गांधी जी के लिए भारतीय संस्कृति गांव और देहातों मं बसती थी.
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गांधी ने हिंदुस्तानी की ताकत संत कवियों को पढ़कर पहचानी थी कि कैसे देश भर में संत कवियों की पहुंच रही है। उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम हर तरफ संतों के संदेश पहुंच जाते थे। संतों के परिव्राजक स्वभाव की तरह हिंदी भी परिव्राजकों के पीछे पीछे चलती रही है।
यही वजह है कि यह हिंदी मीरा की जबान पर थी, तो सूरदास की जबान पर भी। नानक के पदों में यही हिंदी थी (चाहे वह गुरुमुखी में ही क्यों न हो) तो कबीर की साखी सबद रमैनी में भी यही हिंदी रही है। संत रविदास काशी के थे तो कबीर का भी काशी और मगहर से नाता था। तुलसी बांदा के रहने वाले थे तो मीरा राजस्थान की। सूरदास का नाता मथुरा से था तो सुंदरदास का दौसा, राजस्थान से। दादू के शिष्य रज्जब भी राजस्थान के थे।
नानक का रिश्ता लाहौर से था तो मलूकदास का इलाहाबाद से। ये सभी संत 13हवीं शताब्दी से लेकर 16हवीं शताब्दी के बीच हुए तथा अपनी सधुक्कड़ी भाषा में रचनाएं लिखीं। पढ़े-लिखे कवियों के बीच आज भी निर्गुण सगुण धारा के भक्त एवं संत कवियों की रचनाएं जीवन की सच्ची सार्थकता का पाथेय हैं।
गांधी अपनी प्रार्थना सभाओं में सरल सहज भाषा में लिखी प्रार्थनाएं दुहराते थे। कभी सूरदास, कभी मीरा, कभी कबीर, कभी तुलसीदास, कभी मध्यप्रांत के संत तुकड़ो जी के भजन गाया करते। साधो मन का मान त्यागो, मों सम कौन कुटिल खल कामी, वैष्णव जन तो तेणे कहिए, हरि तुम हरो जन की की भीर, इस तन-धन की कौन बड़ाई, सबसे ऊंची प्रेम सगाई, पानी में मीन पियासी रे, मोहिं सुन-सुन आवे हांसी, किस्मत से राम मिला जिसको/ उसने ये तीन जगह पाई/ बिसर गई सब तात पराई/ जब ते साधु संगत पाई/ नहिं कोई बैरी बेगाना / सकल संग हमरी बन आई ---जैसे भजन।
हम जानते हैं कि सहज सरल भाषा में लिखी गयी प्रार्थनाओं का अपना असर होता है। प्रार्थनाएं मन की शुद्धि के लिए होती हैं। गांधी सरलचित्त मनुष्य थे पर वे देश में रहने वाली हर कौम के प्रति सहिष्णु थे। विभाजन के दंश से गुजरते हिंदुस्तान में उनके विचारों की आलोचना भी होती थी पर वे न केवल हिंदुओं के लिए बल्कि मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों के हितों के प्रति चिंतित रहते थे।
आज से सदियों पहले कबीर ने कहा था, संस्कीरत है कूप जल, भाखा बहता नीर। पर हिंदी के निबंधकार कुबेरनाथ राय कबीर की इस अवधारणा से सहमत नहीं। वे संस्कृत को कुएं का जल कहे जाने के संकुचित दृष्टिकोण के खिलाफ थे। उन्होंने इस शीर्षक से एक पूरा निबंध ही लिखा है।
यद्यपि संस्कृत सारी भारतीय भाषाओं की जननी तो है, पर कुएं की जल की तरह है। आसानी से अलभ्य। पर संस्कृत वाड्.मय सहस्रबाहु है। यह और बात है कि संस्कृत में संस्कारित न होने के कारण संस्कृत के इन वाग्गेयकारों के सृजन एवं चिंतन का लाभ भारत की जनता नहीं उठा सकी।
हमारे समय के बड़े कवि तुलसीदास ने इसीलिए संस्कृतज्ञ होने के बावजूद संस्कृत जैसी सुसंस्कृत भाषा में न लिख कर अवधी बोली में लिखा जो कि हिंदी की पोषक बोली है। कबीर की भाषा भी सधुक्कड़ी है। वे भोजपुरी अंचल में जन्मे पर भाषा बहुत ही साफ सुथरी और सहज रखी जिससे आम जनता को उनकी बात समझ में आ जाए।
प्राय: कबीर ने अपने समय की खड़ी बोली में लिखा। भोजपुरी में भी नहीं; पर हां उनकी भाषा को लोक बोलियों ने सींचा है। बोलियां हमारी संस्कृति का आईना हैं। अवधी बोली से अवध संस्कृति का प्रसार हुआ तो भोजपुरी, मगही, मैथिली आदि बोलियों/भाषाओं से भोजपुरी , मगही एवं मैथिली संस्कृति का प्रसार हुआ। ये बोलियां सच कहें तो हिंदी की प्राणवायु हैं।
हमारी भारतीय संस्कृति की धड़कनें हैं। सही मायने में यही हमारी जनभाषाएं हैं। लोक बोलियां हैं। पर विडंबना है कि जैसे तमाम अस्मिताएं अपनी पहचान आधुनिकता के आच्छादन में लुप्त हो रही हैं, हमारी तमाम बोलियां व भाषाएं भी लुप्त होने के कगार पर हैं।
कहना न होगा कि लोक गीत लोक संस्कृति के विधायक तत्व हैं। हमारे जीवन के सारे संस्कारों का लोक बोलियों से गहरा रिश्ता है। हम राम नरेश त्रिपाठी द्वारा संकलित ग्राम गीत के सभी खंड देखें तो कैसे जन जीवन के हर संस्कार, गतिविधि, यज्ञोपवीत, विवाह, विदाई, संतान जन्म, कटाई, रोपाई, निराई गुड़ाई के लिए लोकगीतकारों ने गीत रचे।
यानी हमारे जीवन के प्रत्येक उत्सव में गीत संगीत का अपना योगदान है। आज बिहार की शारदा सिन्हा गाती हैं तो उनके कंठ से भोजपुरी व बिहार की लोक भाषाओं व संस्कृतियों का परिचय मिलता है। उनके साथ पूरी भोजपुरी संस्कृति गाती है, मालिनी अवस्थी गाती हैं तो उनके साथ जैसे पूरा पूर्वी भारत गाता है। पूरी अवधी संस्कृति गाती है, पूरा लोक गाता है।
भाखा बहता नीर से जिस निर्मल प्रवाही भाषा का आशय लिया जाता है, आज वैसी निर्मलता नदियों के जल में कहां। जैसे हमारी भाषा मटमैली हो रही है। आज अंग्रेजी के मोह में हिंदी में आगत एक नई हिंगलिश का जन्म हो चुका है। हिंदीभाषी पढ़े लिखे लोग भी शुद्ध हिंदी या हिंदुस्तानी बोलने में हिचक का अनुभव करते हैं।
- भारतीय संस्कृति और हमारी बोलियां
कहना न होगा कि भारतीय संस्कृति अपनी बोलियों में सुरक्षित है। जब तक हम अपनी बोलियों से अपना रिश्ता बनाए रखेंगे भारतीय संस्कृति, हिंदुस्तानी संस्कृति को कोई खतरा नही है। बिना लोक भाषाओं, बोलियों, लोक कथाओं, लोक गीतों, व कहावतों के कोई भाषाई संस्कृति बनती है भला।
इन लोकतत्वों व लोक वार्ताओं में हमारी भारतीय संस्कृति के गुणसूत्र छिपे हैं। लोक कथाओं में हमारे यहां पंचतंत्र हैं तो पौराणिक कहानियां भी। उपनिषद भी ऐसी ही कथाओं का केंद्र हैं। इन कथाओं में आचरण की शुद्धता, नैतिकता, सत्य, असत्य, लाभ, लोभ, उदारता, सामूहिकता, सहिष्णुता का बखान किया गया है। हमारी संस्कृति के नायक राम, कृष्ण, बुद्ध, नानक, रैदास, मीरा, नामदेव, याज्ञवल्क्य, शंकराचार्य, सावित्री, जाबाला आदि चरित्र हैं। इस तरह हमारे लोक व्यवहार, लोक कथाएं, लोक वार्ताएं, भारतीय संस्कृति के आधारभूत अंग हैं।
जहां जहां भारतवंशी हैं, वहां वहां भारतीय भाषाओं प्रमुखतया, हिंदी, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, भारतीय पूजा पद्धतियों, व्रत, त्योहारों, रीति रिवाजों, लोक व्यवहारों का प्रचलन है। यहां से हमारे पुरखे अपनी स्मृतियों में धारण कर यहां के लोकगीत ले गए, भजन और संध्या, अर्चन नीराजन के लिए प्रविधियां अपनाईं ----इसलिए कि इन प्रतीकों में ही हिंदुस्तानी संस्कृति के तत्व निहित हैं। इसलिए लोक भाषा ही वह बहता हुआ नीर है जो जन जन में व्याप्त है।
- लोकगीतों में रची-बसी संस्कृति
भारतीय संस्कृति आखिरकार लोक संस्कृति है जिसमें किसान मजदूर कामगार सभी आते हैं। नीचे ऊँचे तबके सभी वर्ग के लोग आते हैं। लोकगीत हमारी वाचिक परंपरा का हिस्सा हैं। यह परंपरा बाहर नहीं है। हमारे यहां जैसे श्रुतियां, वेद, आरण्यक, उपनिषद, कथा सरित्सागर, पंचतंत्र आदि वाचिक परंपरा से होते हुए लिखित रुप में आए, वैसे ही लोकगीत, संस्कार गीत भी लाखों कंठों से होते हुए यात्रा करते रहे।
जहां तमाम स्थलों पर स्त्री का एक दयनीय संसार व्यंजित है वहीं गांव देहात की दुनिया में राम, सीता और कृष्ण लोकगीतों के नायक नजर आते हैं। जीवन के हर उत्सव के गीत लोकगीतकारों ने रचे हैं। कहीं राम का विवाह हो रहा है, कहीं कृष्ण मनिहारी बने साड़ी बेच रहे हैं तो कहीं ग्वालिनें दही बेचने निकली हैं।
राधा कृष्ण के मिलन के गीत रचे गए हैं तो सामान्य स्त्रियों के विरह गीत भी । परदेस गए पतियों के लिए विरहगीत गाए जाते हैं। कुछ गीतों में स्त्री का प्रतिरोध भी दिखता है। इसी तरह तमाम रीति रिवाजों पर गाए जाने वाले गीत हैं जिनका लोक जीवन के उत्सवों से रिश्ता है। चाहे वह छठ का त्योहार हो, होली दीवाली का या जीउतिया का, ये लेाकगीत संस्कारों में पगे हैं। इनकी भाषा पर मत जाइये, इनमें रचे बसे भावों पर जाइये।
इनमें भारतीय मन रचा बसा है। (हिंदी और हम) क्या विडंबना है कि जो हिंदी कभी स्वतंत्रता संग्राम में मानव मुक्ति के लिए संघर्ष की भाषा रही है, वह खुद इन दिनों उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और बाजारवाद से मुक्ति के लिए छटपटा रही है।
कैरेबियाई देशों में हिंदी हिंदुस्तानी और भारतीयता को बचाने में रामचरित मानस, श्रीमदभगवत गीता, हनुमान चालीसा के साथ साथ हिंदुस्तानी त्योहारों, रीति-रिवाजों का बड़ा योगदान है। यह और बात है कि इन देशों की प्रशासनिक कामकाज की भाषा भलें ही अन्य हो, भारतवंशियों की अपनी बोलचाल की भाषा हिंदी ही है।
तुलसी, कबीर, मीरा, रैदास, नानक की बानी के प्रति यहां सदभाव है। इनके अपने पूजाघर हैं तो भारतीयता की प्रतीक तुलसी भी इनके घरों में देखी जा सकती है। आज फिर भूमंडलीकरण, बाजारवाद के चलते भारतीय संस्कृति की सम्प्रभुता खतरे में है, ऐसी स्थिति में अपनी भाषाओं, अपनी संस्कृतियों, अपनी अस्मिताओं को बचाने की एक लंबी मुहिम की आवश्यकता है।
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