वैशाखी और होली की तरह ही यह एक कृषि प्रधान त्योहार है।
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हरेला का पर्व ऋतु परिवर्तन का सूचक है।
सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक महत्व के इस पर्व को दसवें दिन काटा जाता है। वैशाखी और होली की तरह ही यह एक कृषि प्रधान त्योहार है। हरेले से नौ दिन पहले घर में स्थित पूजास्थल पर छोटी-छोटी डलिया में मिट्टी डालकर सात बीजों को बोया जाता है। इसमें- गेंहू, जौ और मक्के के दाने प्रमुख हैं।
हर दिन जल डालकर इन बीजों को सींचा जाता है ताकि यह नौ दिन में लहलहा उठे। घर की महिलाएं या बड़े बुजुर्ग सांकेतिक रूप से इसकी गुड़ाई भी करती हैं।
इसके बाद इसे काटकर विधिवत् पूजा-अर्चना कर देवताओं को चढ़ाया जाता है और फिर परिवार के सभी लोग हरेले के पत्तों को सिर और कान पर रखते हैं। हरेले के पत्तों को सिर और कान पर रखने के दौरान घर के बड़े बुजुर्ग, आकाश के समान ऊंचा, धरती के समान विशाल और दूब के समान विस्तार करने का आशीर्वाद देते हैं।
हरेला प्रकृति और मानव के बीच के संबंधों को दर्शाता है।
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कुछ रस्म, कुछ रिवाज और संस्कृति
इस दौरान- ‘जी रया जागि रया, आकाश जस उच्च, धरती जस चाकव है जया, स्यावै क जस बुद्धि, सूरज जस तराण है जौ..’ कहा जाता है। हरेला कृषि प्रधान त्योहार है। इसमें जो बीज डाले जाते हैं वो सीजन में होने वाले अन्न के प्रतीक हैं।
इन बीजों को धन-धान्य और समृद्धि के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। ‘जी रे जाग रे’ के रूप में जो भी कामनाएं की जाती हैं वो आज की अपेक्षाओं के समान बाजारवाद में रची-बसी नहीं होती। आकाश के समान ऊंचा, धरती के समान विशाल और दूब के समान विस्तार का आशीर्वाद हमें सीधे तौर पर प्रकृति के साथ जोड़ता है। हरेले का त्योहार प्रकृति से सीखने और उसके जैसे बनने के लिए प्रेरित करता है।
जहां आज बाजारवाद और पूंजीवादी संस्कृति मानव को प्रकृति के विरुद्ध खड़ा कर रही है। जो प्रकृति के करीब है उसे जंगली, बर्बर और असभ्य माना जाने लगा है। वहीं, हरेला प्रकृति और मानव के बीच के संबंधों को दर्शाता है।
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