फिल्म ‘पेस्तनजी’
विजया मेहता की नसरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, शबाना आजमी, फारुख मेहता, किरण खेर अभिनीत, कॉमेडी-ड्रामा फिल्म 1988 ‘पेस्तनजी’ इनकी तीसरी फीचर फिल्म थी। जिसे आज तक पारसी जीवन के आधिकारिक चित्रण के लिए प्रस्तुत किया जाता है। यह फिल्म बंबई के पारसी समाज की जिंदगी को विभिन्न नजरिए से दिखाती है। वनराज भाटिया के संगीत से सजी, रेणु सलूजा की संपादित फिल्म में फिरोज शाह और पेस्तनजी दो मित्र हैं।
पेस्तनजी जीरू से शादी करता है, लेकिन उसे अपना नहीं पाता है, क्योंकि जीरू ने हंसी-हंसी में बताया था कि वह ऑस्ट्रेलिया में एक लड़के से प्यार करती थी, एक दुर्घटना में उस लड़के की मौत हो गई, अंतत: जीरू को भारत आना पड़ा। पेस्तनजी को लगता है कि वह ठगा गया है। मानवीय जिजीविषा को दिखाती यह फिल्म बी. के. करंजिया की कहानी पर बनी थी, उन्होंने ही इसकी पटकथा लिखी थी। यह अकेले छूट जाने वालों, जैसाकि अक्सर पारसी समाज में देखा जाता है, की भी कहानी है। फिल्म को हिन्दी की सर्वोत्तम फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।
विजया मेहता ने सदा पुरुषों के साथ, उनके क्षेत्र में काम किया पर कभी दिक्कत न आई। वे खुद को महत्वपूर्ण निर्देशक कहलाना पसंद करती हैं, स्त्री-निर्देशक नहीं। उनके अनुसार औरतें पुरुषों से भिन्न होती हैं। दोनों का काम करने का तरीका, नजरिया अलग होता है। वे महाराष्ट्र से आती हैं और मानती हैं, वहां स्त्रियों को सदैव प्रेरित किया जाता है।
उन्हें अपने परिवार से बहुत सहयोग मिला है। उन्हें नाटक को फिल्म में कलात्मक रूप से रूपांतरित करने में बहुत मजा आता है। इसके लिए वे खूब रिसर्च करती हैं। शुरू से उनका मान-सम्मान रहा है, इसलिए उन्हें फाइनेंसर के पास कभी नहीं जाना पड़ा, न नाटकों केलिए और न ही फिल्मों केलिए। टीवी कार्य केलिए रोनी स्क्रूवाला उनके फाइनेंसर थे। आर्थिक मामलों में वे खुद को अनाड़ी मानती हैं।
फिल्म उन्हें रोमांचित करती है, पर नाटक उनकी पहली पसंद है। मनुष्य का सम्मान करने वाली विजया मेहता आदमी-औरत के सूक्ष्म अच्छे-बुरे संबंधों पर काम करना पसंद करती हैं।
स्वयं को लेखक न मानने वाली विजया मेहता ने ‘शाकुंतलम’ तथा ‘वादिचोरियन’ जैसी कई टेली फिल्में भी दूरदर्शन के लिए निर्देशित कीं। ‘बैरिस्टर’, ‘हवेली बुलंद थी’, ‘लाइअफ्लाइन’, ‘पुरुष’, ‘हमीदाबाई की कोठी’ जैसे नाटकों के लिए जानी जाती हैं।
नाना पाटेकार, विक्रम गोखले की पथप्रदर्शक, पद्म श्री, संगीत नाटक अकादमी, महाराष्ट्र गौरव, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अस्सी पार वर्ष की उम्र में सौम्य-शालीन, खुशमिजाज, शाहीन व्यक्तित्व की मालकिन सुंदर विजया मेहता खूब सक्रिय है। आयु के साथ-साथ सौंदर्य-वृद्धि इंगित करती है कि उन्होंने जीवन में कुछ सार्थक किया है।
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