हमारी वैदिक और पौराणिक मान्यताएं अपने समय के सामाजिक सरोकार का वर्णन तो करती ही है, हमारे वैदिक-औपनिषदिक संवाद सूक्तों और आख्यानों में नैतिक मूल्यों और मान्यताओं से सम्बन्धित अनेक सुभाषितों में हमारे सार्वजनिक और पारिवारिक जीवन में आपसी सम्बन्धों के निर्वहन के तौर -तरीकों की समयानुकूल की व्याख्याएं भी मिलती है।
एक पौराणिक कथा स्कंद पुराण और भविष्य पुराण में मिलती है।देवासुर संग्राम में जब असुरों का पलड़ा भारी नजर आने लगा, तो इन्द्र की पत्नी इंद्राणी ने एक रक्षा- सूत्र तैयार किया। श्रावण पूर्णिमा के दिन इन्द्र के दाहिने हाथ में बांधकर उनके विजय की कामना किया। मान्यता यह है कि इस रक्षा- सूत्र की वजह से इन्द्र को बल और साहस प्राप्त हुआ और वे विजयी हुए। भविष्य पुराण में इस सन्दर्भ में वर्णन मिलता है कि -
श्रावण्यां पूर्णिमायां तु श्रुत्वा ब्राह्मणसंनिधौ।
बध्यते रक्षया वीर: संग्रामेsपि विजायते।।
महाभारत के वनपर्व में 'शिशुपाल वध' के समय का एक कथा प्रसंग मिलता है। पांडवों ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया। उस यज्ञ में भगवान श्रीकृष्ण को भी आमंत्रित किया गया। श्रीकृष्ण के चचेरे भाई शिशुपाल भी उस यज्ञ में उपस्थित हुए।शिशुपाल ने कृष्ण का घोर अपमान किया। जब बात ज्यादा बिगड़ने लगी और शिशुपाल शिष्टाचार की सारी हदें पार करने लगा, तो श्री कृष्ण की क्रोधाग्नि प्रज्वलित हो गयी। क्रोध में श्रीकृष्ण ने शिशुपाल पर अपना सुदर्शन चक्र चला दिया। शिशुपाल का सर काटने के बाद जब सुदर्शन चक्र श्री कृष्ण के पास लौटा,तो उनकी तर्जनी उंगली में गहरा घाव हो गया। यह देखकर द्रौपदी ने अपने साड़ी का एक टुकड़ा फाड़ कर भगवान श्रीकृष्णकृष्ण की उंगली को बांध दिया।
द्रोपदी के इस स्नेहभाव से भगवान श्रीकृष्णा अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे वचन दिया कि हर परिस्थिति में वे द्रौपदी की रक्षा करेंगे। द्रोपदी के चीर हरण के समय भगवान श्री कृष्ण ने अपना वह वादा पूरी तरह से निभाया।द्रौपदी को चीर हरण के अपमान से सुरक्षा कवच प्रदान किया उसकी रक्षा किया।ऐसे विपत्तिकाल में एक बहन को अपने भाई से ऐसी ही मदद की अपेक्षा रहती है, जैसा श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को प्रदान किया।
भविष्यपुराण में रक्षाबंधन से सम्बन्धित एक श्लोक मिलता है ---
श्रावण्यां पूर्णिमायां तु रक्षा बध्नाति यो नर:।
तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धयन्ति नात्र संशय:।।
रक्षाबंधन के पौराणिक प्रसंग में सबसे लोकप्रिय और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कथा भागवत पुराण( अष्टम स्कंद, वामनावतार प्रसंग) और विष्णु पुराण में मिलती है। भविष्यपुराण में इसे ही रक्षा -सूत्र से जोड़ा गया है। कथा यह है कि असुरों के राजा बलि ने तीनों लोक को जीत लिया था। स्वर्ग लोक पर भी उनका शासन कायम हो गया था। स्वर्ग लोक देवताओं का स्थान है। देवताओं का संकट दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने वामननावातार रुप में प्रकट हुए। एक बटुक के रुप में वे राजा बलि के यज्ञ में पहुंचे। दान में उन्होंने राजा बलि से तीन पग जमीन मांगी। राजा बलि तुरन्त इसके लिए तैयार हो गया।
वामनावतार रुप धारण किए भगवान विष्णु ने एक पग में संपूर्ण पृथ्वी नाप दिया। दूसरे पग में स्वर्ग लोक और जब तीसरा पग नापने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामनरूप भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित कर दिया। राजा बलि के सत्य प्रतिज्ञा और दान से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और उसे पाताल लोक का राजा बना दिया।राजा बलि को वचन दिया कि वे सदा द्वारपाल बनकर पाताल लोक की रक्षा करेंगे।
भगवान विष्णु के पाताल लोक में रहने से लक्ष्मी जी चिंतित हुई।वे ब्राह्मणी का रूप धारण कर राजा बलि के दरबार में पहुंची। लक्ष्मी जी ने बलि को भाई मानकर श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षा -सूत्र बांध बांधकर उसके मंगल की कामना किया।
बलि ने लक्ष्मी का सम्मान करते हुए बचन दिया कि - " हे बहन! मैं तुम्हारे पति विष्णु को अपना भाई के समान मानकर वर्ष में एक बार तुम्हारे घर अवश्य जाने दूंगा " इस प्रकार रक्षा बंधन का त्यौहार भाई बहन के पवित्र रिश्ते को बनाये रखने और अपने किये वादे को हर परिस्थिति निभाने के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
हम देखते है कि वैदिक-औपनिषदिक संवादों और पौराणिक कथाओं में हर प्रसंग कोई न कोई विशेष संदेश देता है जो हमारी पारम्परिक नैतिक मूल्यों - मान्यताओं के सार्वकालिक महत्व को व्यक्त करता है।आज के संदर्भ में भी ऐसे संदेश-आदर्श हमरा मार्गदर्शन करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत करता हैं।भारत जैसे उत्सवधर्मी समाज के लिए इन पर्व -त्योहारों के अवसर पर हम आज भी यह सीख ग्रहण कर सकते हैं। यह कि 'हम कहते कुछ और हैं, और होते कुछ और हैं ' के लालच- मोह को छोड़कर कैसे अपने किये वादे को निभाया जाता है।
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