'स्व' आधारित जीवनशैली-आत्मनिर्भरता का सांस्कृतिक स्वरूप
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'स्व' आधारित जीवनशैली-आत्मनिर्भरता का सांस्कृतिक स्वरूप
“स्व” आधारित जीवनशैली, पंच परिवर्तन का चौथा आयाम है। यह आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सांस्कृतिक आत्मविश्वास का भी प्रतीक है। संघ का ''स्वावलंबन अभियान'' ग्रामीण और शहरी स्तर पर स्थानीय उत्पादन, हस्तशिल्प, खादी, चरखा, गौ-आधारित उद्योग और स्वदेशी उपक्रमों को प्रोत्साहन दे रहा है।
यह केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आंदोलन है। स्वदेशी केवल व्यापार की नीति नहीं, आत्मा की पुकार है। विदर्भ, केरल और पूर्वोत्तर भारत में ऐसे कई संघ-प्रेरित लघु उद्योग आत्मनिर्भरता के सशक्त उदाहरण बने हैं। 'स्व' का यह भाव भारत को आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सांस्कृतिक रूप से स्वाभिमानी राष्ट्र बनाने की दिशा में अग्रसर है।
राष्ट्रीय चेतना और कर्तव्यपरायण नागरिक निर्माण
संघ के विचार में, राष्ट्र निर्माण का मूल कर्तव्यनिष्ठ नागरिक है। शाखाओं और प्रशिक्षण शिविरों में स्वयंसेवकों को सिखाया जाता है कि अधिकारों से पहले कर्तव्य का बोध आवश्यक है। जब हर व्यक्ति राष्ट्र को परिवार मानेगा, तब भारत विश्व का नेतृत्व करेगा।
संघ के आपदा राहत, ग्राम स्वच्छता, शिक्षा सेवा केंद्र और स्वास्थ्य अभियानों के माध्यम से लाखों स्वयंसेवक सेवा और अनुशासन की भावना से समाज में सक्रिय हैं। यह परिवर्तन नागरिकता की एक नयी परिभाषा प्रस्तुत करता है, जहां ''राष्ट्र प्रथम'' सर्वोच्च मूल्य बन जाता है।
पंच परिवर्तन का यह सूत्र वास्तव में नवजागरण की ओर बढ़ते भारत का वह दीपस्तंभ है, जो राष्ट्र की चेतना को नयी दिशा, नयी ऊर्जा और नयी दृष्टि प्रदान करता है। इसका उद्देश्य केवल सामाजिक ढांचे में परिवर्तन लाना नहीं, बल्कि ऐसे भारत का सृजन करना है जो सामाजिक रूप से समरस, पारिवारिक रूप से सुदृढ़, पर्यावरणीय रूप से संतुलित, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और नागरिक रूप से कर्तव्यनिष्ठ हो।
संघ की शाखाएँ हों, सेवा के विविध आयाम, शिक्षा के क्षेत्र में संस्कार-संपन्न प्रयास हों अथवा ग्राम विकास का सतत प्रवाह- प्रत्येक कार्य में इस पंच परिवर्तन की प्रेरणा स्वाभाविक रूप से स्पंदित होती है।
यह केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि राष्ट्र पुनर्निर्माण की सतत साधना है-वह साधना जो भारत को उसकी आत्मा से जोड़ती है, कर्म से सशक्त करती है और विचार से प्रबुद्ध बनाती है। जब समाज का प्रत्येक घटक अपने ‘स्व’ की पहचान कर कर्तव्य के पथ पर अग्रसर होता है, तब राष्ट्र मात्र भौगोलिक सीमाओं में बँधा एक देश नहीं रहता, वह एक जीवंत, जागृत और प्रकाशमान चेतना बन उठता है।
यही पंच परिवर्तन की आत्मा है-जो भारत को फिर से “वसुधैव कुटुम्बकम्” के प्राचीन मंत्र का विश्वध्वजवाहक बना सकती है। और अंत में, संघ-भावना के इसी मनोभाव में,
“त्वदीयाय कार्याय बद्धा कटीयं,
त्वदीयाय वंदे परं देवतायाः”
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