लोकप्रियता को वोटों में बदलने की चुनौती
चौथा, राहुल कांग्रेस शासित राज्यों में ऐसे कार्यक्रम क्यों करते, जहां वह अपनी सरकारों के जरिए सचमुच छात्रों की समस्या हल करवा सकते हैं? पांचवां, राहुल के इन कार्यक्रमों से भाजपा सरकारों को क्या सीखना चाहिए, क्या वो खुद ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर छात्रों की जायज मांगों को हल करने की पहल नहीं कर सकतीं? छठा, किसी गंभीर कार्यक्रम में कमेडियनों की एंट्री से क्या संदेश जाता है, जैसा कि राहुल के कार्यक्रम में हुआ? सातवां, युवाओं में लोकप्रिय होना एक बात है और इस लोकप्रियता को राजनीतिक लाभ में कन्वर्ट करने का हुनर अलग बात है। क्योंकि सिर्फ एक पहिए से सियासत की गाड़ी नहीं चलती। राजनीति में संवाद के साथ-साथ कुशल प्रबंधन भी उतना ही अहम है, अन्यथा ऐसी लोकप्रियता अस्थायी और मुद्दा सापेक्ष बन कर रह जाती है। यानी कि ‘छात्रों की गूंज’ में झलकी युवाओं की बेचैनी क्या सत्ता परिवर्तन की चाहत का भी कोई गंभीर संकेत है या नहीं?
इंदौर कार्यक्रम को मिली अप्रत्याशित सफलता
ये तमाम सवाल लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के युवाओं से जुड़ने की ‘छात्रों की गूंज’ श्रृंखला के तहत इंदौर में 19 सितंबर को आयोजित कार्यक्रम के बाद उठे हैं। यूं तो यह एक रूटीन आयोजन ही था, लेकिन भाजपा ने जिस तरह इस कार्यक्रम में प्रत्यक्ष और परोक्ष अड़ंगे लगाए, उससे इसे ज्यादा हाइप मिल गया। नतीजतन बहुत बड़ी संख्या में छात्र इस कार्यक्रम में पहुंचे। आयोजकों का दावा है कि इस कार्यक्रम के लिए सात लाख छात्र-छात्राओं ने ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन कराया। जबकि भाजपा का कहना है कि कार्यक्रम में छात्र कम कांग्रेस कार्यकर्ता ज्यादा थे। जो भी हो, लेकिन जो थे, वो युवा थे, यह तो वीडियो में साफ झलक रहा था।
शिक्षा व्यवस्था और परीक्षाओं से परेशान छात्र
इस कार्यक्रम में मंच पर बुलाए गए अधिकांश युवाओं की यही शिकायत दिखी कि राज्य में शिक्षा की सुविधाएं ठीक नहीं हैं, समय पर परीक्षाएं नहीं होतीं, होती हैं तो रिजल्ट टाइम पर नहीं आता, नर्सिंग के लाखों छात्रों की स्थिति और बदतर है, न उनके पास डिग्री है और न ही जल्द मिलने की उम्मीद है, क्योंकि प्रदेश के तमाम असली-नकली नर्सिंग कॉलेज कानूनी पेंच में फंसे हैं। सरकारी भर्तियां बहुत कम हैं, पहले तो विज्ञापन ही नहीं निकलता, निकलता है तो दस गल्तियां होती हैं, ओबीसी सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण चाहते हैं, वो भी नहीं मिल रहा।
जायज शिकायतों को सुनने के लिए मंच की कमी
प्रतियोगी परीक्षाएं समय पर नहीं होतीं, होती हैं तो बरसों रिजल्ट जारी नहीं होता। हो भी गया तो नियुक्ति पत्र पाने के लिए चप्पलें घिसनी पड़ती हैं। मंच पर जो कहा गया उसमें जेनुइन बात यही है कि चूंकि छात्रों की बहुत-सी जायज समस्याएं हैं, जिन्हें सहानुभूतिपूर्वक सुनकर उनके निदान करने का सरकार के स्तर पर कोई स्पष्ट और अलग से मैकेनिज्म नहीं है, इसलिए वो राहुल गांधी के मंच पर जाकर अपनी बात कह रहे हैं। ऐसा कोई मंच है भी तो वह समस्याएं सुलझाने की जगह ज्ञान बांटने से ज्यादा प्रेरित है।
क्या यह सिर्फ एक राजनीतिक दांव है?
यहां सवाल यह भी है कि राहुल गांधी गैर कांग्रेस शासित राज्यों में ‘छात्रों की गूंज’ सुनकर उनकी समस्याओं का समाधान कैसे करेंगे? या वो युवाओं के बड़े वोट बैंक के मद्देनजर इसे केवल राजनीतिक मुद्दा बनाने और यह संदेश देने में मशगूल हैं कि छात्रों को लगे कि कोई तो उनकी बात सुन रहा है। यूं भी छात्रों की गूंज का असल मकसद तो राजनीतिक ही है कि युवा सत्ता परिर्वतन का इंजन बनें। लिहाजा राहुल यह कहकर भाजपा सरकारों को एक्स्पोज कर रहे हैं कि उनके द्वारा शासित राज्यों में युवाओं की कोई सुनवाई नहीं है। वैसे यह तरीका भाजपा नेता भी कांग्रेस शासित राज्यों में अपना सकते हैं, क्योंकि कमोबेश छात्रों की समस्याएं सभी जगह एक-सी हैं। लेकिन वो राहुल गांधी की आलोचना में ही इति श्री मान रहे हैं। कोई काउंटर स्ट्रेटेजी नहीं दिखती।
कमेडियन विवाद और कार्यक्रम की गरिमा
इंदौर के कार्यक्रम के साथ भी यही हुआ। इसी आयोजन में अचानक मंच पर एक स्टैंड- अप कमेडियन पुलकित मणि की एंट्री हुई और उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नकल करने की कोशिश की। यही नहीं मोदी की माताजी को लेकर ऐसी टिप्पणी की, जो अभद्रता की श्रेणी में आती है। इसी को लेकर भाजपा ने राहुल पर हमला किया, जिसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि अगर मोदी की माताजी पर हमला गलत है तो राहुल की मां पर हमला सही कैसे है? जाहिर है मां किसी की भी हो, कोई भी असभ्य टिप्पणी अक्षम्य है। हालांकि इस कार्यक्रम के बाद पुलकित मणि का नोएडा में आयोजित स्टैंड अप कॉमेडी शो रद्द कर दिया गया। बता दें कि पुलकित एक विवादित स्टैंड-अप कमेडियन हैं। मेटा उनके दो रील हटा भी चुका है। पुलकित यूपी के ही हैं और फ्रेंच भाषा टीचर तथा अनुवादक हैं। इंस्टाग्राम पर उनका @funnywhoisfunny नाम से हैंडल है। उनके 6 लाख से ज्यादा फॉलोअर बताए जाते हैं। पुलकित को मंच पर बाकायदा बुलाया गया था या वो खुद मंच पर चढ़ गए, यह साफ नहीं है, लेकिन उनकी हरकतों ने मंच की गंभीरता को कम ही किया। खुद राहुल गांधी को उन्हें रोकना चाहिए था बजाए उनसे गले मिलने के।
'सिस्टम' पर राहुल गांधी का तीखा प्रहार
बहरहाल पुलकित को अलग रखें तो इस बार ‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी ने ‘सिस्टम’ पर तगड़ा हमला करते हुए छात्रों को यह बताने की कोशिश की कि यह ‘सिस्टम’ ही आप को आगे बढ़ने से रोक रहा है। ‘सिस्टम’ बोले तो उन्होंने प्रधानमंत्री सहित देश को चलाने वाले छह धुरंधरों के नाम लिए। लेकिन राहुल भूल गए कि सरकार किसी की भी हो, ‘सिस्टम’ चलाने वाले चंद लोग ही होते हैं। उसकी मानसिकता एक सी रहती है। जब उनकी सरकार थी, तब भी सिस्टम में ऐसे ही लोग थे। बस, सरकार के साथ चेहरे बदल जाते हैं। वो ‘सिस्टम’ भी फेल था, इसीलिए कांग्रेस की सत्ता गई।
कांग्रेस का अपना अंदरूनी 'सिस्टम'
और सरकार ही क्यों, उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस चलाने वालों का ‘सिस्टम’ भी पार्टी को मजबूत होने से कैसे रोक रहा है, यह भी देखा जाना चाहिए। वरना छात्रों और युवाओं के बीच राहुल गांधी की बढ़ती लोकप्रियता का असर दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव नतीजों पर भी दिखता। हालांकि यह तर्क भी दिया जा सकता है कि डीयू के नतीजों को समूचे देश के आईने में नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि वैसे भी डीयू में भाजपा के छात्र संगठन अभाविप की पकड़ पहले से मजबूत रही है, इसलिए वहां छात्र संघ के चार में से तीन पदों पर अभाविप का कब्जा कोई बहुत बड़ी खबर नहीं थी। एक पद निर्दलीय के खाते में गया।
डीयू चुनाव में गवां दिया बड़ा मौका
दो माह पहले दिल्ली में जंतर मंतर पर युवाओं के भारी विरोध प्रदर्शन के बाद छात्रों में बदलाव के चाहत की गूंज डीयू के चुनावों में भी सुनाई देगी, यह उम्मीद बहुतों को थी। लेकिन वैसा हुआ नहीं, बल्कि कांग्रेस की अंतर्कलह, भाई- भतीजावाद और गलत टिकट वितरण की वजह से एक सुनहरा मौका हाथ से निकल गया। इसके पीछे भी वही ‘सिस्टम’ है जो कांग्रेस को आगे नहीं बढ़ने दे रहा। अब प्रश्न यह है कि जब आप अपने ‘भीतरी सिस्टम’ को सुधार नहीं पा रहे हैं तो ‘दूसरे के सिस्टम’ को गरियाने भर से क्या होगा? बेहतर होगा कि राहुल कांग्रेस शासित राज्यों में छात्रों से संवाद कर उनकी समस्याएं कैसे हल की जाती हैं, इसका कोई रोल माॅडल भाजपा शासित राज्यों के सामने रखते तो वह ज्यादा व्यावहारिक और सार्थक होता।
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