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हिमाचल पर टूटा बारिश का 'पहाड़': उफनती नदियां दरकते पर्वत, आखिर ये कैसा विकास कर डाला हमने

सार

जानकारों की मानें, तो फोरलेन हाइवे बनाने के लिए पहाड़ों को 90 डिग्री के एंगल में काटा गया है। वहीं, जो सड़कें बनाई गई हैं उनके किनारों पर पेड़ भी नहीं हैं। यही नहीं कई विशाल पेडों को काट तक दिया गया है। दूसरी तरफ, पहाड़ों में अब पहले की तरह छोटे और लकड़ी के घर नहीं बनते। बल्कि, अब यहां विशाल इमारतें बनाई जा रही हैं।
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हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश और लैंडस्लाइडिंग से हालात बेहद खराब - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश इन दिनों फिर से बारिश, बादल फटने और लैंडस्लाइडिंग यानी पहाड़ों के खिसकने जैसी घटनाओं के लिए चर्चा में बना हुआ है। अकेले हिमाचल प्रदेश में बीते तीन दिनों में हुई लैंडस्लाइडिंग और बादल फटने की घटना में अब तक लगभग 71 लोग अपनी जान गंवा बैठे हैं। हिमाचल में बरसात हर साल कहर बरपाती है। पहाड़ खिसकते हैं और लैंडस्लाइडिंग के मामले सामने आते हैं। ऐसे में अकेले बरसात से औसतन एक हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है, लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि काफी संख्या में लोगों की जिंदगियां भी खत्म हो जाती हैं। 

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ऐसे में सवाल लाजमी है कि क्या प्रकृति ने इतना रौद्र रूप रख लिया है कि इंसान क्या बड़े-बड़े पहाड़ भी ताश के पत्तों की तरह ढह जा रहे हैं? या फिर इसके पीछे असल वजह विकास के नाम पर पहाड़ों का दोहन है? 

हिमाचल में ढहता विकास

बीते एक दशक में हिमाचल प्रदेश में तेजी से विकास हुआ है, लेकिन विकास के केंद्र में बढ़ता शहरीकरण रहा है। कंक्रीट के जंगल खड़े हुए हैं, शहरों का विस्तार हुआ है, नए निर्माण के चलते पहाड़ों का दोहन किया गया है और प्राकृतिक संपदा को बड़े पैमाने पर नष्ट किया गया है। पेड़ों को काटकर पहाड़ों को खोखला किया गया है। जाहिर है दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र और अकूल संपदा से घिरे इस वनाक्षेत्र में विकास की आकांक्षाओं ने आज हमें तबाह होते हिमाचल प्रदेश के मंजर को इस रूप में दिखाया है। वहीं, नजर आता है कि जगह-जगह सड़कों को चौड़ा किया गया है और कई जगहों पर सड़कों को डबल (फोरलेन हाइवे बनाया गया है) भी किया गया है, जिससे तेजी से गाड़ियां पहाड़ों पर जा सके और वापस आ सके। पर क्या ये जरूरी है? और अगर है तो क्या इसके लिए पर्याप्त इंतजामात किए गए हैं?

आप परवाणु (हिमाचल का बॉर्डर) से शिमला की तरफ जाएंगे, तो आपको सोलन और उससे आगे तक भी फोरलेन हाइवे बने हुए मिल जाएंगे यानी दोनों साइड सड़कें मिल जाएंगी। इससे ट्रैफिक जाम कम होता है और आसानी से गाड़ियां पहाड़ों में पास हो जाती हैं। पर अगर आप कभी यहां जाएं, तो अपनी नजरें जरा ऊपर पहाड़ों की तरफ जरूर लगाइएगा। यहां आप इन पर लिखा हुआ पाएंगे कि 'उपर से पत्थर गिर सकते हैं, सावधानी से चलें'।

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ऐसे में नजर तो यही आता है कि सरकार ने विकास तो किया, पर आम जिंदगियों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया क्योंकि जब ऊपर से पत्थर गिरेंगे, तो न वहां सरकार मौजूद होगी, न सड़क बनाने वाले बड़े बड़े कॉन्ट्रेक्टर।

अगर कोई मौजूद होगा तो वहां के स्थानीय लोग या पर्यटक। कई लोग तो यहां तक मानते हैं कि पहाड़ों में डबल साइड सड़कों की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि इससे पहाड़ों को खोदा जाता है और इसका परिणाम आगे चलकर लैंडस्लाइडिंग के रूप में लोगों के सामने आता है।

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क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके विकास जरूरी है? - फोटो : Amar Ujala
जानकारों की मानें, तो फोरलेन हाइवे बनाने के लिए पहाड़ों को 90 डिग्री के एंगल में काटा गया है। वहीं, जो सड़कें बनाई गई हैं उनके किनारों पर पेड़ भी नहीं हैं। यही नहीं कई विशाल पेडों को काट तक दिया गया है। दूसरी तरफ, पहाड़ों में अब पहले की तरह छोटे और लकड़ी के घर नहीं बनते। बल्कि, अब यहां विशाल इमारतें बनाई जा रही हैं और इसके लिए भी पहाड़ों को काटा गया। इनमें आमतौर पर घर, रेस्तरां और बड़े-बड़े होटल बनते हैं।

क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर विकास जरूरी? 

सरकारें पहाड़ों पर बड़ी-बड़ी टनल बना रही है और कई बन भी चुकी हैं, सड़कें डबल या चौड़ी हो रही है और कुल मिलाकर विकास हो रहा है। टनल बनाने के लिए विस्फोट किया जाता है और कई भारी मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे पहाड़ों पर कंपन होता है।

पर क्या प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके विकास जरूरी है? आखिर ये कैसा विकास है जो आम लोगों से उनकी जिंदगियां छीनने पर अमादा है, क्योंकि पहले के लोगों की मानें तो पहाड़ों पर न तो इतनी लैंडस्लाइडिंग होती थी और न ही जमीन धंसती थी। पर अब ये सब हो रहा है और इसका कहीं न कहीं कारण बेहिसाब पहाड़ों की कटाई है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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