कुशल सिंह ने शांत स्वर में समझाया, “
बेटा, राष्ट्रवाद केवल तलवार चलाने में नहीं, बल्कि बुद्धि और त्याग में है। यदि तू मेरी बात न मानेगा, तो गुरु जी का सिर मुगलों के हाथ लग जाएगा, और सिख धर्म पर आघात होगा। हम हिंदू हैं, लेकिन गुरु जी ने हमारा धर्म बचाया। अब हमारा कर्तव्य है कि हम उनकी रक्षा करें। सोच, यदि गांव जल गया, तो कितने निर्दोष मरेंगे? यह बलिदान केवल मेरा नहीं, तेरी मां का, तेरा और पूरे परिवार का है। राष्ट्र के लिए माता-पिता का त्याग पुत्र को मजबूत बनाता है।” पुत्र की आंखों में आंसू थे, लेकिन पिता के तर्कों ने उसे झकझोर दिया। वह जान गया कि यह बहस केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धार्मिक एकता और राष्ट्र की अखंडता की बहस है। अंततः, पुत्र ने सहमति दी। उसने तलवार उठाई, और कुशल सिंह का सिर काट दिया।
गुरु तेग बहादुर के सिर के लिए अपना सिर किया न्यौछावर
कपास में लपेटकर वह भाई जैता जी को सौंप दिया। मुगल सैनिक धोखे में आ गए, सोच लिया कि यह गुरु जी का सिर है। वे लौट गए, और भाई जैता जी सुरक्षित आनंदपुर साहिब पहुंचे। 16 नवंबर 1675 को गुरु गोबिंद सिंह जी को पिता का सिर मिला और सिख इतिहास में यह घटना अमर हो गई।
सच्चा राष्ट्रवाद सीमाओं से परे
यह घटना राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से कितनी प्रासंगिक है? कुशल सिंह का परिवार हमें सिखाता है कि सच्चा राष्ट्रवाद सीमाओं से परे है। यह हिंदू-सिख भाईचारे का प्रतीक है, जो आज के भारत में और भी आवश्यक है। जब औरंगजेब जैसी शक्तियां धार्मिक स्वतंत्रता को कुचलने पर तुली थीं, तो एक साधारण किसान परिवार ने दिखा दिया कि त्याग की कोई सीमा नहीं। दहिया परिवार का बलिदान जाट समुदाय की वीरता का उदाहरण है, जो हमेशा से राष्ट्र रक्षा में अग्रणी रहा। आज, जब भारत आर्थिक और सैन्य शक्ति के रूप में उभर रहा है, यह गाथा हमें याद दिलाती है कि आंतरिक एकता ही असली ताकत है। यदि प्रत्येक परिवार कुशल सिंह की भांति सोचे, तो कोई विदेशी आक्रमणकारी भारत को हिला न सके।
350वीं बलिदान वर्षगांठ पर भव्य आयोजन
कुशल सिंह के वंशज आज भी बधखलसा में रहते हैं। वीरेंद्र सिंह जैसे परपोते इस कथा को जीवंत रखते हैं। हरियाणा सरकार ने 2025 में 350वीं बलिदान वर्षगांठ पर भव्य आयोजन किया। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला परिसर में भी श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के 350वें बलिदान दिवस के पावन उपलक्ष्य में आयोजित तीन-दिवसीय भव्य समागम का शुभारंभ रविवार, 23 नवंबर को श्रद्धा और पूरे धार्मिक सद्भाव के साथ हुआ। तीन दिवसीय भव्य समागम में कीर्तन, प्रदर्शनी और लाइट एंड साउंड शो का विशेष आयोजन होगा। दिल्ली का लाल किला देश-विदेश से आए हजारों श्रद्धालुओं की संगत, भव्य पंडाल, कीर्तन दरबार, श्रद्धा, सेवा और श्री गुरु तेग बहादुर जी की अमर शिक्षाओं के रंग में पूरी तरह रंगा हुआ है।
समकालीन संदर्भ में देखें, तो यह बलिदान कोविड-19 जैसी महामारी या सीमा विवादों में देखे गए सामूहिक त्याग की याद दिलाता है। जब पूरा राष्ट्र एकजुट होता है, तो असंभव कार्य संभव हो जाते हैं। कुशल सिंह के पुत्र की बहस हमें सिखाती है कि युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद की समझ होनी चाहिए। स्कूलों में ऐसी गाथाएं पढ़ाई जाएं, ताकि नई पीढ़ी जान सके कि आज जो आजादी हमें मिली है, उसके लिए कितने महापुरुषों ने अपना बलिदान दिया है।
गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस पर हम कुशल सिंह दहिया परिवार को नमन करते हैं। उनका त्याग राष्ट्र की नींव है। जय हिंद, जय सिखों के नौवें गुरु! यह दिवस हमें प्रतिज्ञा दिलाता है कि हम भारत की अखंडता के लिए सदैव खड़े रहेंगे। राष्ट्रवाद की यह ज्योति कभी न बुझे।
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