हबीब ने बलराज साहनी, दीना पाठक और मोहन सहगल द्वारा निर्देशित नाटकों में भी काम किया और ‘फुटपाथ’, ‘राही’, ‘चरणदास चोर’, ‘स्टेइंग अन’, ‘गांधी’, ‘ये वो मंजिल तो नहीं’, ‘मैन इटर्स आफ कुमाऊं’, ‘हीरो हीरालाल’, ‘प्रहर’, ‘द बर्निंग सीजन’, ‘राइजिंग आफ मंगल पांडेय’, ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ जैसी फिल्मों में भी।
इप्टा के कमजोर पड़ने पर हबीब ने फिल्मों में अभिनय करने, गीत लिखने का मोह छोड़ दिया। मुंबई से दिल्ली आ गए और 1954 में ‘आगरा बाजार’ का मंचन किया। हबीब ने ‘आगरा बाजार’ अपनी एक शैली विकसित की। वह नाटक लोक कवि नजीर अकबराबादी की नज्मों पर आधारित था।
हबीब ने नजीर की कुछ श्रेष्ठ कविताएं चुनीं और संक्षिप्त वर्णन के साथ उन्हें नाटक का रूप दिया। उसके अनुरूप उन्होंने एक बाजार का निर्माण किया। एक तरफ पतंग बेचने वालों की दुकानें तो दूसरी तरफ किताबों की दुकानें। किताब की दुकानों पर कवि, आलोचक, इतिहासकार जुटते हैं और साहित्यिक भाषा में बात करते हैं। पतंग की दुकान पर बोलचाल की भाषा में बतकही होती है। दुकानदार जब नामी कवियों की कविताएं गाते हैं तो बिक्री नहीं होती लेकिन जब वे लोक कवि नजीर की कविताएं गाते हैं तो जल्दी बिक्री हो जाती है।
उस नाटक में हबीब ने यह दिखाने की यह कोशिश की कि लोक की भाषा में सहज ही संवाद कायम हो जाता है। भाषा का निर्माण निरंतर वे करते हैं जो उसे बरतते हैं या जिन्हें उसकी जरूरत पड़ती है। हमारे यहां भाषा के विद्वान शब्द निर्माण के लिए लोक के पास जाने और सीखने की बजाय ग्रंथों, शब्दकोशों का सहारा लेते हैं। यह कृत्रिम प्रक्रिया है। इस कृत्रिमता से मुक्त होकर ही हबीब तनवीर बोलियों की तरफ आकृष्ट हुए और वही उनके रंग विधान का आधार बना।
हबीब तनवीर यूरोप में तीन साल रहने के बाद जब रायपुर लौटे तो वहां ‘नाचा’ हो रहा था। वे ‘नाचा’ देखकर मुग्ध हो गए। उन्होंने छत्तीसगढ़ के उन कलाकारों से पूछा कि क्या वे उनके साथ दिल्ली जाएंगे? उनके हां कहने पर उन्होंने भुलवा, बाबू दास, ठाकुर राम, मदनलाल, जगमोहन और बाद में लालूराम को अपनी मंडली में और फिर ‘मिट्टी की गाड़ी’ में शामिल किया और वह प्रस्तुति बेहद सफल रही।
हबीब को एहसास हो गया कि यदि रंगमंच को ताकतवर बनाना है तो पश्चिम की तरफ ताकने से काम नहीं चलेगा। अपने यहां ही देखना होगा कि भंडार में क्या-क्या है। इसीलिए हबीब गांव के कलाकारों को लेकर शहर आए। उन्होंने गौर किया कि अपने यहां थियेटर में जो शहरी परंपराएं हैं, उनमें ‘अंतराल’ है जबकि गांव की शैलियों में निरंतरता है। नाट्य शास्त्र की बुनियादी चीजें ही हमारी लोक शैलियों में बरती गई हैं। उसकी बुनियादी चीजों- काल, स्थान और क्रिया का संगम लोक शैलियों में भी है। इस तथ्य ने हबीब के भीतर एक नई अवधारणा को जन्म दिया।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।