हिंदी ने अपनी विभिन्न बोलियों और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से प्रभाव ग्रहण करते हुए अपना एक अखिल भारतीय मानक रूप विकसित कर लिया है।
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हिंदी सदियों से इस देश की संपर्क भाषा का काम करती रही है, और प्रशासन में भी इसका उपयोग होता रहा है, इसे विशेष स्थान मिला है देश की आजादी के बाद, जब यह औपचारिक रूप से आजाद भारत की राजभाषा अंगीकार की गई। इससे इसकी अखिल भारतीयता को औपचारिक और सांवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। तब से इसका प्रचार-प्रसार केन्द्र सरकार की भी जिम्मेदारी हो गई।
राजभाषा राजकाज की भाषा होती है अतः सरकार के स्तर पर हिन्दी के प्रचार-प्रसार का उद्देश्य था - हिंदी को कार्यालयीन कार्यों की भाषा बनाना। पहले हिन्दी जबकि केवल जनरुचि और जनस्वीकृति के बल पर अपना प्रसार पाती थी, अब इसे केन्द्र सरकार की नीतियों का भी सहारा मिला।
किंतु इसे प्रशासन की उदासीनता कह लें या एक बहुभाषी राष्ट्र की राजनैतिक विवशताएंं, हिन्दी को प्रशासन की भाषा बनाने का सपना पूरा नहीं हुआ। बल्कि इन नीतियों ने अहिन्दीभाषी जनता में हिंदी के प्रति विद्वेष भी उत्पन्न किया। भले ही यह कमजोर रूप में है, लेकिन वह अभी भी यदा-कदा मुखर रूप में उभर जाता है।
जैसे, अभी कनिमोझी,शशि थरूर आदि दक्षिण के नेताओं की टिप्पणियांं, बंगलोर में स्टेशनों में हिन्दी में नाम लिखे जाने के विरोध, या फिर उत्तर-पूर्व में या महाराष्ट्र में हिन्दीभाषियों पर हमले आदि। फिर भी हिंदी अपना स्थान मजबूत करती गई है, और ऐसा वह कर पाई है अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर और उन ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण, जिनसे वह राजधानी दिल्ली की और फिर पूरे देश की संपर्क भाषा बनी।
हिंदी ने अपनी विभिन्न बोलियों और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं से प्रभाव ग्रहण करते हुए अपना एक अखिल भारतीय मानक रूप विकसित कर लिया है। अब इसका एक अत्यंत समृद्ध साहित्य है, जिसमें साहित्य के अलावा इसके पास अन्य अनुशासनों में रचित
साहित्य का विशद भंडार है। यह भारत की राजभाषा और सम्पर्क भाषा होने के साथ अघोषित राष्ट्रभाषा भी है। इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि यह देश की बहुसंख्या की भाषा है, बल्कि इसलिए भी कि यह देश के सम्पूर्ण सांस्कृतिक उत्तराधिकार का वहन करती है।
यह एक तरफ देश की संस्कृति की वाहिका संस्कृत भाषा के समीप है, जो समस्त आर्यभाषाओं की जननी है और एक तरह से द्रविड़ भाषाओं की भगिनी है, तो दूसरी ओर आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को भी व्यक्त करने में सक्षम है।
खड़ी बोली हिंदी के साहित्य को अभी एक सदी से थोड़ा ही जो अधिक हुआ है किंतु इतनी अल्पावधि में ही इसने जितना विकास कर लिया है उतना अंग्रेजी जर्मन आदि विकसित भाषाएंं कई सदियों में कर पाई हैं। यह गर्व की बात है।
हिंदी माध्यम के स्कूल, कॉलेज या तो उपेक्षा से बंद होते जा रहे हैं या विवशता में अंग्रेजी माध्यम अपना रहे हैं।
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हिंदी अपने अपार अभिव्यक्ति सामर्थ्य के बल पर आज के युग की आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण सक्षम है - कम से कम अपने देश में तो अवश्य। इसमें संभावनाएं अनंत है। किंतु संभावनाओं का होना एक बात है और उन संभावनाओं को यथार्थ का रूप देना दूसरी बात।
आजादी के पूर्व हिंदी ने अगर भारतीय नवजागरण की चेतना का वहन किया तो आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा का माध्यम भी बनी। साहित्य और ज्ञान के विविध क्षेत्रों में हिंदी में नए और मौलिक काम हुए। एक उद्देश्य था कि देश को अपनी भाषा में, आम जन को सम्मिलित करते हुए सशक्त बनाना है, आगे बढ़ाना है। यह उत्साह अब मृतप्राय है।
आजादी के सात दशक बीतते न बीतते यह स्पष्ट दिखने लगा है कि हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर भारत की तरक्की की जा सकती है इसका कोई विश्वास हममें नहीं बचा है। पूरा देश इस बात पर एकमत दिखता है कि भारतीय भाषाओं में कोई भविष्य नहीं,यदि आज की वैश्वीकृत दुनिया में आगे बढ़ना है तो वह अंग्रेजी के रास्ते ही संभव है।
हिंदी में चाहे जितनी भी सामर्थ्य और संभावना हो उसे अपनाने का ही कोई उत्साह लोगों में नहीं रहा। हिंदी में साहित्य के क्षेत्र में भले पूर्ववत सक्रियता बनी हुई है लेकिन कोई भाषा केवल साहित्य के बल पर आगे नहीं बढ़ती। बल्कि साहित्येतर क्षेत्रों में भाषा का प्रयोग उसकी व्यवहारिक शक्ति का परिचायक है - वही उसमें जीविकोपार्जन की क्षमता लाता है।
हालांंकि हिंदी विषय की पढ़ाई दुनिया में नई-नई जगहों में शुरू हो रही है, लेकिन स्वयं अपने देश के शिक्षण संस्थानों में शिक्षण माध्यम के रूप में सिकुड़ती जा रही है, इसलिए कुछेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों के बल पर यह मान लेना कि हिंदी की लोकप्रियता दुनिया भर में बढ़ रही है, एक भ्रम पालने जैसा है।
हिंदी माध्यम के स्कूल, कॉलेज या तो उपेक्षा से बंद होते जा रहे हैं या विवशता में अंग्रेजी माध्यम अपना रहे हैं। नई पीढ़ी को हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर किसी प्रकार का गौरव या भरोसा नहीं है। वह जैसे भी हो, अंग्रेजी अपना रही है ताकि आज की प्रगति और विकास की दौड़ में शामिल हो सके। दूसरी तरफ, आज के युग की तकनीकी प्रगति में हिंदी ने तेजी से अपनी पैठ बनाई है। सूचना प्रौद्योगिकी का आरंभ अंग्रेजी में हुआ लेकिन तकनीक किसी एक भाषा को ही सुविधा या अवसर
नहीं देती। सूचना प्रौद्योगिकी के पंखों पर सवार होकर हिन्दी अपना अभूतपूर्व प्रसार कर रही है। ज्ञान और मनोरंजन के माध्यमों में हिंदी का स्थान दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।
इन्टरनेट पर हिंदी के प्रयोक्ताओं की संख्या किसी भी अन्य भारतीय भाषा की अपेक्षा अधिक है। मास मीडिया के जबरदस्त उभार से पत्रकारिता व इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में हिंदी के लिए अवसर बढ़े हैं और उल्लेखनीय रूप से रोजगार सृजन हुआ है। लेकिन अपने तमाम फैलाव के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता अपनी गुणवत्ता के प्रति खास उम्मीद नहीं जगाती। वह आत्मविश्वास जो पहले अज्ञेय आदि के जमाने में हिन्दी पत्रकारिता में नजर आता था, अब लुप्तप्राय है। अब वह साफ तौर पर अंग्रेजी की पिछलग्गू नजर आती है। सामग्री ही नहीं, भाषा के स्तर पर भी उसमें अंग्रेजी की घुसपैठ हो रही है।
हिंदी के अखबार और टीवी चैनल, रेडियो हिन्दी और अंग्रेजी की मिली-जुली भाषा पर उतर आए हैं जिसमें अंग्रेजी शब्दों-पदबंधों का अनुपात दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। समूह माध्यमों की भाषा हिन्दी में हो रहे एक बड़े क्षरण का संकेत दे रही है। कहा ही जा रहा है कि हिन्दी धीरे धीरे हिंग्लिश में बदल जाएगी।
एक ऐसी मिश्रित भाषा जिसमें हिंदी का केवल अस्थिपंजर होगा, उसपर मांंस-मज्जा-रक्त-शिराएंं सभी अंग्रेजी की होंगी। समूह माध्यमों की यह खिचड़ी भाषा धीरे-धीरे साहित्य में भी 'रिसती' जा रही है। हद तो तब होती है जब हिंदी के साहित्यालोचक भी अपनी भाषा में बीच बीच में अंग्रेजी की छौंक लगाकर अपने को आधुनिक और अंग्रेजी-शिक्षित साबित करने की कोशिश करते हैं।
हिंदी के लिए वर्तमान परिस्थितियांं कहीं आशाजनक हैं, तो कहीं निराशाजनक। तकनीक और प्रगति के मामले में आशाजनक लेकिन अपने निजी स्वरूप और विकास के मामले में निराशा उत्पन्न करने वाली। जैसे बदलाव इसमें आ रहे हैं उससे लगता नहीं कि भविष्य में हिंदी अपने वर्तमान रूप में सुरक्षित रह पाएगी। इसका अंग्रेजी मिश्रित हिंग्लिश धीरे-धीरे औपचारिक स्वीकृति भी पाता जा रहा है। इस हिंग्लिश में दिनोंदिन अंग्रेजी का अनुपात बढ़ता ही जा रहा है। धीरे-धीरे हिन्दी के सभी अवधारणात्मक व अन्य शब्द अंग्रेजी से बेदखल हो जाएंगे।
अंततः इसमें केवल विन्यास और संरचनात्मक शब्द (सर्वनाम, कारक चिह्न, सहायक क्रियाएंं, शब्द आदि) हिंदी के बचेंगे। जो भी हो, इस विडम्बना के साथ ही उस मिश्रित भाषा में ही हिन्दी में अवसर बढ़ते जाएंगे। जिस तरह से अंग्रेजी बढ़ती जा रही है क्या उससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि समस्त भारतवर्ष किसी दिन अंग्रेजीभाषी हो जाएगा? नहीं, यह सच है कि अंग्रेजी लगातार बढ़ती जा रही है, ज्ञान और रोजगार के सारे नए अवसर इसी में खुल रहे हैं और यह पारंपरिक अवसरों को भी लीलती जा रही है लेकिन हिन्दी किसी दिन व्यर्थ या अप्रासंगिक हो जाएगी ऐसा नहीं कहा जा सकता।
भाषा अस्मिता से जुड़ी चीज है और अस्मिता के प्रश्न जल्दी नहीं मरते। भारतीय अस्मिता की सच्ची वाहिका हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएं ही हैं, अंग्रेजी नहीं। यह सच है कि हिंदी भाषी क्षेत्र अपनी भाषा-संस्कृति के प्रति उदासीन हैं और वे हिंदी के संरक्षण या संवर्धन के लिए उत्सुक नहीं दिखते जिस कारण हिंदी का भविष्य भी अंधेरा दिखता है लेकिन हिन्दीतर क्षेत्रीय भाषाओं के समाज में अपनी भाषा के प्रति
पर्याप्त सजगता और सक्रियता है। क्षेत्रीय भाषाएं रहेंगी और साथ में उनके बीच संपर्क सेतु का काम करती हिन्दी भी रहेगी। हिन्दी का क्षेत्रीय भाषाओं के साथ सहयोग और सहकार का संबंध है।
अंत में, उपर्युक्त सारी बातों के बावजूद, भविष्य कई बार हमारी कल्पना और अनुमानों से भी ज्यादा विलक्षण होता है। अभी हमारे सामर्थ्य में यही है कि मौजूदा प्रवृत्तियों और परिवर्तनों को देखते हुए अपनी निराशा को परे रखते हुए आनेवाले समय में हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं की बेहतरी के लिए प्रार्थना, और भरसक प्रयत्न, करते रहें। सितम्बर महीने की मौजूदा सक्रियता, सामयिक होते हुए भी, इस मायने में एक उम्मीद जगाती है।
लेखक डाॅ. वरुण कुमार, रेल मंत्रालय में (राजभाषा) निदेशक हैं।
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