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आफत की बारिश: कुदरत के कहर से आखिर कैसे बचेंगे पहाड़ी राज्य, जोखिम में जिंदगी और तबाह होती संपत्तियां

सार

सवाल केवल हिमालयी राज्यों का नहीं है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और पूरब से लेकर पश्चिम तक सालभर किसी न किसी तरह की आपदा से हमारे देश को दो-चार होना ही पड़ता है। भारत, अपनी विशिष्ट भू-संरचना और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण एक नहीं बल्कि अनेक तरह की आपदाओं के लिए काफी संवेदनशील है।
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हिमाचल प्रदेश में कई मकान धराशायी हुए। - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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बरसात के इन दिनों में हिमालयी जुड़वां राज्य हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में आसमान से आफत बरस रही है। अतिवृष्टि से जहां-तहां तबाही मची हुई है। हिमाचल में अब तक 214 लोग जानें गंवा चुके हैं और 38 मलबे में कहीं गुम हैं। वही हाल उत्तराखण्ड का भी है। गत 15 जून से लेकर इन पंक्तियों के लिखे जाने तक आपदाओं में 100 से अधिक लोग जानें गंवा जा चुके हैं। हजारों की संख्या में छोटे-बड़े पशु मारे जा चुके हैं और लगभग डेढ हजार छोटे-बड़े भवन पूर्ण या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

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इनके अलावा चारधाम यात्रा में मारे गए 183 यात्री अलग हैं। अपदा संकट से ग्रस्त हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्दर सिंह सुक्खू का अनुमान है कि राज्य में कम से कम 10 हजार करोड़ की क्षति हो चुकी है और इस आपदा से हुए नुकसान से उबरने में कम से कम एक साल का समय लग जाएगा। इसी तरह उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी अब तक राज्य में हुई आर्थिक क्षति को कम से कम 1000 करोड़ रुपए आंका है। जबकि अभी मानसून पूरे यौवन पर है और राज्य में पहाड़ से लेकर मैदान तक तबाही का सिलसिला जारी है। आपदा के इस दौर में उत्तराखण्ड से लेकर जम्मू-कश्मीर तक तीर्थाटन और पर्यटन बुरी तरह प्रभावित हो गया है जिसका सीधा असर इन राज्यों की आर्थिकी पर पड़ेगा।

विशाल भारत में आपदाएं ही आपदाएं

सवाल केवल हिमालयी राज्यों का नहीं है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और पूरब से लेकर पश्चिम तक सालभर किसी न किसी तरह की आपदा से हमारे देश को दो-चार होना ही पड़ता है। भारत, अपनी विशिष्ट भू-संरचना और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के कारण एक नहीं बल्कि अनेक तरह की आपदाओं के लिए काफी संवेदनशील है। इन प्राकृतिक आपदाओं में बाढ़, सूखा, चक्रवात, सुनामी, भूकंप, शहरी बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और जंगल की आग प्रमुख हैं।

देश के 36 में से 27 राज्यों पर आपदाओं का खतरा

देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 27 को आपदाओं के लिए संवेदनशील माना जाता है। 58.6 प्रतिशत भूभाग मध्यम से बहुत उच्च तीव्रता के भूकंपों के प्रति संवेदनशील है। 12 प्रतिशत भूमि बाढ़ और नदी कटाव से प्रभावित है। कुल 7,516 किमी समुद्र तट में से, 5,700 किमी हिस्सा चक्रवात और सुनामी की दृष्टि से संवेदनशील है। देश की कुल खेती योग्य भूमि का 68 प्रतिशत हिस्सा सूखे की चपेट में आ जाता है।

पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और हिमस्खलन का खतरा बना रहता है और 15 प्रतिशत भूभाग भूस्खलन की चपेट में है। कुल 5,161 शहरी स्थानीय निकाय शहरी बाढ़ की दृष्टि से संवेदनशील हैं। भारत का भूगोल बाढ़ की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है। देश के कुल 32 करोड़ 90 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से 4 करोड़ हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र बाढ़ संभावित है। बाढ़ बार-बार आने वाली घटना है, जो भारी जानमाल का नुकसान करती है और आजीविका प्रणालियों, संपत्ति, बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक संविधाओं को नुकसान पहुंचाती है।

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हिमाचल प्रदेश में स्थित मंडी में बादल फटने से तबाही। - फोटो : संवाद

हर साल हजारों करोड़ की लगती है चपत

उत्तराखण्ड आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में बाढ़ के कारण हर साल औसतन 75 लाख हेक्टेयर भूमि प्रभावित होती है, 1600 लोगों की जानें चली जाती है और फसलों, घरों और सार्वजनिक सुविधाओं को औसतन 1805 करोड़ रुपये का नुकसान होता है। वर्ष 1977 में सबसे अधिक जानें (11,316) गईं थीं। देश में औसतन हर पांच साल बाद बाढ़ की बड़ी आपदाएं आ जाती है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (वल्र्ड मेट्रोलॉजिकल ऑर्गानाइजेशन) की एक रिपोर्ट "स्टे ऑफ क्लाइमेट इन एशिया-2022" के अनुसार एशिया में सन् 2022 में जलवायु परिवर्तन और जल संबंधी प्राकृतिक आपदाओं से 36,000 करोड़ अमरीकी डाॅलर की आर्थिक क्षति हुई। इसमें से भारत की 420 करोड़ डालर की क्षति भी शामिल है। जो कि आज की तारीख में 34851.39 करोड़ रुपयों में आंकी जा सकती है।

आपदाओं से धन और जन की हानि

प्राकृतिक आपदाओं से क्षेत्र विशेष में जनजीवन के संकट के अलावा आजीविका और विकास का ढांचा तो तहस नहस होता ही है साथ ही निकट भविष्य की आजीविका और विकास की संभावनाएं भी प्रभावित होती है। प्राकृतिक विप्लवों में से तटीय क्षेत्र के तूफान, उष्णकटिबंधीय तूफान और सुनामी से बंदरगाहों, तटीय सड़कों और पर्यटक सुविधाओं जैसे बुनियादी ढांचे को बड़ी क्षति पहुंचती है। सूखे, बाढ़ और चरम मौसम की घटनाओं से कृषि बहुत प्रभावित होती है। पर्यटन स्थल आपदाओं से बाधित हो जाते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और आजीविका प्रभावित होती है।

भूकंप से गगनचुंबी इमारतें, पुल और सड़कें सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। लातूर और भुज के विनाशकारी भूकम्पों की विभीषिका को लोग दशकों तक झेलते रहे। नब्बे के दशक के चमोली और उत्तरकाशी के भूकम्पों के घाव लोग आज तक नहीं भूले। लगभग सभी हिमालयी क्षेत्र तथा पूर्वी और पश्चिमी घाट भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील हैं इन क्षेत्रों में हर साल भूस्खलन से धनजन की भारी हानि होती है। पहाड़ों के निचले इलाके नदी और बाढ़ के प्रति काफी संवेदनशील होते हैं, खासकर भारी बारिश के दौरान इन क्षेत्रों में भारी नुकसान होता है।

प्रकृति के साथ जीना-सीखना ही सुरक्षा की गारंटी

प्राकृतिक आपदाएं वास्तव में प्राकृतिक घटनाएं हैं जो कि प्रकृति के स्वाभव में हैं और उन्हें रोका नहीं जा सकता है। इन घटनाओं की फ्रीक्वेंसी निरन्तर बढ़ती जा रही है। इस वृद्धि का कारण प्रकृति के साथ अनावश्यक और बेतहाशा छेड़छाड़ के साथ ही प्रकृति के साथ सामंजस्य बना कर नहीं चलना भी है। यह सत्य आपदाओं से बचाव का रास्ता भी है। इसलिए संभावित खतरों और उनसे निपटने के तरीकों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना जरूरी है।

कुछ आपदाएं ऐसी हैं जिनसे अर्ली वार्निंग प्रणाली के माध्यम से बचा जा सकता है। भविष्य की घटनाओं के प्रति हमारी चिन्ताओं को कम करने के लिए आपदा जोखिम न्यूनीकरण में निवेश करने की तत्काल आवश्यकता है। आज तक अधिकांश ध्यान तूफान और भूस्खलन जैसी अचानक शुरू होने वाली घटनाओं से निपटने के लिए प्रतिक्रियाशील उपायों पर रहा है, जिसमें मानवीय सहायता राहत और तैयारी भी शामिल है। हालांकि, सूखे जैसी धीमी गति से आने वाली आपदाओं के लिए जलवायु परिवर्तन भी जिम्मेदार है। जबकि आपदाओं के समय आपातकालीन उपाय महत्वपूर्ण होते हैं और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होती है। एक वैश्विक समुदाय के रूप में हमें प्रतिक्रियाशील से सक्रिय जोखिम न्यूनीकरण की ओर बढ़ना चाहिए।

जोखिम कम करने में सक्रिय निवेश से देशों को इस प्रकार की आपदा के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है। भारत में ही नहीं दुनिया में वृक्षों का बेतहाशा कटान हुआ और हो रहा है जिससे अपदाओं की फ्रीक्वेंसी बढ़ी है। वन और अन्य वनस्पतियां ढलानों को स्थिर करने में मदद करती है और इसलिए भूस्खलन के खतरे को कम करती हैं। आर्द्रभूमियां बाढ़ को नियंत्रित करने में मदद कर सकती है। तटीय वनस्पति और रेत के टीले और मैंग्रोव जैसी प्राकृतिक विशेषताएं तूफान, तेज हवाओं और चक्रवातों से सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw।co।in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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