मीडिया, बाजार, इंटरनेट, शिक्षा समेत करीब-करीब सभी जगह हिंदी दिखने लगी। आज हिंदी का दबदबा न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में बढ़ा है। दुनिया में बोली जाने वाली सर्वाधिक भाषाओं में हिंदी तीसरे स्थान पर आती है। आज हिंदी 60 करोड़ से अधिक लोगों की भाषा है। देसी नहीं, मल्टीनेशनल कंपनियां भी हिंदी को लेकर सहज हुई हैं।
साल 1975 में फिल्म आई थी 'चुपके-चुपके'। ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित इस फिल्म में मुख्य किरदार के रूप में अभिनेता धर्मेंद्र थे, जो वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर बने थे, लेकिन अपनी पत्नी अभिनेत्री शर्मिला टैगोर के जीजा अभिनेता ओमप्रकाश को परेशान करने के लिए वो शुद्ध हिंदी का सहारा लेते हैं। धर्मेंद्र ऐसी शुद्ध हिंदी बोलते हैं, जो जीजा जी को समझ नहीं आती और वो परेशान हो जाते हैं।
भारत लंबे समय तक विदेशी आक्रांताओं से जूझता रहा। अरब आए, तुर्क आए, मुगल आए, पुर्तगाली आए, स्पिनिश आए, फ्रांसीसी आए, अंग्रेज आए और सभी अपनी-अपनी भाषा साथ लाए। हमने सभी भाषाओं के शब्दों को हिंदी के साथ आत्मसात कर लिया। हिंदी के साथ 3500 फारसी, ढाई हजार अरबी, 50 पोश्तों, 125 तुर्की के शब्द समाहित हो गए। हमने पुर्तगाली, अंग्रेजी, स्पेनिश, फ्रांसिसी आदि के शब्दों का समावेश भी हिंदी के साथ कर लिया। जैसे, हम किसी से समय नहीं टाइम पूछते हैं। कुल मिलाकर आज हम शुद्ध नहीं, मिश्रित हिंदी का उपयोग कर रहे हैं।
मीडिया, बाजार, इंटरनेट, शिक्षा समेत करीब-करीब सभी जगह हिंदी दिखने लगी। आज हिंदी का दबदबा न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर में बढ़ा है। दुनिया में बोली जाने वाली सर्वाधिक भाषाओं में हिंदी तीसरे स्थान पर आती है। आज हिंदी 60 करोड़ से अधिक लोगों की भाषा है। देसी नहीं, मल्टीनेशनल कंपनियां भी हिंदी को लेकर सहज हुई हैं।
पिछले 10 वर्षों से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनिया के हर मंच पर हिंदी में बात करते हैं। आज केंद्र सरकार का अधिकतर काम हिंदी में होना प्रारंभ हो गया है, जो हिंदी के लिए एक सुखद बात है। फिर भी हिंदी को लेकर बहुत काम करने की आवश्यकता है।
खासकर हिंदी व्याकरण और वर्तनी को मजबूत करने की जरूरत है। आज बाजारों में हिंदी के बिल बोर्ड लगे मिलते हैं, लेकिन सबसे ज्यादा अशुद्ध हिंदी इन्हीं बिल बोर्ड्स पर लिखी होती है। सरकारी बिल बोर्ड्स भी इससे अछूते नहीं हैं। एक विडंबना यह भी कि देश के सुप्रीम कोर्ट में आज भी हिंदी स्वीकार्य नहीं है। केवल एक दिन हिंदी दिवस मनाने के बजाय हमारे 365 दिन हिंदी को समर्पित होने चाहिए।