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विश्व साहित्य का आकाश- बाप्सी सिद्धवा और भारत विभाजन

सार

‘क्रैकिंग इंडिया’ या ‘आइस-कैंडी-मैन’ ऐतिहासिक उपन्यास है जो भारत विभाजन का आख्यान है। इस पूरे घटनाक्रम को एक छोटी पारसी बच्ची लेनी सेठी की दृष्टि से चित्रित किया गया है।
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नॉवेल की दुनिया - फोटो : istock
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विस्तार
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सिने-प्रेमियों ने दीपा मेहता की निर्देशित ‘अर्थ’ और ‘वाटर’ फिल्में देखी होंगी। दोनों फिल्मों का आधार इंग्लिश उपन्यासकार बाप्सी सिद्धवा लेखन है। 11 अगस्त 1938 में कराची के एक गुजराती पारसी परिवार में जन्मी बाप्सी सिद्धवा का 86 वर्ष की उम्र में 25 दिसम्बर 2024 को टेक्सास के हौस्टन में गुजर गईं। वे बचपन में कराची से लाहौर आ गई थीं, उसी समय देश विभाजन की त्रासदी उन्होंने देखी और इसी कथानक पर उन्होंने चार उपन्यास लिखे।

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इन उपन्यासों में बाप्सी ने एक बच्ची की नजर से देश विभाजन, स्त्री अधिकारों, देश से बेघर होने की पीड़ा एवं पारसी सभ्यता-संस्कृति पर अपनी बात रखती हैं। उन्हें कई सम्मान-पुरस्कार प्राप्त हुए जिसमें 1991 में मिला सितारा-ए-इम्तियाज भी शामिल है।

बाप्सी सिद्धवा को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली उपन्यास ‘आइस-कैंडी-मैन’ से। यह उनका तीसरा उपन्यास है जो 1988 में प्रकाशित हुआ यह उपन्यास ‘क्रैकिंग इंडिया’ के नाम से भी उपलब्ध है। इसके पहले वे 1980 में ‘द क्रो ईटर्स’ तथा 1983 में ‘द पाकिस्तानी ब्राइड’ लिख चुकी थीं। इसके बाद उन्होंने 1993 में ‘एन अमेरिकन ब्रैट’, 2005 में ‘राइटिंग्स ऑन लाहौर’, 2006 में ‘वाटर’ तथा 2012 में ‘देयर लैंग्वेज ऑफ लव’ लिखा।
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इतिहास केवल इतिहास की किताबों में ही दर्ज नहीं होता है। वह मौखिक होता है, साहित्य में विस्तार से दर्ज होता है। इतिहास के कई आयाम होते हैं। पुरुषों का इतिहास, स्त्रियों का इतिहास भिन्न होता है, और बच्चों द्वारा देखा गया इतिहास वयस्कों के देखे इतिहास से बिल्कुल जुदा होता है।


भारत विभाजन पर उपन्यास

‘क्रैकिंग इंडिया’ या ‘आइस-कैंडी-मैन’ ऐतिहासिक उपन्यास है जो भारत विभाजन का आख्यान है। इस पूरे घटनाक्रम को एक छोटी पारसी बच्ची लेनी सेठी की दृष्टि से चित्रित किया गया है। असल में यह आत्मकथात्मक उपन्यास है, छोटी बच्ची लेनी स्वयं बचपन की बाप्सी सिद्धवा है। 1947 में इस बच्ची ने लाहौर में रहते हुए घर-परिवार एवं परिवार के बाहर बहुत कुछ देखा। उसने क्रूर अत्याचार, हत्या, बलात्कार, लाखों लोगों का बेगर होना, घृणा, धार्मिक कट्टरता तथा विभाजन की त्रासदी देखी थी। 

भारत के जटिल इतिहास को चित्रित करते उपन्यास में उच्च वर्ग की लेनी सेठी की देखभाल खूबसरत हिन्दु आया शांता के जिम्मे है। कहानी 4 साल की लेनी से 10 साल की लेनी तक को समेटती है। ‘भारत बंटने वाला है...’ मासूम बच्ची जानना चाहती है, ‘क्या होगा अगर वे वहीं टुकड़े करेंगे जहां हमारा घर है?’  खूबसूरत आया शांता के कई दीवाने हैं, जिसमें सिख, पठान, मुसलमान सब शामिल हैं। पर उसका दिल एक मुस्लिम लड़के आया है।

बच्ची समाज के बदलते स्वरूप को देखती है। वह दंगे प्रारंभ होने पर मुसलमान, हिन्दू, सिख का धार्मिक उन्माद देखती है। चूंकि वह पारसी है, अत: विभाजन और धार्मिक कट्टरपंथ का सीधे उसके परिवार पर असर नहीं पड़ता है। इस सारे घटनाक्रम में पारसी निरपेक्ष रहे थे। परन्तु आसपास घट रही बातों का प्रभाव बच्ची पर बड़ा गहरा होता है।

लेनी शारीरिक रूप से तनिक विकलांग है, उसे पोलियो है, इसी कारण वह स्कूल में नहीं है। परन्तु उसकी आंखें बहुत सतर्क हैं, आसपास की घटनाओं को वह देखती है, भले ही सब समझती न हो। वह अनायास घटती बातों की साक्षी बनती है। जो घटनाएं हुई लेनी के अनुसार वे सोच-समझ कर नहीं हुईं, अनायास घटीं।

लेनी में बच्चों की मासूमियत है, पर वह जानने को उत्सुक है। वह देखती है उसकी आया अपने प्रशंसकों पर नियंत्रण रखती है, तय करती है, किस लड़के को कितनी छूट देनी है। साथ ही वह देखती है, कुछ बातें आया के नियंत्रण के बाहर हैं। लेनी का सारा समय आया के साथ गुजरता है और आया का साथ अपनी तरह के लोगों के बीच। इसी कारण लेनी निम्न वर्ग के संपर्क में आती है, उनकी बातें सुनती है, वहीं उसे धार्मिक भेदभाव, राजनीति के उतार-चढ़ाव का ज्ञान होता है। देश के बंटवारे की वारदात से परिचित होती है।

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विश्व साहित्य की दुनिया - फोटो : Freepik.com

उपन्यास आइस-कैंडी

उपन्यास आइस-कैंडी, चिड़िया, पिंजड़ा आदि कई प्रतीकों का प्रयोग करता है। आइस-कैंडी एक ओर मीठी होती है दूसरी ओर ठंडी भी। यह जीवन की तरह क्षणभंगुर होती है। आइस-कैंडी-मैन एक ओर लुभावना है वह आया और लेनी के जीवन में खुशी लाता है दूसरी ओर बहुत क्रूर है, प्रतिकार में आया को अपहृत कर उसे वेश्यालय पहुंचाता है। चिड़िया स्वतंत्रता का प्रतीक है वह पिंजड़े में है। यहां भी आइस-कैंडी-मैन का दोहरा चरित्र नजर आता है। वह उन्हें पिंजड़े से उड़ा कर स्वतंत्र करता है अर बाद में आया को कैद करता है।

माता-पिता की नजरों से दूर लेनी औरत-मर्द के शारीरिक मिलन को देखती है, समय से पहले, सामान्य तौर पर वयस्क होने के पहले उसे इन बातों का पता चलता है। आया के अपहृत होने पर उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है। उसका घर वास्तव में बंट जाता है।

विभाजन का अल्पसंख्यकों और खासतौर स्त्रियों पर असर वह देखती है, नतीजन वह एक बच्ची नहीं रह जाती है, इसलिए यह उपन्यास ‘आइस-कैंडी-मैन’ (‘क्रैकिंग इंडिया’) ‘कमिंग ऑफ एज’ का उपन्यास है।

भारत विभाजन होता है, लाहौर जल रहा है। अपहृत आया लेनी की गॉडमदर के प्रभाव से जब वह खोजी जाती है, वह रेडलाइट इलाके में मिलती है। विभाजन के हादसे के बाद न लेनी वही बच्ची रहती है और न भारत भारत रह जाता है, अब भारत एवं पाकिस्तान दो भिन्न देश हैं।

असल में भारत औपनिवेशिक काल में ही घायल हो गया था, उसका विभाजन काफी पहले प्रारंभ हो गया था। उपन्यास शुरु से लोगों के नाम, उनके कपड़ों और केश विन्यास में उनकी धार्मिक भिन्नता दिखाता है। समय के साथ ये विभाजन बढ़ते जाते हैं, नफरत में बदल जाते हैं।

जो आइस-कैंडी-मैन उसकी आया और उसे पसंद करता था, वही आगे चल कर आया की बरबादी का कारण बनता है। लेनी मुसलमान द्वारा सिख को मारा जाना देखती है, पठान को मरते देखती है। उसकी बुआ अमृतसर में रहती है, वह जब आती है तो भारत में मारकाट की बात लेनी को पता चलती है। राजनैतिक एवं सामाजिक हलचल के कारण 1947 और उसके एकाध साल आगे-पीछे इस भूखंड में क्या कुछ नहीं हुआ?

धर्म के नाम पर देश का विभाजन हुआ। लाखों लोगों का जीवन तबाह हो गया, हादसे से कितने अपना मानसिक संतुलन खो बैठे, कितनों को जबरदस्ती अपनी धार्मिक पहचान बदलनी पड़ी। यह सब देखने के बाद बच्ची पहले वाली बच्ची कैसे रह सकती थी, कैसे कायम रहती उसकी मासूमियत! समय से पहले लेनी परिपक्व हो जाती है।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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