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विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: तीसरी दुनिया का सिनेमा- उपनिवेशवाद के खिलाफ आंदोलन

सार

हॉलीवुड के सिनेमा को प्रथम सिनेमा, यूरोपियन सिनेमा को द्वितीय सिनेमा तथा तीसरी दुनिया को तृतीय सिनेमा की संज्ञा दी जाती है। भले ही भारत में दुनियाभर से ज्यादा फिल्में बनती हों, वह तीसरी दुनिया के सिनेमा में ही गिना जाता है।
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तीसरी दुनिया के सिनेमा के बारे में जानिए - फोटो : iStock
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विस्तार
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जिसे आज तीसरी दुनिया का सिनेमा कहा जाता है, वह राजनीति प्रेरित सिनेमा है। इसका मुख्य उद्देश्य साम्राज्यवादी मीडिया के वर्चस्व का विरोध करना है। तीसरा सिनेमा अथवा तीसरी दुनिया के सिनेमा का अर्थ है सौंदर्यपरक तथा राजनैतिक सिनेमाई आंदोलन, जो तीसरी दुनिया के देशों में चला और जिसका उद्देश्य हॉलीवुड तथा यूरोपियन सिनेमा का विकल्प पैदा करना था। जब हम तीसरी दुनिया के देश कहते हैं तो इसका तात्पर्य मुख्य रूप से लैटिन अमेरिका तथा अफ्रीका होता है, वैसे इसमें एशिया के देश भी शामिल किए जाते हैं।

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हॉलीवुड के सिनेमा को प्रथम सिनेमा, यूरोपियन सिनेमा को द्वितीय सिनेमा तथा तीसरी दुनिया को तृतीय सिनेमा की संज्ञा दी जाती है। भले ही भारत में दुनियाभर से ज्यादा फिल्में बनती हों, वह तीसरी दुनिया के सिनेमा में ही गिना जाता है।

इथोपिया में जन्मे अमेरिकी सिनेमा विद्वान टेसोमी गैब्रियल तीसरी दुनिया से आने वाली फिल्मों को तीन अवस्थाओं का मानते हैं, उनके अनुसार पहली अवस्था की फिल्में वे फिल्में हैं जो हॉलीवुड का अनुसरण करती हैं, जिनका ध्यान मनोरंजन पर होता है और जो तकनीकि कला-कौशल को प्रमुखता देती हैं तथा जिनके लिए स्थानीय विषयों-मुद्दों का बहुत महत्व नहीं होता है।
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मजे की बात है, वे इस श्रेणी की फिल्मों के लिए जिस देश की फिल्मों का उदाहरण देते हैं, वह भारत है। वे भारत की बॉलीवुड फिल्मों को पहली अवस्था की फिल्में मानते हैं।


दूसरी अवस्था की फिल्में

दूसरी अवस्था की फिल्मों में उनका मानना है कि इन पर स्थानीय नियंत्रण रहता है और ये स्थानीय सभ्यता-संस्कृति तथा इतिहास को प्रमुखता देती हैं, लेकिन इनकी दिक्कत है कि ये अतीत को रोमेंटिसाइज करती हैं, साथ ही ये सामाजिक परिवर्तन को अनदेखी करती हैं। तीसरी स्थिति के लिए इनका कहना है कि ये फिल्में जुझारू प्रवृति की होती हैं, इनका प्रोडक्शन सामान्य लोगों के हाथ में होता है और फिल्म वैचारिकता का उपकरण होती है।

दूसरी स्थिति की फिल्म के लिए टेसोमी गैब्रियल सेनेगॉल के सिने-निर्देशक आउसमान सेम्बेन की फिल्म ‘द मनी ऑर्डर’ (1968) का उदाहरण देते हैं। इस एक घंटे बत्तीस मिनट की फिल्म में पेरिस से एक रिश्तेदार द्वारा भेजा गया एक मनी ऑर्डर सेनेगॉल के एक पारिवारिक मगर बेरोजगार आदमी का जीवन उथल-पुथल कर देता है। इस 25,000 फ्रैंक के लिए तमाम लोग आगे आ जाते हैं। ग्रामीण को यह रकम पाने केलिए जन्म प्रमाणपत्र, पहचान पत्र और न जाने क्या-क्या चाहिए।

उसका जीवन उधार पर चल रहा था। वह अपनी दो पत्नियों और सात बच्चों के साथ रह रहा था। वह सबका सामना करते हुए अपना परम्परागत जीवन त्याग कर एक आधुनिक जीवन जीने लगता है। इसे आउसमान ने लिखा भी स्वयं ही है। स्थानीय भाषा में फिल्म का नाम ‘मैनडाबी’ है।

दूसरी स्थिति की फिल्मों के लिए टेसोमी गैब्रियल एक और उदाहरण निर्देशक गैस्टन काबोर की फिल्म ‘गॉड’स गिफ्ट’ का देते हैं। इसमें सवाना पार करता एक आदमी झाड़ी में एक बच्चे को अचेत पाता है। जब बच्चा होश में आता है, पता चलता है कि वह मूक है और अपने बारे में कुछ बता नहीं सकता है। राहगीर उसे पास के गांव में एक परिवार के पास छोड़ देता है। परिवार कुछ समय उसके माता-पिता की खोज करता है नाकामयाब रहने पर बच्चे को गोद ले लेता है। और वे लोग बच्चे को ‘वेंड कुनी’ (गॉड’स गिफ्ट) नाम देते हैं।

वहां उसे प्यार करने वाली एक बहन भी मिलती है, जिससे उसकी अच्छी पटरी खाती है। बाद में वह एक त्रासद घटना देखता है और उसकी आवाज लौट आती है, वह अपनी दर्दनाक कहानी बताता है। इस फिल्म पर अफ्रीका की लोककथा का प्रभाव है और यह कहानी कहन की शैली को प्रस्तुत करती है। इस फिल्म की सरलता ही इसकी शक्ति है।

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1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ - फोटो : istock
तीसरी स्थिति की फिल्मों के लिए टेसोमी गैब्रियल चिली के सिने-निर्देशक मिग्युल लिटिन की 1973 की फिल्म ‘द प्रोमिस्ड लैंड’ का उदाहरण देते हैं। इस एक घंटे बीस मिनट की सामाजिक गाथात्मक फिल्म में चिली के किसानों के संघर्ष का चित्रण है। यह लैटिन अमेरिकन लोगों के शोषण को दिखाने वाली फिल्म है। रंगारंग बैकग्राउंड, बर्फीले क्षेत्र का आधिकारिक फिल्मांकन इसे विशिष्ट बनाता है। इंग्लिश सबटाइटिल्स के साथ उपलब्ध इस फिल्म में अन्याय दिखाया गया है।

कुछ लोगों के अनुसार तीसरी दुनिया का सिनेमा फिल्म बनाने की एक नई धारणा और हमारे समय की एक महत्वपूर्ण कला है। ये औपनिवेशिक वातावरण के दु:ख-दर्द, अपमान, भूख, अत्याचार, मौत को दिखाता है। ये फिल्में उपनिवेशवाद की चालाकी, उसकी राजनीति को खोल कर दिखाती हैं।

1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’

इसके उदाहरण के लिए फिर लेखक-निर्देशक आउसमान सेम्बेन की फिल्म को ही लिया जाता है। उनकी 1966 की फिल्म ‘ब्लैक गर्ल’ में वे सेनेगॉल की एक अश्वेत लड़की को फ्रांस में नौकरानी बना दिखाते हैं। वह जिन फ्रांसीसी के घर में सेनेगॉल में काम कर रही थी, जब वे लोग फ्रांस लौटते हैं, तो बेहतर जीवन के लालच में वह उनके साथ जाने की गुजारिश करती है। परंतु वहां जाकर वह न केवल अपनों से कट कर शोषण का शिकार होती है बल्कि समाप्त भी हो जाती है।  
 
पहले आउसमान सेम्बेन ने ‘ब्लैक गर्ल’ को  20 मिनट की लघु फिल्म के रूप में 1966 में बनाया था, जिसे किसी अश्वेत अफ्रीकी द्वारा बनाई पहली फिल्म का दर्जा हासिल है। इन्होंने इसी श्रेणी की फिल्म ‘जाला’ (Xala) 1973 में बनाई। फिलिपिनो फिल्म मेकर लीनो ब्रोका ने 1975 में ‘ग्रेट मनीला इन द क्लॉज ऑफ लाइट’ बनाई।

इसमें एक स्थानीय युगल मनीला के चमकते-दमकते मेट्रोपोलिस जीवन से आकर्षित होकर, उस जीवन की खोज में मनीला पहुंचते हैं, लेकिन वहां उन्हें बेवफाई और बरबादी मिलती है। 
 

सामाजिक यथार्थवाद से प्रेरित सिनेमा

तीसरा सिनेमा अथवा तीसरी दुनिया का सिनेमा, पद का निर्माण अर्जन्टीना के दो सिने-निर्देशकों– फर्नान्डो सोलैनास तथा ऑक्टाविओ गेटिनो ने किया था। इन्होंने इस पद का इस्तेमाल सर्वप्रथम अपनी किताब ‘टावर्ड्स ए थर्ड सिनेमा’ में किया। यह सिनेमा सामाजिक यथार्थवाद से प्रेरित होता है और गरीबी, राष्ट्रीय एवं निजी अस्मिता, विद्रोह, वर्ग, उपनिवेशवाद तथा सांस्कृतिक मुद्दों को उठाता है। इन दोनों ने मिलकर तीसरे सिनेमा की एक सर्वोत्तम डॉक्यूमेंट्री ‘द ऑवर ऑफ द फर्नेसेस’ (1968) बनाई थी।

तीसरे सिनेमा की जड़ें सामान्यत: मार्क्सवादी काल में हैं। यह जर्मन नाटककार बर्टोल ब्रेष्ट की सामाजिक संवेदना से भी प्रेरित है। साथ ही इस पर ब्रिटिश सामाजिक डॉक्यूमेंट्री तथा द्वितीय विश्व युद्धोपरांत विकसित इटली के नवयथार्थवादी सिनेमा का भी प्रभाव है।

तृतीय सिनेमा के फिल्मकार अपने पूर्वजों से आगे निकल कर कला और जीवन के विभाजन को समाप्त करते हैं। प्रोपेगंडा के बनिस्बत वे आलोचनात्मक तथा सहज ज्ञान संबंधी बातों पर अधिक बल देते हैं। वे सिनेमा में एक नया मास कल्चर पैदा करना चाहते हैं।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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