इस बार की ईद कुछ खास है।
- फोटो : अमर उजाला
यही हमारी संस्कृति की सच्ची-पक्की सीख है। ईद मिलने-मिलाने का त्यौहार है, गिले-शिकवे मिटाकर गले मिलने का त्यौहार है। पिछली एक सदी ने इतने बडे़ संकट का सामना नहीं किया, शायद इसलिए आज हमें कुछ परेशानियों का सामना भी करना पड सकता है, लेकिन ईद अल्लाह की राह पर त्याग का नाम है, दुआएं देने और लेने का नाम है।
खुदा ने चुनौतियां तो दी हैं, लेकिन उन्हें अवसर में बदलने के लिए प्रेरणा भी दी है। हजरत मोहम्मद साहब अकसर ईद की खुशियां उन गरीब, यतीम बच्चों के साथ साझा करते थे, जिनके वालिदैन इंतेकाल कर गए होते थे, वो हर उस शख्स की मदद को हर वक्त तत्पर रहते थे, जिनके पास कुछ तकलीफ या परेशानी रहती थी।
अपने परिवार से पहले पड़ोसी के चूल्हे की चिंता उन्हें रहती थी। यही मानवता का अहम नियम है। निश्चित तौर पर इस बार की ईद कुछ खास है, ज्यादा इबादत और ज्यादा नेकियां इकटठी करने वाली। बेशक इस बार की ईद में वो रंग न दिखे, वो पहले जैसा मिलना जुलना ना हो, गले लगाकर ईद मुबारक ना बोल पाएं।
लेकिन इस ईद जरूरतमंदों की पहले से भी ज्यादा मदद करके उनके चेहरों की मुस्कान बनकर रंगीन होगी इस साल की ईद, जो नेकी का जरिया भी बनेगा और आखरत का अच्छा बन्दोबस भी करेगा।
लोगों की मदद करना अल्लाह को राजी करने वाला होता है। मुश्किल के इस दौर में महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की कहानी ईदगाह वर्तमान परिपेक्ष में रोशनी डालती नजर आती है। जिसमें हामिद और उसकी दादी अमीना ईद की खुशियां तंगदस्ती में मनाने की कोशिश करती हैं।
घर में इबादत करता परिवार
- फोटो : अमर उजाला
मुश्किल के वक्त बाजार की चकाचौंध से इतर तीन आने की ईदी की शानदार खरीदारी जो उस वक्त का हामिद की समझदारी से किया गया बेहतरीन चुनाव भी था, और उसकी दादी अमीना के हाथों को सुरक्षित रखने का जरिया भी बना।
आज की इस महामारी की समस्या में बाजार और खरीदार के अनसुलझे प्रश्नों को हल करने वाला है। देश मे पहली बार इतना बडा संकट आया है, सड़कों में खस्ता हाल मजदूर जिनके पांवों के जख्म सडकों पर सदियों तक अपने निशान छोड़ जाएगे, हादसे में बिखरी लाशों को जगाते मासूम बच्चों की तस्वीर पूरी कायनात को गमजदा करने वाली हैं, नवयुवक याकूब को अपने दोस्त अमृत को गोद में लेती आखिरी सांसों की वो बेबसी वाली तस्वीर हर आंख को नम करने वाली है, जिसमें दुनिया इस कहर से बेबस और बेहाल नज़र आती है।
कोरोना अपने साथ भूख का संकट लेकर आया है, मई की तपिश् में मीलों भूखे-प्यासे सफ़र तय करना मौत को दावत देने वाला साबित हो रहा है। ऐसे में ईद एक जिम्मेदारी लेकर आई है, लोगों की मदद का, उनकी तकलीफों को कम करने का। जो मुंशी प्रेमचन्द ने बरसों पहले अपनी कहानी ’ईदगाह’ में दर्ज कराई थी।
ईद की जिम्मेदारी बाजार की समझदार खरीद पर निर्भर है। जिम्मेदारी ज्यादा है, तो नेकियां भी ज्यादा होगी चलो इसबार कुछ और बेहतर करते हैं, अपनी जरूरत का एक बड़़ा हिस्सा इन जरूरत मंदों तक पहुंचाते हैं, क्योंकि ईद की खुशियां तो बांटने से बढ़ती हैं।
घरों से नमाज और इबादत करके अल्लाह से इस कहर से अपने प्यारे भारत के साथ-साथ पूरी कायनात की सेहत और सलामती की दुआओं का यह सिलसिला जारी रखते हैं। सबको ईद मुबारक क्यांकि ईद की खुशियां तो बांटने से बढ़ती हैं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।