आज का दौर तकनीक, रफ्तार और भौतिक प्रगति का दौर है। हमने दूरियों को समेट लिया है, सूचनाओं के पहाड़ खड़े कर लिए हैं और सफलता के नए-नए मानदंड तय कर दिए हैं। लेकिन इस तमाम प्रगति के बीच एक मौलिक प्रश्न हम सभी के सामने खड़ा है- क्या हम वास्तव में खुश रहते हैं?
अक्सर यह देखा जाता है कि ‘खुश रहने जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा केवल दार्शनिक किताबों, प्रेरक भाषणों या डिजिटल दुनिया के रील्स और पॉडकास्ट तक सीमित होकर रह गई है। विडंबना यह है कि जिस विषय का सीधा सरोकार हमारे दैनिक जीवन से है, वह हमारे क्लासरूम, बोर्डरूम और घर के ड्राइंग रूम की बातचीत से लगभग गायब है। स्कूलों में सफलता के तरीके सिखाए जाते हैं, कॉरपोरेट बोर्डरूम में लक्ष्य हासिल करने की नीतियां बनती हैं, लेकिन जीवन के इस अत्यधिक महत्वपूर्ण बिंदु
-खुश रहने- पर कोई संवाद नहीं होता।
इंजीनियरिंग के क्षेत्र में चार दशकों से अधिक के अपने पेशेवर और व्यक्तिगत अनुभवों के बाद, जब मैंने इस विषय की गहराई में उतरने का प्रयास किया, तो मुझे अहसास हुआ कि खुशी कोई दूर की मंजिल नहीं, बल्कि एक सरल व्यावहारिक समीकरण है।
अपने चालीस वर्षों के अनुभव से यह कहना उचित समझता हूं:
"मेहनत ज़्यादा, अपेक्षा कम, सुखी जीवन की मधुर सरगम"
यह पंक्ति सुनने में जितनी सरल लगती है, जीवन में उतारने के लिए उतनी ही सजगता मांगती है। आज के तनाव और असंतोष की सबसे बड़ी वजह हमारी मेहनत में कमी नहीं, बल्कि हमारी अत्यधिक और अवास्तविक अपेक्षाएं हैं। हम अपनी परिस्थितियों, अपने काम, अपने आसपास के लोगों एवं अपने आप से इतनी ज्यादा अपेक्षाएं बांध लेते हैं कि परिणाम ज़रा भी अनुकूल न होने पर हताशा हमें घेर लेती है। यदि हम प्रयास शत-प्रतिशत करें, लेकिन परिणाम से मिलने वाले फल की अपेक्षा के बोझ से अपने खुश रहने की अवस्था को मुक्त कर लें, तो तनाव स्वतः कम होने लगता है।
टेलीविज़न और ऑडियो-विजुअल माध्यमों पर जब मुझे इस विषय पर विचार व्यक्त करने का अवसर मिला, तो एक बात बार-बार सामने आई- लोग ‘खुश रहने’ को 'सफलता' का परिणाम और ‘सुविधाओं’ का होना मानते हैं। धारणा यह बन गई है कि "जब मुझे वह पद, वह गाड़ी या वह पदोन्नति मिल जाएगी, तब मैं खुश होऊंगा।" जबकि वास्तविक जीवन का दर्शन इसके बिल्कुल विपरीत है। खुशी किसी लक्ष्य की प्राप्ति का अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि उस लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा का रुख और मनःस्थिति है। सफलता आपको साधन दे सकती है, लेकिन उन साधनों का आनंद लेने की क्षमता केवल एक प्रसन्न चित्त ही दे सकता है।
व्यावहारिक रूप से खुश रहने के लिए किसी कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए केवल तीन बुनियादी स्तरों पर बदलाव की आवश्यकता है:
- दृष्टिकोण में सरलता: समस्याओं को 'संकट' मानने के बजाय उन्हें सुलझाने योग्य 'पहेली' की तरह देखना।
- तुलना से दूरी: अपनी यात्रा की तुलना दूसरों की उपलब्धियों से न करना। हर व्यक्ति का संघर्ष और उसका समय चक्र अलग होता है।
- कृतज्ञता का भाव: जो नहीं मिला उसका मलाल करने के बजाय, जो हमारे पास है उसका सम्मान करना।
प्रिंट और डिजिटल मीडिया की अपनी-अपनी ताकत और चिंतनशीलता होती है। प्रिंट जहाँ विचारों को गहराई और विश्वसनीयता देता है, वहीं डिजिटल माध्यम इस संवाद को हर वर्ग, कॉर्पोरेट्स और युवा पीढ़ी तक तुरंत पहुँचाने की क्षमता रखता है। आज समय की माँग है कि हम प्रसन्नता को एक गौण विषय मानना छोड़ें। इसे अपने परिवारों, शिक्षण संस्थानों और कार्यक्षेत्रों की मुख्यधारा की बातचीत का हिस्सा बनाएं।
खुशी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे बाहर किसी बाज़ार या उपलब्धि में खोजा जाए; यह तो हमारे भीतर दृष्टिकोण के एक छोटे से बदलाव की प्रतीक्षा कर रही है। जब हम अपनी अपेक्षाओं का बोझ थोड़ा कम करेंगे और प्रयासों का आनंद लेंगे, तो पाएँगे कि खुशी कहीं खोई ही नहीं थी, वह यहीं, हमारे भीतर ही मौजूद थी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।