्रियल चिली के सिने-निर्देशक मिग्युल लिटिन की 1973 की फिल्म ‘द प्रोमिस्ड लैंड’ का उदाहरण देते हैं। इस एक घंटे बीस मिनट की सामाजिक गाथात्मक फिल्म में चिली के किसानों के संघर्ष का चित्रण है। यह लैटिन अमेरिकन लोगों के शोषण को दिखाने वाली फिल्म है। रंगारंग बैकग्राउंड, बर्फीले क्षेत्र का आधिकारिक फिल्मांकन इसे विशिष्ट बनाता है। इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ उपलब्ध इस फिल्म में अन्याय दिखाया गया है।
कुछ लोगों के अनुसार तीसरी दुनिया का सिनेमा फिल्म बनाने की एक नई धारणा और हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कला है। ये औपनिवेशिक वातावरण के दु:ख-दर्द, अपमान, भूख, अत्याचार, मौत को दिखाता है। ये फिल्में उपनिवेशवाद की चालाकी, उसकी राजनीति को खोल कर दिखाती हैं।
1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’
इसके उदाहरण के लिए फिर लेखक-निर्देशक आउसमान सेम्बेन की फिल्म को ही लिया जाता है। उनकी 1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ में वे सेनेगॉल की एक अश्वेत लड़की को फ्रांस में नौकरानी बना दिखाते हैं। वह जिन फ्रांसीसी के घर में सेनेगॉल में काम कर रही थी, जब वे लोग फ्रांस लौटते हैं, तो बेहतर जीवन के लालच में वह उनके साथ जाने की गुजारिश करती है। परंतु वहां जाकर वह न केवल अपनों से कट कर शोषण का शिकार होती है बल्कि समाप्त भी हो जाती है।
पहले आउसमान सेम्बेन ने ‘ब्लैक गर्ल’ को 20 मिनट की लघु फिल्म के रूप में 1966 में बनाया था, जिसे किसी अश्वेत अफ्रीकी द्वारा बनाई पहली फिल्म का दर्जा हासिल है। इन्होंने इसी श्रेणी की फिल्म ‘जाला’ (Xala) 1973 में बनाई। फिलिपिनो फिल्म मेकर लीनो ब्रोका ने 1975 में ‘ग्रेट मनीला इन द क्लॉज ऑफ लाइट’ बनाई।
इसमें एक स्थानीय युगल मनीला के चमकते-दमकते मेट्रोपोलिस जीवन से आकर्षित होकर, उस जीवन की खोज में मनीला पहुंचते हैं, लेकिन वहां उन्हें बेवफाई और बरबादी मिलती है।
सामाजिक यथार्थवाद से प्रेरित सिनेमा
तीसरा सिनेमा अथवा तीसरी दुनिया का सिनेमा, पद का निर्माण अर्जन्टीना के दो सिने-निर्देशकों– फर्नान्डो सोलैनास तथा ऑक्टाविओ गेटिनो ने किया था। इन्होंने इस पद का इस्तेमाल सर्वप्रथम अपनी किताब ‘टावर्ड्स ए थर्ड सिनेमा’ में किया। यह सिनेमा सामाजिक यथार्थवाद से प्रेरित होता है और गरीबी, राष्ट्रीय एवं निजी अस्मिता, विद्रोह, वर्ग, उपनिवेशवाद तथा सांस्कृतिक मुद्दों को उठाता है। इन दोनों ने मिलकर तीसरे सिनेमा की एक सर्वोत्तम डॉक्यूमेंट्री ‘द ऑवर ऑफ द फर्नेसेस’ (1968) बनाई थी।
तीसरे सिनेमा की जड़ें सामान्यत: मार्क्सवादी काल में हैं। यह जर्मन नाटककार बर्टोल ब्रेष्ट की सामाजिक संवेदना से भी प्रेरित है। साथ ही इस पर ब्रिटिश सामाजिक डॉक्यूमेंट्री तथा द्वितीय विश्व युद्धोपरांत विकसित इटली के नवयथार्थवादी सिनेमा का भी प्रभाव है।
तृतीय सिनेमा के फिल्मकार अपने पूर्वजों से आगे निकल कर कला और जीवन के विभाजन को समाप्त करते हैं। प्रोपेगंडा के बनिस्बत वे आलोचनात्मक तथा सहज ज्ञान संबंधी बातों पर अधिक बल देते हैं। वे सिनेमा में एक नया मास कल्चर पैदा करना चाहते हैं।
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