रौशनी तो होगी।
बस इसी एक आस में,
दिन बदलते हैं, रातें तमाम होती हैं।
पत्ते गिर जाते हैं,
हवाएं रुकती हैं फिर बहती हैं।
ठिठुरती सर्दी में कांपते मजदूर,
धूप के सपने संग लेकर सोते हैं।
रात आती है तो अंधेरी,
लेकिन आशाओं की रौशनी देकर जाती है।
जैसे बेर का चूर्ण लाने की जिद को,
घर भर के नकार देने पर।
दादी के ब्लाउज से बाहर आता है,
मुड़ा हुआ एक नोट।
चाहे मटमैला हो या बदरंग,
उस नोट की चमक,
आंखों से बाहर फूटती थी।
और दादी के पोपले से मुंह पर,
भर जाता था संतुष्टि का उजास।
आस की छोटी-छोटी रौशनियाँ,
आने वाले कल में भी चमकती रहें।
दुनिया का कोई भी रिसेशन,
दादी के उस नोट को गायब न कर पाए।
इसी सोच के साथ,
एक बार फिर चलिए कैलेंडर के पन्ने पलट दें।
फिर से मुस्कुराता हुआ नया-नकोर कैलेंडर आपका स्वागत करने को आतुर है। दीवार पर सजे या मोबाइल-लैपटॉप पर सजे इस कैलेंडर में तारीखें वही होंगी, बदलना आपको अपने इरादों को है। अगर इरादे पहले से पक्के हैं तो उन्हें नए कैलेंडर में भी बस कॉपी पेस्ट करना है।
कॉलोनी में तेज आवाज लगाकर सब्जी बेचने वाला आशा भरी मुस्कराहट से कहता है-'दीदी, गाजर ले लो। हलवे की गाजर है। नए साल पर मीठा खाना।' ये वही सब्जी वाला है जिसने कोरोना काल में किसी तरह बचते-बचाते बड़ी मेहनत से रोज सब्जी और फल लाकर दिए, बिना अतिरिक्त पैसे वसूले। उसकी मुस्कुराहट आस की किरण सी लगती है। वो अंग्रेजी में कहते हैं न, 'द रे ऑफ होप।'
यह वही आशा की किरण है। सर्दियों में गली-गली मालवी गुड़ बेचने वाले बब्बा की आवाज में भी आते साल की ऊर्जा जैसे और भर गई है। वो खुश हैं कि इस साल फसल और भी अच्छी होगी। उनकी इस उम्मीद पर टच वुड कर देने को मैं हाथ बढ़ाती हूं और हाथ सामने लगे मीठी नीम के पौधे से छू जाता है। जैसे मेरे स्पर्श को 'हैलो' मानकर वह प्रसन्नता से झूमने लगता है और भरोसा दिलाता है कि जैसे कोरोना के लॉकडाउन में लोगों ने प्रकृति को फलने-फूलने के मौके दिए, नए साल में भी लोग वैसा ही व्यवहार रखेंगे और वो अपनी कई पीढ़ियों को बीजों से फलते-फूलते देखेगा।