भाषा के विकास में प्रयोगात्मक पक्ष अनिवार्य
भाषा के विकास में केवल उसका व्यवहारिक पक्ष ही कारगर नहीं होता है बल्कि उसका भाषिक प्रयोगात्मक पक्ष भी अनिवार्य होता है। आप एक को लेकर दूसरे को छोड़ नहीं सकते हैं। हिंदी के भाषिक प्रयोग के लिए देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि के बढ़ते चलन ने एक वर्ग को भारतीय भाषाओं के साहित्य से दूर कर दिया है।
आज भारतीय साहित्य हिंदी की अपेक्षा अंग्रेजी भाषा में अधिक पढ़ा जा रहा है। कुछ भारतीय दिमाग में अंग्रेजी सोच रखने वाले लोग हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखने की अपेक्षा रोमन लिपि में लिखने की वक़ालत करते रहे हैं। लिपि जो भाषा की प्राणतत्व है जो भाषा को स्थायीत्व व संग्रहणीय बनाती है, यह कैसे हो सकता है कि आप उसके एक पक्ष को अपनाए और दूसरे को छोड़ दे। आज हिंदी भाषा की मूल समस्या उसके व्यवहारिक प्रयोग की नहीं है। बावजूद इसके हिंदी की सबसे बड़ी समस्या उसके लिपिगत प्रयोग से है। किसी भाषा की मूल लिपि के प्रयोग की अपेक्षा सरलता के क्रम में रोमन लिपि का बढ़ता प्रचलन किसी भी भाषा के लिए हितकर नहीं है।
भाषा ज्ञान के रास्ते खोलती है तो वहीं लिपि उस ज्ञान को स्थायी व संग्रहणीय बनाती है। आज के दौर में कठिनता से सरलता के प्रवाह में देवनागरी लिपि का स्थान रोमन लिपि ले रही है। सरलता के इस प्रवाह में हम भाषा के मूल व्यवहार व उसकी संरचना को अनदेखा कर देते हैं। हमारा समाज बहुभाषी है। हमारी अपनी ही बहुत सी बोली, भाषाएँ और लिपियां है। इसके बावजूद हमारे देश में देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि का प्रयोग सर्वाधिक हो रहा है। यहाँ तक की हिंदी भाषा का भाषिक व्यवहार भी देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि में किये जाने पर ज़ोर दिया जाने लगा है।
एक ओर हम भारतीय भाषाओं, बोलियों व लिपियों को पुन: जीवंत बनाने व उनके शैक्षिक व साहित्यिक योगदान को मजबूत बनाने का प्रयास कर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ हमारी राजभाषा व राष्ट्रभाषा हिंदी को देवनागरी लिपि में लिखे जाने की अपेक्षा रोमन लिपि में लिखे जाने की बहस चल रही है। ऐसे में हमारी बोलियाँ व भाषाएं अपना अस्तित्व ही खो देगी क्योंकि वह लिपि ही है जो किसी भाषा को स्थायी, सजीव व संग्रहणीय बनाती है।
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