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#हिंदीहैंहम: वैश्विक होती हिंदी की स्थानीय चुनौतियां

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हिंदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी है। - फोटो : प्रतीकात्मक तस्वीर
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भारत एक ऐसा देश है जिसकी बाईस भाषाओं को भाषा व कार्यभाषा का दर्जा प्राप्त है लेकिन इसके बावजूद देश में अधिकांश प्रशासनिक कार्य अंग्रेजी में होते है।

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देश के भीतर भाषा के स्तर पर हीनता बोध का ही प्रभाव है कि आज शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा अंग्रेजी बन गई है।

देश की प्रतिष्ठित सेवाओं में शुमार संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा भी इंग्लिश के वर्चस्व को तोड़ने में नाकाम रही है क्योंकि यहांं हर साल परीक्षा में चयनित विद्यार्थियों में अधिकांंश का परीक्षा का माध्यम अंग्रेजी होता है। कुछ गिने-चुने ही छात्र होते हैं जो अपनी मातृभाषा और हिंदी भाषा के जरिए इस पद तक पहुंंच पाते हैं।

लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (एल.बी. एस. एन.ए.ए) की वेबसाइट के मुताबिक,2013 से 2019 तक आते-आते हिंदी माध्यम में चयनित होने वाले उम्मीदवारों का प्रतिशत लगातार घटा है।
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आज के समय की स्थिति यह कि छात्र हिंदी के प्रति गर्व तो करते हैं लेकिन उसे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा का माध्यम बनाने से डर रहे हैं। उनके भीतर का यह डर अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व से उत्पन्न हुआ है जिसने हिंदी के साथ ही उसकी अन्य भाषाओं को कमजोर और हीन बना दिया है।
 

हिंदी को स्थानीय स्तर पर हाशिए पर क्यों ढकेला जा रहा है। - फोटो : सोशल मीडिया

वर्तमान समय में हिंदी विश्व बाजार की भाषा बन गई है। वैश्विक फलक पर इसे पढ़ाया तक जाने लगा है किंतु देश के भीतर ही यह दयनीय स्थिति तक पहुंंच गई। जहांं इसका अपना अस्तित्व संकट में देखा जा सकता है।

हमें बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं इसी वर्ष उत्तर प्रदेश में माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक में लगभग आठ लाख बच्चों का हिंदी में फेल होना हिंदी भाषी प्रदेश में ही हिंदी के प्रति उपेक्षित धारणा को दर्शाता है। ऐसे में अन्य हिंदीत्तर प्रदेशों में हिंदी की स्थिति को समझा जा सकता है।

हिंदी की यह स्थिति आज से उत्पन्न नहीं हुई है इसे बनाने में ‘अर्थ’ यानी पूंजी का महत्वपूर्ण योगदान है। क्योंकि भाषा और अर्थव्यवस्था का बहुत ही गहरा रिश्ता होता है। ‘अर्थ’ की अनिवार्यता व्यक्ति को भाषा, राज्य और देश से पलायन को मजबूर बनाती है। आज हिंदी ग्लोबल तो हुई है लेकिन स्थानीय स्तर पर अंग्रेजी का वर्चस्व बड़ा है।

पत्रकार राहुल देव लिखते हैं कि ‘15 वर्षों के प्रयासों के बाद भी हिंदी 15%प्रतिशत भारतीयों की कार्यभाषा बन सकी, अपने भक्तों के सम्मोहन से प्राण वायु पाती अंग्रेजी इस देश की 85% प्रतिभा, उद्यमिता के उच्चतम विकास के आगे पत्थर की दीवार की तरह खड़ी है।

अंग्रेजी न जानने के कारण उच्च शिक्षा, ऊंंचे अवसरों, रोजगार से वंचित करोड़ो युवा प्रतिभाएं, आज रोज कुंठित, अपमानित होने, अपने आत्मविश्वास को तिल-तिल कर मरते देखने, पिछड़ जाने के लिए अभिशप्त हैंं’।


नई शिक्षा नीति 2020 में भी बच्चों की सीखने की क्षमता को हीनता बोध से बाहर लाने के लिए मातृभाषा में शिक्षा की बात की गई है। जिस पर आजादी के समय से ही बहस चल रही थी जिसमें मुख्य रूप से महात्मा गांंधी द्वारा ‘नई तालीम’ शिक्षा प्रणाली मातृभाषा के द्वारा शिक्षा की हिमायती थी। लेकिन आज़ादी के बाद यह व्यवस्था गाँधी जी की मृत्यु के उपरांत उनका विचार बनकर रह गई।

भारत में भाषाओं की क्या स्थिति है इसे नई शिक्षा नीति की रिपोर्ट से जाना जा सकता है जहांं कहा गया कि ‘दुर्भाग्य से, भारतीय भाषाओं को समुचित ध्यान और देखभाल नहीं मिल पाई जिसके तहत देश ने विगत 50 वर्षों में 220 भाषाओं को खो दिया है।

यूनेस्को ने 197 भारतीय भाषाओं को लुप्तप्राय घोषित किया है। विभिन्न भाषाएंं विलुप्त होने के कगार पर हैं विशेषत: वे भाषाएंं जिनकी लिपि नहीं है’। नई शिक्षा नीति बेशक आज मातृभाषा में शिक्षा की पहल कर रही है लेकिन वह उसकी अनिवार्यता पर अभी खामोश है। इसमें तकनीकी क्रांति व नवाचार को तो शिक्षा का अहम हिस्सा बनाया लेकिन उसके माध्यम की भाषा तय नहीं की गई है।


हर वर्ष हिंदी दिवस पर हिंदी को बचाने की बहस होती है और यह बहस कितनी कारगर होती है इसे जमीनी स्तर पर देश की अंग्रेजी माध्यम से संचालित कार्य प्रणाली में देखा जा सकता है। जहांं सभी सूचनाओं का पहला प्रसारण अंग्रेजी और फिर अनुवाद के रूप में हिंदी व अन्य भाषाओं में आता है।


अंग्रेजी हमारी मातृ भाषा नहीं है फिर भी इसकी अनिवार्यता ने हमें अपनी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा से दूर अंग्रेजी को कार्यभाषा बनाने के लिए मजबूर कर दिया है। हिंदी भाषा व भारतीयों की पहचान पर बहस आज से नहीं बल्कि यह बहस आजादी से पूर्व से चली आ रही है। जिस पर भारतेंदु हरिश्चंद्र कहते हैं कि ‘निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति को मूल,बिन निज भाषा ज्ञान के,मिटन न हिय के सूल'।
 

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क्या हिंदी अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास कर रही है। - फोटो : iStock
हिंदी भाषा के संदर्भ में 1904 में भारत मित्र में बालमुकुंद लिखतें हैं कि अंग्रेज इस समय अंग्रेजी को संसारव्यापी भाषा बना रहे हैं और सचमुच वह सारी पृथिवी की भाषा बनती जाती है। वह बने, उसकी बराबरी करने का हमारा मकदूर नहीं है, पर तो भी यदि हिंदी को भारतवासी सारे भारत की भाषा बना सकें तो अंग्रेजी के बाद दूसरा दर्जा पृथिवी पर इसी भाषा का होगा’।

बालमुकुन्द अपने समय में भी अंगेजी का विरोध नहीं करते हैं केवल इतना चाहते हैं कि भारतवासी अपनी भाषा का प्रयोग करेंगे तो वह स्वयं ही मजबूत भाषा बन जाएगी। परंतु अफ़सोस कि वर्तमान इससे एकदम अलग है। मातृभाषा और हिंदी के अस्तित्व पर आजादी से पूर्व तक जितना संघर्ष और आंदोलन हुआ उसी ने हिंदी को जनमत की अपनी भाषा बनाया लेकिन वर्तमान समय में वहीं हिंदी धीरे-धीरे हिंदी पखवाड़ा, हिंदी दिवस की औपचारिकता तक सिमट रही है।

यह विचारणीय प्रश्न है कि जब सर्वाधिक बोली जाने हिंदी अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है तो कहीं ऐसा न हो उसकी सहयोगी अन्य बोली और भाषाएंं भी एक समय बाद अपना अस्तित्व खोकर लुप्त जाए और रह जाएगी सिर्फ अंग्रेजी। ऐसे में डर है कि कहीं भाषिक विविधताओं का ये देश भाषिक गुलाम बनकर न रह जाए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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