1971 में उपन्यासकार, कहानीकार, कवि, लेखक, अनुवादक बोर्खेज को जेरुसेलम साहित्य पुरस्कार मिला। इसी साल द अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड लेटेर्स एंड नेशनल इंस्ट्यूट ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स उन्हें अपन सम्मानित सदस्य बनाया। इसी साल कोलम्बिया यूनिवर्सिटी ने उन्हें साहित्य के डॉक्टर की ऑनरेरी डिग्री प्रदान की। उस समय उनकी उम्र 72 साल थी। उनका पूरा नाम जॉर्ज फ्रान्सिस्को इसीडोरो लुई बोर्खेज एकेवेडो था।
उनका जन्म अर्जेन्टीना में 24 अगस्त 1899 को हुआ। उनके पिता का नाम जॉर्ज गुलेर्मो बोर्खेज था। उन्होंने 12 साल की उम्र में शेक्सपियर पढ़ लिया था, उससे भी पहले नौ वर्ष की उम्र में ऑस्कर वाइल्ड की कहानी ‘द हैप्पी प्रिंस’ का स्पैनिश भाषा में अनुवाद किया था।
1914 में उनका परिवार स्विटजरलैंड चला गया, वही उन्होंने स्कूली पढ़ाई की। 1918 में जेवेवा कॉलेज से उन्हें बैकलौरिएट (अपर-सैकेंड्री स्कूल ग्रेजुएशन प्रमाणपत्र, इसे स्तानीय भाषा में मैतुरा, मौतुरिता आदि भी कहा जाता है) का सार्टिफिकेट मिला। बाद में अर्जेन्टीना लौटने पर विभिन्न पत्र-पत्रिकओं में उनके कविता, लेख प्रकाशित होने लगे।
बोर्खेज की पहली पत्नी एल्सा हेलेना एस्टेटे मिलान थीं, दोनों की शादी 4 अगस्त 1967 में हुई। मगर 1970 में इसका अंत तलाक में हुआ। इसके बाद उन्होंने मारिया कोडामा से मई 1986 में शादी की। पर एक महीने बाद बोर्खेज की मृत्यु हो गई।
उन्हें लम्बे समय तक अर्जेन्टीना की नेशनल लाइब्रेरी का डायरेक्टर रहने का अवसर मिला। वे अपने इस पद को पसंद करते थे। वहां बैठ कर वे लाइब्रेरी की सारी किताबें- साइंस, फिलॉसफी, थियोलॉजी, हिस्ट्री की सारी किताबें पढ़ने का स्वप्न देखते थे। मगर उनके जीवन की विडम्बना थी, उनके पिता के परिवार में अन्धत्व का गुणसूत्र था। उनके परबाबा, बाबा, पिता सब अन्धे थे। वे खुद भी 1955 में मात्र 56 साल की उम्र में अन्धत्व की ओर बढ़ने लगे।
मां लेओनोर एकेवेडो सुअरे (22 मई 1876 - 8 जुलाई 1975) का बोर्खेज के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा। वे मां के दुलरुआ थे। आंख की समस्या के कारण वे अपनी मां के बहुत करीब आ गए थे। मां उनके लिए सर्वाधिक सुखद अहसास थी। सार्त्र जब अंधत्व की ओर बढ़ने लगे तो वे दूसरों से पढ़वा कर सुनते, डिक्टेट कराते, अपने लिखे को दूसरों से एडिट करवाते थे।
इसी तरह बाद के वर्षों में बोर्खेज इमला बोलते और उनकी मां सचिव की भांति उनके लेख कविताएं, कहानियां एवं लिखतीं। मां उन्हें पढ़ कर सुनाती, उनका लिखा एडिट करती, उनकी यात्राओं में उनके साथ रहतीं। जॉन मिल्टन की तरह बोर्खेज ने अपने अंधेपन को कभी अपने लेखन के आड़े न आने दिया।
नोबेल पुरस्कार न मिलने की कसक
नोबेल समिति ने उन्हें पुरस्कार न दिया। इस बात से वे अवश्य आहत थे। उन्होंने इस बारे में कहा था, ‘मुझे नोबेल पुरस्कार न देना स्कैन्डिनेवियन परम्परा बन चुका है।’ नोबेल समिति घोषणा के पचास साल अपने नामांकन गुप्त रखती है। इसीलिए जब 1965 की नामांकन सूची खुली तो पता चला, उस साल की नोबेल पुरस्कार नामांकन सूचि में उनका नाम था। मगर इसके पहले वे 14 जन 1986 को गुजर चुके थे अत: उनको इस बात की जानकारी कभी न हो सकी।
एक बार उन्होंने बताया, उन्हें एमिल डिकेन्सन की एक लाइन बहुत पसंद है। लाइन है, ‘घायल हिरण हवा में सबसे ऊंची छलांग लगाता है।’ उन्हें यह अपने जीवन से जुड़ी लाइन लगती थी। क्योंकि चाक्षुष अपंगता, उनकी गहन व्यथा थी, पर वह उन्हें वातावरण में ऊंची छलांग लगाने में सहायता देती थी। अन्धत्व के बावजूद बोर्खेज सूझ-बूझ वाले लेखक हैं।
बोर्खेज का साहित्य विश्व में सम्मानित है। अम्बर्टो इको ने बोर्खेज के मृत्यु वर्ष में यानि 1986 के अपने उपन्यास ‘द नेम ऑफ द रोज’ में बोर्खेज को एक पात्र- अंधा लाइब्रेरियन बना कर सदा केलिए साहित्य में अमर कर दिया है।
बोर्खेज ने कविता, कहानी, लेख लिखे, मगर उपन्यास न लिखा। मान्यता है, जब तक आप उपन्यास नहीं लिखते हैं, आप साहित्यकार नहीं कहलाते हैं। उन्हें नोबेल मिलने का एक कारण यह भी रहा। वैसे कई कवियों को नोबेल मिला है, बाद में समिति ने केनडा की एलिस मुनरो को नोबेल दिया।
एलिस ने कभी उपन्यास नहीं लिखा। बोर्खेज को 1961 में सैमुअल बेकेट के साथ प्री इंटरनेशनल पुरस्कार। दुनिया के अन्य जन्मांध अथवा बाद में आंखों की रोशनी जाने वाले तमाम रचनाकारों की भांति बोर्खेज भी ताजिंदगी लिखने-पढ़ने से जुड़े रहे। उनके विपुल कार्य की संख्या 70 के आसपास पहुंचती है।
भारत से उनका लगाव
भारत के प्रति उनका खास लगाव था। भारत को वे प्यार करते हैं, उसकी सराहना करते हैं, ऐसा उन्होंने एक बातचीत के सिलसिले में प्रोफेसर शिव के. कुमार को बताया। जब वे यूरोप में थे, उन्होंने जर्मन भाषा सीखी थी, इस कारण वे मैक्स म्यूलर की क्लासिक किताबों के करीब पहुंचे। उन्होंने पूर्व की पावन पुस्तकों को जाना। इसी शृंखला में वे महाभारत से परिचित हुए। महाभारत उनकी प्रिय हो गई। उन्हें सबसे अधिक धृतराष्ट्र के चरित्र ने प्रभावित किया, कारण बहुत स्पष्ट है। महाभारत में धृतराष्ट्र संजय से कहते हैं, अन्धत्व आदमी की सबसे बड़ी यातना है।
उन्होंने कभी आत्मदया नहीं की, शेक्सपियर के ‘किंग लियर’ का पात्र ग्लोसेस्टर याद रखा, जो आंखें निकाल लिए जाने के बाद अपनी आंतरिक आंखों से दुनिया को बेहतर तरीके से देखता है।
वे खुद से पूछते थे, ‘अंधे से अधिक स्वयं को कौन जानता है?’ उन्हें उनके देश के और लोग भी जानते थे, टैक्सी वाले उनसे किराया नहीं लेते थे, क्योंकि वे बोर्खेज को अपनी गाड़ी में सवारी करा रहे थे यह बात शान से अपने लोगों को बता सकें। ऐसी थी, जीते-जी उनकी ख्याति, जो उनके जाने के बाद गटने की बजाय बढ़ रही है।
विभिन्न क्षेत्र कई लोग जिन्हें नोबेल मिलना चाहिए था, नहीं मिला, तमाम कारण रहे होंगे। बोर्खेज को नोबेल क्यों नहीं मिला, इसके विषय में कई कयास लगाए जाते हैं, जैसे, उनका काम उबाऊ तथा दिखावटी है। वे अर्जेनटीना की तानाशाही के पक्ष में थे, उनकी चिली के तानाशाह पिनोशे से सहमति थी आदि, आदि। उनके प्रति साहित्य प्रेमियों की सहमति तथा असहमति के बावजूद एक बात नजर आती है, साहित्य प्रेमी उनके काम की खूब सराहना करते हैं। बोर्खेज को खूब पढ़ा जाता है।
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